BollywoodIndiaTrending

पिता ने पैसे देने से किया इनकार तो उधार लेकर मुंबई पहुंचे थे पृथ्वीराज कपूर; ऐसे रखी कपूर खानदान की नींव

29 मई 1972 को हिंदी सिनेमा ने एक ऐसा हीरो खोया, जिसे फिल्म इंडस्ट्री का संस्थापक स्तंभ माना जाता था। हम बात कर रहे हैं महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की, जिन्होंने आज से 54 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कहा था। उनकी डेथ एनिवर्सरी पर आज भी फिल्म इंडस्ट्री उन्हें उस शख्स के रूप में याद करती है, जिसने न सिर्फ अभिनय की नई मिसाल कायम की, बल्कि कपूर खानदान जैसी विरासत की नींव भी रखी।

पिता ने पैसे देने से किया इनकार तो उधार लेकर मुंबई पहुंचे थे पृथ्वीराज कपूर; ऐसे रखी कपूर खानदान की नींव
पिता ने पैसे देने से किया इनकार तो उधार लेकर मुंबई पहुंचे थे पृथ्वीराज कपूर; ऐसे रखी कपूर खानदान की नींव

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित परिवार का नाम लिया जाता है, तो ज़ुबान पर सबसे पहला नाम ‘कपूर खानदान’ का आता है। लेकिन आज जिस कपूर साम्राज्य को हम देखते हैं, उसकी नींव किसी ऐशओआराम या विरासत से नहीं, बल्कि एक मामुली से लड़के की जिद, जूनून और कड़े संघर्ष से रखी गई थी। वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के पितामह पृथ्वीराज कपूर थे।

आइए विस्तार से जानते हैं उस संघर्ष की कहानी, जब एक पिता के इनकार के बाद उधार के पैसों से मुंबई पहुंचकर पृथ्वीराज कपूर ने इस महान बॉलीवुड राजवंश की नींव रखी।

पिता ने कहा ‘थिएटर और फिल्मों में कोई भविष्य नहीं’

पृथ्वीराज कपूर का जन्म पेशावर के पढ़ेलिखे परिवार में हुआ था। उनके पिता, दीवान बशेश्वरनाथ कपूर, पुलिस विभाग में एक सम्मानित अधिकारी थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा कानून की पढ़ाई पूरी करे और एक प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी या वकालत के पेशे में जाए।

हालांकि, पृथ्वीराज का दिल तो बचपन से ही नाटक, रंगमंच और अभिनय के लिए धड़कता था। कॉलेज के दिनों में ही उन पर अभिनय का भूत इस कद्र सवार हुआ कि उन्होंने वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। जब उन्होंने अपने पिता के सामने मुंबई जाकर फिल्मों में हाथ आजमाने की इच्छा जताई, तो पिता भड़क गए। उस दौर में सिनेमा या थिएटर में काम करने को एक प्रतिष्ठित काम नहीं माना जाता था। पिता ने साफ कह दिया कि वे इस ‘नौटंकी’ के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे।

बुआ से उधार लिए पैसे और किया मायानगरी का रुख

पिता के कड़े इनकार ने पृथ्वीराज के इरादों को कमजोर नहीं किया, बल्कि उनकी ज़िद को और मजबूत कर दिया। जेब खाली थी, लेकिन आंखों में बड़े सपने थे। ऐसे में उन्होंने अपनी बुआ का दरवाजा खटखटाया।

ने अपनी बुआ से 75 रुपये उधार लिए। साल 1928 में 75 रुपये की कीमत आज के हजारोंलाखों के बराबर थी। उसी उधार के पैसे से उन्होंने पेशावर से मुंबई का टिकट कटवाया और मायानगरी की उस ट्रेन में बैठ गए, जिसने भारतीय सिनेमा का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।

मुंबई में शुरुआती संघर्ष

साल 1928 की सर्दियों में जब पृथ्वीराज कपूर मुंबई पहुंचे, तो उनके पास न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कोई गॉडफादर। इसलिए उन्होंने बिना पैसों के काम करना शुरू किया।

उन्होंने ‘इंपीरियल फिल्म कंपनी’ जॉइन की। शुरुआत में उन्हें बिना किसी वेतन के काम करना पड़ा, क्योंकि वे बस कैमरा और सेट के माहौल को समझना चाहते थे।

जो पृथ्वीराज कपूर हिंदी सिनेमा का संस्थापक स्तंभ माना जाता है, उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। उनकी पहली फिल्म 1929 में आई ‘दो धारी तलवार’ थी, जिसमें उन्होंने बतौर जूनियर आर्टिस्ट काम किया था।

पृथ्वीराज कपूर को ऐसे मिला था पहला बड़ा ब्रेक

उनकी कदकाठी, ग्रीक गॉड जैसा लुक और बुलंद आवाज को जल्द ही नोटिस किया गया। फिल्म ‘सिनेमा गर्ल’ में उन्हें मुख्य अभिनेता के रूप में पहला बड़ा ब्रेक मिला।

इतिहास के पन्नों में दर्ज किया नाम

पृथ्वीराज कपूर सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी कलाकार थे। उन्होंने अपने करियर में दो ऐसे मील के पत्थर स्थापित किए, जिसने उन्हें अमर बना दिया:

साल 1931 में आई फिल्म ‘आलम आरा’ । ये भारत की पहली बोलती फिल्म थी, जिसमें उन्होंने अहम भूमिका निभाई। दूसरा था उनका पृथ्वी थिएटर। फिल्मों से पैसा और शोहरत कमाने के बाद भी उनका झुकाव थिएटर के प्रति कम नहीं हुआ। 1944 में उन्होंने ‘पृथ्वी थिएटर’ की स्थापना की, जो घूमघूम कर पूरे देश में नाटक प्रस्तुत करता था। इसी थिएटर ने राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर जैसे दिग्गजों को तराशा।

‘मुग़लएआज़म’ से मिली अलग पहचान

‘मुग़लएआज़म’ : शहंशाह अकबर के रूप में उनका किरदार और उनकी गरजती हुई आवाज आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे शक्तिशाली अभिनय माना जाता है।

ऐसे स्थापित हुआ कपूर खानदान का नाम

अगर उस दिन पृथ्वीराज कपूर अपने पिता की बात मानकर पेशावर में ही रुक जाते, तो आज भारतीय सिनेमा का चेहरा कुछ और होता। उन्होंने जो संघर्ष का बीज बोया था वो आज एक पेड़ के रूप में कपूर खानदान के आंगन में पनप रहा है।

पृथ्वीराज कपूर की पीढ़ी और परिवार

पृथ्वीराज कपूर की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ उनकी फिल्में नहीं, बल्कि उनका पूरा परिवार भी है। उनके बेटे राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर ने हिंदी सिनेमा में बड़ा नाम कमाया। इसके बाद अगली पीढ़ी आई, जिसमें ऋषि कपूर, रणधीर कपूर और राजीव कपूर का नाम शामिल है। अब करिश्मा कपूर, करीना कपूर और रणबीर कपूर इस खानदान के नाम को आगे बढ़ा रहे हैं।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply