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36 साल बाद संसद में खामोश होगी ‘हाथी’ की चिंघाड़; 2026 में शून्य पर सिमट जाएगी मायावती की बसपा!

36 साल बाद संसद में खामोश होगी ‘हाथी’ की चिंघाड़; 2026 में शून्य पर सिमट जाएगी मायावती की बसपा!

Ramji Gautam Retirement: बहुजन समाज पार्टी के लिए सियासी चुनौतियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। उत्तर प्रदेश की सत्ता पर चार बार काबिज रहने वाली मायावती की पार्टी अब अपने सबसे बुरे दौर में पहुँच गई है। साल 2026 के अंत तक भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में बसपा का प्रतिनिधित्व पूरी तरह ‘शून्य’ हो जाएगा।

रामजी गौतम का रिटायरमेंट और ‘जीरो’ का आंकड़ा बसपा के लिए साल 2026 एक काला अध्याय साबित होने वाला है। वर्तमान में संसद के दोनों सदनों को मिलाकर बसपा के पास केवल एक ही सदस्य है- राज्यसभा सांसद रामजी गौतम। उत्तर प्रदेश के 10 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है, जिनमें रामजी गौतम भी शामिल हैं। 25 नवंबर 2026 को उनके रिटायर होते ही संसद के किसी भी सदन में बसपा का कोई सदस्य नहीं रह जाएगा। 1989 के बाद यह पहली बार होगा जब देश की सबसे बड़ी पंचायत में बसपा की आवाज सुनाई नहीं देगी।

36 साल का स्वर्णिम इतिहास और अब गहराता संकट

बसपा का गठन 1984 में हुआ था, लेकिन उसे पहली बड़ी चुनावी सफलता 1989 में मिली जब पार्टी के तीन सदस्य लोकसभा पहुंचे थे। तब से लेकर अब तक, चाहे पार्टी सत्ता में रही हो या विपक्ष में, संसद में उसका प्रतिनिधित्व हमेशा रहा है। यहाँ तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य सीटें जीतने के बावजूद राज्यसभा में बसपा के सदस्य मौजूद थे। खुद मायावती 1994 में पहली बार राज्यसभा सदस्य बनी थीं और तब से पार्टी का कोई न कोई नेता सदन में दलितों और पिछड़ों की आवाज उठाता रहा है। लेकिन अब यह सिलसिला टूटने की कगार पर है।

यूपी विधानसभा का गणित और बसपा की लाचारी

बसपा की इस बदहाली की सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश विधानसभा में उसकी नगण्य संख्या है। वर्तमान में 403 सदस्यों वाली यूपी विधानसभा में बसपा के पास केवल 1 विधायक है। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में बसपा के पास न तो अपने दम पर उम्मीदवार जिताने की ताकत है और न ही वह किसी का समर्थन करने की स्थिति में है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद से भी पार्टी पहले ही बाहर हो चुकी है।

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा और अस्तित्व की लड़ाई

चुनावी हार के साथ-साथ अब बसपा के ‘राष्ट्रीय पार्टी’ होने पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। 2024 के में पार्टी का खाता नहीं खुला और उसका वोट शेयर गिरकर मात्र 2.04 फीसदी रह गया है। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाए रखने के लिए कुछ कड़े मानकों को पूरा करना होता है, जिन पर बसपा फिलहाल खरी नहीं उतर रही है। यदि यह दर्जा छिनता है, तो यह पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका होगा।

2027 का चुनाव

आखिरी उम्मीद अब बसपा की सारी उम्मीदें 2027 के पर टिकी हैं। यदि पार्टी इस चुनाव में कम से कम 40 सीटें जीतने में सफल रहती है, तभी वह 2029 तक दोबारा राज्यसभा में अपना प्रतिनिधि भेज पाएगी। फिलहाल, पार्टी सुप्रीमो मायावती नई रणनीतियों और आकाश आनंद की सक्रियता के जरिए वापसी की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन डगर बहुत कठिन नजर आ रही है।

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