दिल्ली में रहने वाली वैशाली के लिए नवरात्रि सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि घर सजाने और फैमिली शॉपिंग का भी समय है. पहले वह बाजार जाकर डेकोरेशन का सामान खरीदती थीं, लेकिन इस बार उन्होंने आसपास की महिला कारीगरों से सामान खरीदा और घर पर ही डेकोरेशन आइटम बनाने शुरू किए. इससे उन्हें अपनी पसंद का सामान मिला और उन महिला कारीगरों की कमाई भी हुई, जिनके लिए फेस्टिव सीजन काम के बड़े मौके लेकर आता है.
त्योहारों की भागदौड़ से ऐपबेस्ड शॉपिंग तक
पितृपक्ष के बाद शुरू हुए फेस्टिव सीजन में ट्रेडिशनल फैशन, होम डेकोर और गिफ्टिंग जैसे बाजारों में मांग बढ़ जाती है. डिजिटल और मोबाइल एडवरटाइजिंग कंपनी ‘इनमोबी एडवरटाइजिंग’ और ‘ग्लांस’ की अक्टूबर 2026 में आई रिपोर्ट ‘द मार्केटर गाइड टू इंडियाज फेस्टिव सीजन 2026’ के मुताबिक, 77% भारतीय खरीदारों ने पिछले साल के मुकाबले इस बार अपना फेस्टिव शॉपिंग बजट बढ़ाया है. हर पांच में से तीन खरीदार 10,000 रुपये से ज्यादा खर्च करने की योजना बना रहे हैं. यह सर्वे 1,110 लोगों के बीच किया गया था.
सीनियर इकोनॉमिस्ट आकाश जिंदल के मुताबिक, महिलाओं की बढ़ती आमदनी के साथसाथ परिवार की खरीदारी से जुड़े फैसलों में भी उनकी भूमिका बढ़ रही है. वह कहते हैं, जैसेजैसे महिलाओं की इकोनॉमिक पावर बढ़ रही है, वैसेवैसे डिसीजन मेकिंग में उनकी भूमिका भी बढ़ रही है. फेस्टिवल पर परिवार के लिए क्या खरीदना है, इसकी मांग तय करने में महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं.
भोपाल में एथनिक फैशन ब्रांड चलाने वाली रिद्धिमा के लिए भी डिजिटल प्लेटफॉर्म कारोबार का तरीका बदल रहे हैं. वह कहती हैं कि ऐप्स और सोशलकॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए कस्टमाइज्ड फेस्टिव वियर के ऑर्डर मिलना और उनकी डिलीवरी करना आसान हो गया है. इस बार नवरात्रि के पहले हफ्ते के लिए उनके ऑर्डर पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी बढ़े हैं. डिजिटल पेमेंट और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट ने भी उनके कारोबार को आसान बनाया है.
फेमिनिन इकोनॉमी का इंजन: फेस्टिव मार्केट
पहले त्योहारों की खरीदारी के लिए बाजार जाना, टेलर के चक्कर लगाना और तैयारियों में काफी समय देना आम बात थी. अब ऑनलाइन शॉपिंग और डिजिटल पेमेंट ने ग्राहकों के साथसाथ छोटे कारोबारियों के लिए भी नए रास्ते खोले हैं.
पीटीआई की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा अर्थव्यवस्था का आकार 46,000 से 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. इस अर्थव्यवस्था से जुड़े हस्तशिल्प और पारंपरिक कला क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका भी अहम है. यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल के ‘रूरल क्राफ्ट एंड कल्चरल हब्स प्रोजेक्ट’ के लाभार्थियों में 58% महिलाएं हैं. हालांकि, यह आंकड़ा दुर्गा पूजा की पूरी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कुल हिस्सेदारी को नहीं बताता.
आकाश जिंदल कहते हैं कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने महिलाओं के लिए कारोबार शुरू करने की बाधाएं कम कर दी हैं. वह बताते हैं, पहले शोरूम खोलने और सामान बेचने के लिए कई तरह की व्यवस्थाएं करनी पड़ती थीं. अब महिलाएं ऑनलाइन एंटरप्राइज शुरू करके घर से भी अपना सामान बेच सकती हैं. इससे उनके लिए कारोबार करना ऑपरेशनल तौर पर आसान हुआ है.
साड़ी, ज्वेलरी और ब्यूटी प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग
क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी सीएमएआई की रिपोर्ट बताती है कि भारत का कपड़ों का बाजार 2025 में करीब 95.7 अरब डॉलर का था और 2029 तक इसके 146.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. रिपोर्ट में महिलाओं के कपड़ों की बिक्री में सालाना 8.9% वृद्धि का अनुमान भी जताया गया है.
मुंबई में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली तान्या को नवरात्रि के गरबा इवेंट से पहले एथनिक साड़ी और ऑक्सिडाइज्ड ज्वेलरी सेट चाहिए था. ऑफिस और घर के काम के बीच बाजार जाने का समय नहीं था, इसलिए उन्होंने एआईबेस्ड स्टाइलिंग ऐप और क्विककॉमर्स प्लेटफॉर्म का सहारा लिया. वहां उन्हें अपनी पसंद का कॉम्बिनेशन मिल गया और मेकअप किट समेत सारा सामान घर पहुंच गया.
जिंदल के मुताबिक, महिलाओं की भूमिका केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है. वे बाजार की मांग को समझकर नए प्रोडक्ट भी पेश कर रही हैं. उनका कहना है, गिफ्टिंग और महिलाओं की पसंद से जुड़े उत्पादों में महिला उद्यमियों को दूसरी महिलाओं की जरूरतों और उनके टेस्ट की बेहतर समझ का फायदा मिलता है. फेस्टिवल मार्केट में मांग और सप्लाई, दोनों तरफ महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है.
क्या डिजिटल फेस्टिव मॉडल लंबे समय तक टिकेगा?
आने वाले समय में पारंपरिक बाजार और डिजिटल शॉपिंग, दोनों साथसाथ चल सकते हैं. बाजार जाकर खरीदारी पसंद करने वाले ग्राहक ऑफलाइन स्टोर चुनेंगे और समय की कमी से जूझ रहे लोग ऐप्स का इस्तेमाल करेंगे.
फेमिनिन इकोनॉमी की असली परीक्षा सिर्फ तेज डिलीवरी या बढ़ती बिक्री नहीं है. बड़ा सवाल यह भी है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म महिला कारीगरों और छोटे कारोबारियों के लिए नियमित कमाई, बेहतर पहुंच और टिकाऊ कारोबार के अवसर पैदा कर पा रहे हैं? त्योहारों की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भूमिका तभी लंबे समय का बदलाव बनेगी, जब खरीदारी के साथसाथ उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़े.



