
मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण गुजरात के कपड़ा केंद्र सूरत में कॉस्ट बढ़ने का असर अब महसूस होने लगा है. कई यूनिट्स ने या तो अपने रोजाना काम करने के घंटे कम कर दिए हैं या फिर अपने उत्पादन के सक्रिय दिन घटा दिए हैं. कुछ पदाधिकारियों ने दावा किया कि उद्योग को इस समय रोजाना लगभग 100 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. सूरत शहर भारत में मानव निर्मित कपड़े के उत्पादन के सबसे बड़े केंद्रों में से एक है. साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने बढ़ती लागत को नियंत्रित करने के लिए इन इकाइयों के काम करने के दिनों को सात से घटाकर हफ़्ते में पांच दिन करने का फैसला किया है. संघ के अध्यक्ष जितेंद्र वक्तानिया उन्होंने कहा कि कच्चे माल और कोयले की बढ़ती कीमतों के कारण, सूरत और दक्षिण गुजरात का कपड़ा प्रसंस्करण उद्योग संकट का सामना कर रहा है.
रोज 100 करोड़ का नुकसान
फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के उपाध्यक्ष अशोक जिरावाला ने बताया कि कई यूनिट्स ने अपनी प्रोडक्शन साइकिल को भी 24 घंटे से घटाकर 12 घंटे प्रतिदिन कर दिया है, जिससे कुल उत्पादन पर असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि हालात काफी मुश्किल हो गए हैं, और उद्योग को रोजाना लगभग 90-100 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. इस संकट को मजदूरों की कमी ने और भी बढ़ा दिया है. उद्योग के अनुमानों के अनुसार मजदूरों की संख्या में 35 प्रतिशत की कमी आई है. जिरावाला ने बताया कि पिछले कुछ हफ़्तों में 2,000 से ज्यादा प्रवासी मजदूर शहर छोड़कर चले गए हैं. इससे पहले खाना पकाने वाली गैस सिलेंडरों की कमी के कारण मजदूरों का पलायन शुरू हो गया था, जिससे कामकाज पर और भी ज्यादा दबाव पड़ गया.
प्रोडक्शन हुआ आधा
उन्होंने बताया कि मैन मेड फाइबर सहित आयातित कच्चे माल की क़ीमतों में भी 30-35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. वक्तानिया ने कहा कि बुनाई, प्रोसेसिंग और व्यापार – इन सभी क्षेत्रों में काम में 25-30 प्रतिशत की गिरावट आई है. उन्होंने कहा कि मौजूदा मंदी के बावजूद, आने वाले शादी के मौसम से मांग बढ़ने और इस क्षेत्र को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है. कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंपालाल बोथरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संकट से पहले, उद्योग रोजाना लगभग सात करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन करता था. लेकिन अब उत्पादन घटकर लगभग आधा रह गया है.
लग सकता है 3 महीने का समय
उन्होंने कहा कि संघर्ष शांत होने और धागे की कीमतों तथा श्रमिकों की उपलब्धता जैसे कारकों के स्थिर होने के बाद भी उद्योग को पटरी पर लौटने में दो से तीन महीने लग सकते हैं. गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष संघवी ने हाल ही में सूरत में उद्योग जगत के लीडर्स के साथ एक समीक्षा बैठक की और श्रमिकों के लिए पांच किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडरों की पर्याप्त आपूर्ति का आश्वासन दिया.
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