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मेटाबॉलिज़्म स्लो होने पर चेहरे पर दिखने लगते हैं ये लक्षण, ऐसे करें पहचान

मेटाबॉलिज़्म
Image Source : UNSPLASH

ग्लोइंग स्किन पाने के लिए अक्सर लोग महंगे प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मेटाबॉलिज़्म को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिसका सीधा संबंध त्वचा से है। जब मेटाबॉलिज़्म सही तरीके से काम करता है, तो यह त्वचा को अंदर से रिपेयर करता है। वहीं, अगर मेटाबॉलिक हेल्थ बिगड़ जाए, तो इसका असर सबसे पहले आपकी त्वचा पर दिखने लगता है। चलिए जानते हैं वे संकेत कौन से हैं?

मेटाबॉलिज़्म स्लो होने पर चेहरे पर कौन से लक्षण दिखते हैं 

  • त्वचा का बेजान होना: अगर मेटाबॉलिज़्म धीमा हो, तो त्वचा के हर 28-49 दिनों में खुद को नया करने की प्राकृतिक क्षमता की अवधि बढ़ जाती है। इससे त्वचा की ऊपरी सतह पर मृत कोशिकाएं जमा होने लगती हैं, जिससे त्वचा थकी हुई, बेजान दिखाई देती है।

  • त्वचा का रूखा दिखना: त्वचा की सुरक्षा परत (skin barrier) को बनाए रखने और लिपिड के प्रोडक्शन में मेटाबॉलिज़्म की अहम भूमिका होती है। जब मेटाबॉलिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं, तो त्वचा कम मात्रा में प्राकृतिक तेलों का प्रोडक्शन करती है, जिससे त्वचा में रूखापन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

  • त्वचा पर दानों का आना:  इंसुलिन और एंड्रोजन जैसे हार्मोन में होने वाला असंतुलन सीधे तौर पर खराब मेटाबॉलिज़्म से जुड़ा होता है। जिन लोगों को इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होती है, उनके शरीर में सीबम का उत्पादन ज़्यादा होता है, जिससे अचानक से मुहांसे निकल सकते हैं। इसके अलावा, गंभीर किस्म के मुहांसों का उभरना अक्सर हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थों के सेवन और खराब मेटाबॉलिज़्म से जुड़ा होता है।

  • घावों की प्रक्रिया का धीमा पड़ना: अगर आपके कटने-छिलने के निशान, मुहांसों के दाग या त्वचा की जलन को ठीक होने में सामान्य से ज़्यादा समय लग रहा है, तो इसका एक कारण आपका मेटाबॉलिज़्म हो सकता है। त्वचा की मरम्मत की प्रक्रिया काफी हद तक कोशिकाओं की ऊर्जा, प्रोटीन के निर्माण और पोषक तत्वों की आपूर्ति पर निर्भर करती है और ये सभी चीज़ें मेटाबॉलिज़्म की कार्यक्षमता से प्रभावित होती हैं। 

मेटाबॉलिज़्म को कैसे बनाएं बेहतर?

मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाने पर ध्यान देने से त्वचा के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आएंगे। मेटाबॉलिज़्म को बढ़ाने का पहला तरीका है संतुलित भोजन करना, जिसमें प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, एंटीऑक्सीडेंट आदि शामिल हों। दूसरा, इंसुलिन संवेदनशीलता को बेहतर बनाने के लिए रोज़ाना किसी भी रूप में शारीरिक गतिविधि करें। इसके बाद, पर्याप्त आराम करें और तनाव को नियंत्रित करें, ताकि कोर्टिसोल के स्तर को नियमित किया जा सके

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

 

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