
उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं. उन पर एक जज को धमकाने का आरोप लगा है. वह इस वक्त देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त हैं. दरअसल, यह मामला गोंडा जिले की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान को फोन कर एक लंबित मुकदमे में दबाव बनाने से जुड़ा है. फोन करने का आरोप दुर्गा शक्ति नागपाल पर लगा है. अब इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त टिप्पणी की है. हाईकोर्ट ने कहा है कि पहली नजर में ऐसा लगाता है कि नागपाल ने जज को प्रभावित करने की कोशिश की. खैर अभी हम इस मामले की बात नहीं कर रहे हैं. बल्कि दुर्गा शक्ति नागपाल से जुड़े 2013 के एक विवाद की बात करते हैं जिसे पूरा सिस्टम हिल गया था. इसके बाद केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार आईएएस-आईपीएस से जुड़े नियमों में बदलाव करने की योजना बनाई. लेकिन वह इस काम को पूरा नहीं कर पाए. उधर, दुर्गा शक्ति अपनी बातों पर टिकी रहीं और फिर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सीएम रहे अखिलेश यादव को अपना फैसला वापस लेना. फिर 2015 में केंद्र की मोदी सरकार ने पूरे नियम-कायदे को बदल दिया.
क्या था दुर्गा शक्ति से जुड़ा 2013 का केस?
दुर्गा शक्ति नागपाल 2010 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. 2013 में उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले में उप जिलाधिकारी के तौर पर थी. उस वक्त अवैध रेत खनन को लेकर उनका अभियान चर्चा में आया. यमुना और हिंडन नदी के किनारे बड़े पैमाने पर अवैध बालू खनन की शिकायतें मिल रही थीं. नागपाल ने कार्रवाई शुरू की. कई जगह छापेमारी हुई. अवैध खनन में लगे लोगों पर कार्रवाई की गई. इसी दौरान कादलपुर गांव में एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिराने के मामले को उनके निलंबन की वजह बताया गया. जुलाई 2013 में अखिलेश यादव सरकार ने दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित कर दिया. सरकार की ओर से उस समय कहा गया कि उन्होंने धार्मिक स्थल की निर्माणाधीन दीवार गिराने का आदेश देकर कानून-व्यवस्था को खतरे में डाला. लेकिन, नागपाल ने इस आरोप को स्वीकार नहीं किया. उनके निलंबन के बाद मामला सिर्फ एक अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं रहा. देशभर में बहस शुरू हो गई कि क्या किसी आईएएस अधिकारी को राजनीतिक दबाव में इतनी आसानी से निलंबित किया जा सकता है?
अखिलेश यादव ने क्यों निलंबन वापस लिया?
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन पर देशभर में सवाल उठने लगे. सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मामले की चर्चा होने लगी. केंद्र सरकार ने भी उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया. उन्होंने नागपाल के निलंबन को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बात की थी. वहीं, नागपाल ने अपने निलंबन के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखी. वह अपने रुख से पीछे नहीं हटीं. आखिरकार उत्तर प्रदेश सरकार ने अक्टूबर 2013 में उनका निलंबन वापस ले लिया. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था. सवाल था कि क्या राज्य सरकारें अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के खिलाफ अपनी मर्जी से कार्रवाई कर सकती हैं? और अगर कर सकती हैं तो केंद्र की भूमिका क्या होगी?



