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उत्तर प्रदेश: गृह जनपद में तैनाती और कर्मचारियों के शोषण के आरोप, एम्बुलेंस सेवा व्यवस्था पर उठे सवाल

इटावा: जिले में संचालित 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. आउटसोर्स व्यवस्था के तहत संचालित जीवनदायिनी एम्बुलेंस सेवा में कर्मचारियों ने अधिकारियों पर मनमानी, दबाव और शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं.

मामला उस समय और चर्चा में आ गया, जब एक कथित वायरल फोटो और ग्रुप चैट के स्क्रीनशॉट सामने आए, जिनमें कर्मचारियों से जबरन ड्यूटी कराने और विरोध करने वालों को समूह से हटाने जैसी बातें सामने आने का दावा किया जा रहा है.

बताया जा रहा है कि प्रदेश सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों के हितों की रक्षा और शोषण रोकने के लिए निगम गठन जैसी बड़ी बातें कर रही है, लेकिन इटावा में स्थिति इसके उलट दिखाई दे रही है. जीवीके/जीबीके ग्रीन हेल्थ सर्विस द्वारा संचालित 108 और 102 एम्बुलेंस सेवा में कार्यरत कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि जिले में तैनात एक अधिकारी अपने गृह जनपद में लंबे समय से तैनात हैं, जबकि कंपनी स्तर पर यह नियम बताया जाता है कि कोई भी कर्मचारी या अधिकारी अपने गृह जनपद में ड्यूटी नहीं करेगा.

कर्मचारियों के आरोप के अनुसार, एम्बुलेंस अधिकारी अमित कुशवाहा पिछले करीब चार वर्षों से इटावा में ही तैनात हैं. आरोप यह भी है कि कर्मचारियों पर लगातार अतिरिक्त दबाव बनाया जाता है और ड्यूटी व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं बरती जाती. कुछ कर्मचारियों का कहना है कि यदि वे अपनी समस्या जिला प्रोग्राम मैनेजर तक पहुंचाना चाहते हैं, तो उनकी बात सुनी नहीं जाती.

वायरल फोटो और ग्रुप संदेशों के आधार पर यह भी आरोप लगाया गया है कि कर्मचारियों से उनकी निर्धारित ड्यूटी से अधिक काम लिया जाता है. यदि कोई कर्मचारी आपत्ति जताता है या अपनी बात समूह में रखने की कोशिश करता है, तो उसे ग्रुप से हटाने तक की कार्रवाई की जाती है.

कर्मचारियों का यह भी कहना है कि दो शिफ्ट की उपस्थिति दर्ज होने के बाद तीसरी शिफ्ट को मान्यता नहीं मिलती, जबकि कई बार एक ही कर्मचारी को लगातार कई दिनों तक अकेले ड्यूटी करनी पड़ती है. ऐसे में बिना उपस्थिति के काम कराए जाने और बाद में हैंडओवर को लेकर विवाद की स्थिति बन जाती है.

इस पूरे मामले ने जिले में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि यदि तैनाती, उपस्थिति और ड्यूटी रोस्टर में अनियमितता है, तो निरीक्षण के दौरान यह सब अब तक नजरअंदाज कैसे होता रहा.

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कथित वायरल फोटो और कर्मचारियों के आरोप सामने आने के बाद क्या प्रशासन या संबंधित कंपनी इस मामले की निष्पक्ष जांच कराएगी? साथ ही, क्या गृह जनपद में तैनाती और कर्मचारियों से जबरन काम लेने जैसे आरोपों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी? फिलहाल, मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और कर्मचारियों को जांच व न्याय का इंतजार है.

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