तमाम कोशिशों के बाद भी सरकारी दफ्तरों में अभी काफी कुछ नहीं बदला। सम्मान के साथ भरोसा भी कहीं-कहीं दिखता है। यहां काम से आए आम आदमी को ‘बेचारा’ बनना पड़ता है। मामूली सी शिकायत वाले ‘फरियादी’ अक्सर इन्हीं दफ्तरों से निराश लौटते देखे जा रहे हैं। उन्हें काम नहीं होने के ‘अनिगनत’ कारण बता दिए जाते हैं। साथ में दिलासा देते है कि ‘ऐसा’ कर लें तो काम हो जाएगा।
कई सरकारी दफ्तरों में तो फरियादियों को बैठने के लिए ‘ठौर’ तक नहीं मिलती। सरकार हर स्तर पर प्रयास कर रही है कि आम फरियादी निराश न हो, उनके काम समय पर हर हाल में पूरे हों। इसके लिए वो निरंतर शिविर भी लगा रही है। बावजूद इसके बहुत सारे लोगों की ‘उम्मीद’ यहां भी पूरी नहीं हो पा रही। वो कागज लिए फिर भटकने लगते हैं सरकारी दफ्तरों में, वो भी काम और सम्मान होने की उम्मीद में। अपनी शिकायत या समस्या लेकर पहुंचे फरियादी उम्मीद करते हैं कि उनकी बात सुनी जाएगी, पर कई दफ्तरों में उन्हें सम्मान के बजाय उपेक्षा, रूखापन और टालमटोल का सामना करना पड़ता है। फरियादी की पीड़ा यह नहीं कि उसकी समस्या तुरंत हल नहीं हुई, बल्कि यह है कि उसकी बात को गंभीरता से लिया ही नहीं गया।
घंटों इंतजार, आधे-अधूरे जवाब, फाइल ‘ऊपर भेजने’ की रस्म और कभी-कभी तिरस्कार, ये अनुभव नागरिक और व्यवस्था के बीच भरोसे की दीवार खड़ी कर देते हैं। इस स्थिति की जड़ जवाबदेही की कमी और गलत कार्य-संस्कृति है। कई अधिकारी शिकायत को ‘बोझ’ मानते हैं, जबकि वही शिकायत व्यवस्था सुधार का आधार हो सकती है। शिकायत निवारण की समय-सीमा और प्रक्रियाएं कागजों में दर्ज हैं, पर व्यवहार में उनकी पालना कम ही दिखती है। डिजिटल शिकायत प्रणालियां बनी हैं, लेकिन दफ्तरों में मानवीय संवेदनशीलता का अभाव बना हुआ है। तकनीक तभी प्रभावी है जब उसे सम्मानजनक संवाद का साथ मिले। लोकतंत्र में सरकारी दफ्तर जनता की सेवा के लिए होते हैं, न कि जनता को डराने या हतोत्साहित करने के लिए।
हकीकत यह है कि आज भी कई सरकारी कार्यालयों में फरियादी यानी अपनी शिकायत लेकर आया आम नागरिक को संदेह, उपेक्षा और कभी-कभी अपमान का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति न सिर्फ दु:खद है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है। शिकायत को बोझ समझा जाता है, जबकि वही शिकायत व्यवस्था सुधार का अवसर होती है। ऊपर से, शिकायत निवारण की तय समय-सीमा और स्पष्ट प्रक्रिया का पालन अक्सर कागजों तक सीमित रह जाता है। अच्छा व्यवहार कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि सरकारी सेवा का मूल तत्व है। फरियादी की बात ध्यान से सुनना, उसे सही जानकारी देना और सम्मानजनक भाषा में जवाब देना, बस ये ही तो करना है। दफ्तरों में इस पर भी सवाल करने पर जवाब मिलना सहज नहीं है।
तकनीक तभी प्रभावी है जब उसे सम्मानजनक संवाद का साथ मिले। फरियादी को सम्मान देना अनिवार्य बनाया जाए। प्रशिक्षित कर्मी, स्पष्ट सूचना, समयबद्ध निवारण और असम्मानजनक व्यवहार पर सख्त कार्रवाई हो। जब सरकारी दफ्तरों में फरियादी को सम्मान मिलेगा, तभी शासन सच में जनता के करीब आएगा। सरकारी दफ्तरों के अफसर हों या कार्मिक, प्राइवेट सेक्टर से ही बहुत कुछ सीख सकते हैं। यहां सम्मान भी भरपूर मिलता है और काम करने के लिए भी कर्मचारी तत्पर दिखते हैं। सरकारी दफ्तरों का ढर्रा भी सुधारा जाना चाहिए, काम भले ही न हो पर फरियादी को सम्मान तो मिले, उसे मना करने की वजह से सलीके से बताई जाए।




