महंगाई बढ़ने की आशंका, वैश्विक स्तर पर बढ़ती ऊर्जा कीमतें और सामान्य से कमजोर मानसून का खतरा भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है. इसके बावजूद वित्त मंत्रालय की मई 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट राहत देने वाली तस्वीर पेश करती है. रिपोर्ट के मुताबिक मजबूत सेवा निर्यात, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और स्थिर श्रम बाजार की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है. हालांकि सरकार और केंद्रीय बैंक को आने वाले महीनों में सतर्क रहने की जरूरत होगी.

वित्त मंत्रालय ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि निकट अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था का परिदृश्य “सतर्क मजबूती” वाला है. रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 202627 में विकास की रफ्तार बनाए रखने और महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए मौद्रिक, राजकोषीय और संरचनात्मक नीतियों में संतुलन बनाना जरूरी होगा.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत सेवा निर्यात, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और श्रम बाजार की स्थिरता अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान कर रहे हैं. हालांकि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेजी, रुपये में कमजोरी, उत्पादन लागत में वृद्धि और सामान्य से कमजोर मानसून जैसे कारक चिंता का विषय बने हुए हैं.
महंगाई के मोर्चे पर बढ़ सकता है दबाव
वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि खुदरा महंगाई और थोक मूल्य सूचकांक के बीच बढ़ता अंतर यह संकेत देता है कि उत्पादन स्तर पर लागत का दबाव बढ़ रहा है. फिलहाल इसका असर उपभोक्ताओं पर सीमित दिख रहा है, लेकिन आने वाले महीनों में इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है. रिपोर्ट के अनुसार हाल में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से महंगाई पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का असर पड़ सकता है. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ऊर्जा कीमतों में और तेजी आती है तो महंगाई नियंत्रण के लिए उपलब्ध राहत का दायरा तेजी से कम हो सकता है.
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी वैश्विक चिंता
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष ने ऊर्जा, परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत को बढ़ा दिया है. इसके कारण दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव फिर से बढ़ रहा है और मंदी के साथ महंगाई यानी स्टैगफ्लेशन की चिंताएं भी उभर रही हैं. इसी वजह से दुनिया के कई प्रमुख केंद्रीय बैंक पहले की अपेक्षा लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीति बनाए रख सकते हैं. इसका असर विकसित देशों के सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी दिखाई दे रहा है, जो कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं.
उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अलगअलग असर
रिपोर्ट के मुताबिक उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर इस स्थिति का प्रभाव समान नहीं है. ऊर्जा आयात करने वाले देशों को मुद्रा में कमजोरी, पूंजी निकासी और बढ़ते आयात बिल का सामना करना पड़ रहा है. वहीं कमोडिटी निर्यातक देश अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं. कई देशों ने ऊर्जा बचत और मांग प्रबंधन जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. हालांकि यदि खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा बनी रहती है तो वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ सकता है और विभिन्न देशों की आर्थिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं.
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बनी उम्मीद
वित्त मंत्रालय का मानना है कि मौजूदा जोखिमों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है. सेवा क्षेत्र का निर्यात, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं. ऐसे में चुनौतियों के बीच भी भारत की विकास यात्रा पटरी पर बनी रहने की उम्मीद है, बशर्ते महंगाई और मानसून से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर रखी जाए.



