
क्या है हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ?
Hindu Rate of Growth: हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक समिट के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अतीत के एक ऐसे आर्थिक अध्याय का जिक्र किया, जो दशकों तक भारतीय अर्थव्यवस्था की पहचान बना रहा. उन्होंने “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” (Hindu Rate of Growth) का नाम लेते हुए उस दौर की आलोचना की, जब भारत की विकास दर बेहद सुस्त थी. पीएम मोदी का कहना था कि इस शब्द का इस्तेमाल करके पूरी भारतीय सभ्यता को ही ‘अनुत्पादक’ (Unproductive) और गरीब होने का टैग दे दिया गया था. प्रधानमंत्री के इस बयान ने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दिया है कि आखिर यह “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” क्या थी? क्या यह शब्द वास्तव में सांप्रदायिक था, या यह महज एक आर्थिक शब्दावली थी? और सबसे अहम सवाल यह कि भारत ने धीमी रफ्तार की इन बेड़ियों को तोड़कर दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था बनने का सफर कैसे तय किया? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं.
हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ क्या है?
अक्सर जब हम “हिंदू” शब्द सुनते हैं, तो हमारा ध्यान धर्म और संस्कृति की ओर जाता है, लेकिन अर्थशास्त्र के इतिहास में इसका संदर्भ थोड़ा अलग रहा है. ‘द न्यू ऑक्सफोर्ड कम्पैनियन टू इकोनॉमिक्स इन इंडिया’ के दस्तावेजों के अनुसार, इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने किया था. यह वह दौर था जब तमाम कोशिशों, युद्ध, अकाल और सरकारों के बदलने के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) औसतन 3.5% के आसपास अटकी हुई थी.
राज कृष्ण ने तर्क दिया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था में यह ठहराव किसी धार्मिक वजह से नहीं, बल्कि एक अजीबोगरीब निरंतरता के कारण था. चूंकि यह दर लंबे समय तक लगभग स्थिर बनी रही, इसलिए उन्होंने इसे एक सांस्कृतिक स्थायित्व से जोड़ते हुए “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” का नाम दिया. हालांकि, उस समय इसका मकसद किसी धर्म से नहीं, बल्कि उस धीमी रफ्तार की ओर दुनिया का ध्यान खींचना था.
सिर्फ एक शब्द नहीं, यह हमारी सभ्यता पर हमला था?
भले ही इस शब्द की उत्पत्ति एक आर्थिक संदर्भ में हुई हो, लेकिन समय के साथ इसके मायने बदलते चले गए. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में इसी ‘माइंडसेट’ पर प्रहार किया है. जानकारों का मानना है कि “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” का इस्तेमाल धीरे-धीरे एक एकेडमिक और कल्चरल भेदभाव का हथियार बन गया.
दशकों तक पाठ्यपुस्तकों, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में यह नैरेटिव सेट कर दिया गया कि भारत की धीमी तरक्की के पीछे उसकी संस्कृति और सामाजिक ढांचा जिम्मेदार है. यह एक तरह का ‘हिंदूफोबिया’ और औपनिवेशिक सोच (Colonial Mindset) का प्रतीक बन गया, जिसने यह स्थापित करने की कोशिश की कि भारतीय सभ्यता विकास के काबिल ही नहीं है. पीएम मोदी का इशारा इसी ओर था कि कैसे हमारी पहचान को खराब आर्थिक प्रदर्शन के साथ नत्थी कर दिया गया, जिसे उस समय किसी ने भी सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखा.
कछुए की चाल चल रही थी भारतीय अर्थव्यवस्था?
इतिहास के पन्नों को पलटें और आंकड़ों पर गौर करें, तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है. प्रोफेसर बालकृष्णन ने अपने एक निबंध में नेहरू युग (1951-64) के दौरान भारत की विकास दर का बारीकी से विश्लेषण किया है. आंकड़े बताते हैं कि औपनिवेशिक शासन (1900-1946) के दौरान भारत की जीडीपी ग्रोथ महज 0.9% थी, जो आजादी के बाद बढ़कर 4.1% हो गई थी.
दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में भारत की 4.1% की जीडीपी ग्रोथ, चीन की 2.9% से कहीं बेहतर थी. हालांकि, हम कोरिया (6.1%) से पीछे थे. प्रोफेसर बालकृष्णन का तर्क है कि राज कृष्ण का यह दावा कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे नीचे थी, पूरी तरह सही नहीं था. उस दौर में भारत की जनसंख्या वृद्धि दर 0.8% से बढ़कर 2% हो गई थी, जिसने प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) की बढ़ोतरी को आंकड़ों में छिपा दिया. यदि जनसंख्या वृद्धि दर अंग्रेजों के जमाने जितनी रहती, तो भारत की प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार अमेरिका और ब्रिटेन से भी तेज होती.
बेड़ियां टूटीं और दुनिया ने देखा भारत का दम
अब सवाल उठता है कि भारत ने इस ‘शापित’ विकास दर को पीछे कब छोड़ा? आम धारणा यह है कि 1991 के उदारीकरण (Liberalization) के बाद ही भारत की तस्वीर बदली. लेकिन, जीडीपी के आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं. अर्थशास्त्री बलदेव राज नायर के मुताबिक, भारत ने 1991 के सुधारों से बहुत पहले ही हिंदू ग्रोथ रेट की सीमा को लांघ दिया था.
आंकड़े गवाह हैं कि 1980 का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए टर्नअराउंड साबित हुआ. जहां 1956 से 1975 के बीच औसत ग्रोथ 3.4% थी, वहीं 1981 से 1991 के बीच यह बढ़कर 5.8% हो गई थी. अरविंद विरमानी और अरविंद पनगढ़िया जैसे दिग्गज अर्थशास्त्री इसका श्रेय 1980 के दशक में हुए सुधारों को देते हैं.
आज की स्थिति पर नजर डालें तो भारत “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” के उस दौर से कोसों दूर निकल चुका है. वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी दर 8.2 प्रतिशत रही है. जहां दुनिया के विकसित G7 देशों की वृद्धि दर 1-1.5 प्रतिशत के बीच संघर्ष कर रही है, वहीं भारत “हाई ग्रोथ और लो इन्फ्लेशन” (तेज विकास और कम महंगाई) के आदर्श मॉडल के रूप में उभरा है.



