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आस्था या अग्निपरीक्षा? मां वैष्‍णों देवी के दरबार में शरीर को जंजीरों से जकड़कर पहुंचा भक्त, मंजर देख हर कोई दंग


कटड़ा/जम्मू: क्या आस्था की कोई सीमा होती है? क्या भक्ति के मार्ग में शरीर को मिलने वाला असहनीय दर्द भी फीका पड़ जाता है? जम्मू की त्रिकुटा पहाड़ियों पर इन दिनों एक ऐसा दृश्य दिखाई दे रहा है जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान की रूह भी कांप जाए। गुप्त नवरात्रि के पावन पर्व पर जहां लोग आधुनिक सुविधाओं के साथ मां वैष्णो देवी के दरबार पहुंच रहे हैं, वहीं बिहार का एक युवक ‘कठिन तपस्या’ की जलती मशाल बनकर उभरा है। उसके शरीर पर लोहे की सलाखें हैं, हाथों में जंजीरें जकड़ी हुई हैं और हर कदम पर लोहे का भारी बोझ है लेकिन उसकी आंखों में मां के दर्शन की वो चमक है जो हर दर्द को मात दे रही है।

शरीर जंजीरों में जकड़ा, पर मन मां के चरणों में
गुप्त नवरात्रि के पहले दिन जब भक्तों का सैलाब उमड़ा तो सबकी नजरें इस अनोखे श्रद्धालु पर टिक गईं। इस युवक ने अपने पूरे शरीर पर लोहे की मोटी-मोटी सलाखें बांध रखी हैं। इतना ही नहीं उसके दोनों हाथों को भारी जंजीरों और तालों से जकड़ा गया है। चढ़ाई का हर एक कदम उसके शरीर को थकान और चुभन दे रहा है लेकिन उसके मुख से निकलने वाला ‘जय माता दी’ का जयकारा यह बता रहा है कि यह यात्रा शारीरिक शक्ति की नहीं बल्कि आत्मिक विश्वास की है। अर्धकुंवारी से लेकर भवन तक के कठिन रास्ते पर उसे जो भी देख रहा है वह बस हाथ जोड़कर उसकी श्रद्धा को नमन कर रहा है।

मन्नत का भारी बोझ या अटूट विश्वास?
भक्तों के बीच इस बात को लेकर गहरी चर्चा है कि आखिर इस कठिन तपस्या के पीछे की वजह क्या है? क्या यह किसी बड़ी मन्नत की पूर्ति का संकल्प है या फिर मां के प्रति अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा? अक्सर भक्त दंडवत (लेटकर) यात्रा करते देखे जाते हैं लेकिन शरीर को जंजीरों और सलाखों में कैद कर चढ़ाई करना, आधुनिक युग में आस्था की एक ऐसी मिसाल है जो विरले ही देखने को मिलती है। वहां मौजूद श्रद्धालुओं का कहना है कि उन्होंने आज तक अपनी आंखों से ऐसी मर्मस्पर्शी और कठिन यात्रा नहीं देखी। युवक की इस तपस्या ने भक्ति के पारंपरिक पैमानों को झकझोर कर रख दिया है।

कठिनाइयां हजार, पर चेहरा शांत
पहाड़ों की ठंडी हवा और तीखी चढ़ाई के बीच लोहे का वजन उठाना किसी भी इंसान को तोड़ सकता है। असहजता और थकान साफ नजर आती है, लेकिन उस युवक के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून है। यह सुकून शायद उस विश्वास से आ रहा है कि मां उसे शक्ति दे रही है। यह यात्रा केवल पहाड़ चढ़ने की नहीं बल्कि अपने संकल्प को सिद्ध करने की है। यह दृश्य न केवल आस्था को परिभाषित करता है, बल्कि यह सवाल भी छोड़ जाता है कि आखिर एक भक्त अपने आराध्य के लिए किस हद तक जा सकता है?

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