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क्या बेडरूम की घड़ी चुरा रही है आपकी नींद? जानिए इसका साइकोलॉजिकल कनेक्शन

क्या बेडरूम की घड़ी चुरा रही है आपकी नींद? जानिए इसका साइकोलॉजिकल कनेक्शन

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून की नींद काफी अमूल्य है. बहुत से लोगों को रात में स्ट्रेस की वजह से नींद नहीं आती है तो कई लोग फोन यूज करने की वजह से बेहतर नींद से हाथ धो लेते हैं. पर क्या आपको पता है कि रात में बार बार घड़ी देखने से भी नींद नहीं आती है. रात में समय देखने की आदत दिमाग को आराम नहीं करने देती जिस वजह से दिमार हर समय इस कश्मकश में रहता है कि उसे कब उठना है. इसके पीछे एक गहरा साइकोलॉजिकल कनेक्शन छिपा हुआ है जिसे समझना बेहद जरूरी है.

नींद की क्वालिटी
में लगी घड़ी दिमाग को लगातार समय का एहसास कराती रहती है. इससे अनजाने में तनाव बढ़ता है और नींद की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है. जब इंसान समय देखने की चिंता छोड़ देता है तो दिमाग ज्यादा शांत होता है और नींद की क्वालिटी बेहतर होने लगती है. बहुत से लोगों को रात में कई बार घड़ी देखने की आदत होती है जिस वजह से 7-8 घंटे सोने के बाद भी उन्हें सुबह में फ्रेश महसूस नहीं होता है.

थकान
दिनभर की थकान के बाद जब रात में इंसान बिस्तर पर लेटता है तो दिमाग को आराम की जरूरत होती है. लेकिन जैसे ही नजर घड़ी पर जाती है दिमाग एक्टिव हो जाता है. ये सोच शुरू हो जाती है कि कितनी देर में नींद आएगी, कितने घंटे सो पाएंगे और सुबह कितनी जल्दी उठना है. इस चीजों को बार बार सोचने से स्ट्रेस बढ़ने लगता है और नींद की क्वालिटी खराब हो जाती है.

परफॉर्मेंस एंग्जायटी
साइकोलॉजी के अनुसार समय देखने की आदत परफॉर्मेंस एंग्जायटी पैदा करती है. इंसान खुद पर दबाव डालने लगता है कि उसे जल्दी सोना ही है. ये दबाव दिमाग को अलर्ट मोड में रखता है जिससे उसे आराम करने का मौका नहीं मिल पाता है. नतीजा ये होता है कि शरीर थका होने के बावजूद नींद नहीं आती है जिससे दिमाग भी थक जाता है.

मेलाटोनिन हार्मोन
बेडरूम में घड़ी की टिक टिक या डिजिटल घड़ी की रोशनी भी दिमाग को सिग्नल देती रहती है कि समय चल रहा है जिससे स्ट्रेस हो सकता है. ये सिग्नल मेलाटोनिन हार्मोन बनने में बाधा बनता है जो नींद के लिए जरूरी होता है. कई लोग अनजाने में आधी रात को जागकर समय देखते हैं और फिर दोबारा सोने में परेशानी महसूस करते हैं.

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