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​यूपी पुलिस ने एक दिन अवैध हिरासत में रखा तो कितना मुआवजा मिलेगा?

पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश पुलिस के कानूनी कार्रवाई को लेकर कोर्ट में कई बार सख्ती की गई है, कभी FIR दर्ज करने को लेकर तो कभी चार्जशीट फाइल जैसा मुद्दा सामने आया है. लेकिन, अब उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अवैध हिरासत के मामले पर एक अहम आदेश दिया है. कुछ वक्त पहले की बात करें, तो कोर्ट के सामने ऐसे कई केस आए हैं, जिसमें लोगों को अवैध हिरासत में लिया गया है. अब कोर्ट ने इस मामले पर मुआवजा लगाया है.

​यूपी पुलिस ने एक दिन अवैध हिरासत में रखा तो कितना मुआवजा मिलेगा?

किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लेना कानूनव्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम हो सकता है, लेकिन पुलिस या प्रशासन किसी को मनमाने तरीके से हिरासत में नहीं रख सकता. उत्तर प्रदेश में पुलिस किसी व्यक्ति को हिरासत में लेकर उसकी गिरफ्तारी दर्ज न करे और उसे कानूनी प्रक्रिया से दूर रखे, तो मामला गंभीर हो सकता है.

एक दिन के अवैध हिरासत का मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में साफ किया है कि बाद में की गई औपचारिक गिरफ्तारी पहले की गई अवैध हिरासत को सही नहीं बना सकती. हालांकि, अब कोर्ट के आदेश के मुताबिक, अवैध हिरासत में रखने के जून 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस बारे में एक अहम व्यवस्था दी थी.

कोर्ट ने कहा था कि BNSS के तहत शांति भंग के आरोप में किसी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाता है, तो राज्य को 25 हजार रुपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा. हालांकि, ये रकम अलगअलग खर्चों को मिलाकर बढ़ाई भी जा सकती है.

हाईकोर्ट के फैसलों से समझिए पूरा मामला

₹25 हजार प्रति दिन: BNSS के तहत शांति भंग के आरोप में 24 घंटे से ज्यादा की गैरकानूनी एहतियातन हिरासत पर हाईकोर्ट ने यह दर तय की.
₹2 लाख मुआवजा: मंसूर अहमद को 8 दिन तक गैरकानूनी हिरासत में रखने पर कोर्ट ने 25 हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 2 लाख रुपये देने का आदेश दिया.
₹75 हजार मुआवजा: चंदर पाल सिंह के मामले में तीन दिन की गैरकानूनी हिरासत के लिए 75 हजार रुपये देने का आदेश हुआ.
₹30 हजार मुआवजा: रवि चौरसिया के मामले में कोर्ट ने अवैध शुरुआती हिरासत के लिए 30 हजार रुपये देने का आदेश दिया.

30 हजार का मुआवजा देने का आदेश

7 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने प्रयागराज के रवि चौरसिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें 30 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने उन्हें 14 सितंबर को हिरासत में लिया, लेकिन गिरफ्तारी 16 सितंबर को दिखाई. यानी वह 24 घंटे से ज्यादा समय तक पुलिस की हिरासत में रहे, लेकिन इस दौरान उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया.

कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन माना. इस फैसले के साथ ही एक बड़ा सवाल उठता है कि अगर पुलिस किसी व्यक्ति को एक दिन या उससे ज्यादा समय तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखती है तो उसे कितना मुआवजा मिल सकता है?

साथ ही, जिस मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी की गलती सामने आएगी, उससे यह रकम वसूली जा सकती है और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी हो सकती है.

गिरफ्तारी से पहले हिरासत में रखना भी कानून के दायरे में

रवि चौरसिया के मामले में पुलिस ने उन्हें 14 सितंबर को अयोध्या से पकड़ा और प्रयागराज के सोरांव थाने ले गई. पुलिस ने उस समय उनकी गिरफ्तारी दर्ज नहीं की. उनकी मां 15 सितंबर को थाने पहुंचीं और इसके बाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई. अगले दिन यानी 16 सितंबर को पुलिस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया. कोर्ट ने थाने की CCTV फुटेज और पुलिस के जवाब को देखने के बाद पाया कि रवि पहले से पुलिस की हिरासत में थे.

पुलिस की ओर से जनरल डायरी में उनकी मौजूदगी दर्ज नहीं करने को गलती बताया गया. लेकिन कोर्ट ने इसे महज अनजाने में हुई गलती मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को पूछताछ या जांच के लिए पुलिस थाने लाया जाता है तो उसकी हिरासत का रिकॉर्ड जनरल डायरी में होना चाहिए. अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस किसी व्यक्ति को पहले गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दिखाकर उस कार्रवाई को सही नहीं कर सकती.

बाद की गिरफ्तारी भी पहली गलती नहीं सुधार सकती

इस मामले में हाईकोर्ट ने Fruit of the Poisonous Tree सिद्धांत का इस्तेमाल किया. आसान भाषा में इसका मतलब है कि अगर किसी कार्रवाई की शुरुआत ही गैरकानूनी है, तो उससे निकली आगे की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में आ सकती है. कोर्ट ने कहा कि रवि को पहले गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया और उसके बाद औपचारिक गिरफ्तारी की गई. इसलिए बाद की गिरफ्तारी और उससे जुड़ी रिमांड प्रक्रिया भी उस शुरुआती गैरकानूनी हिरासत से प्रभावित हुई.

कोर्ट ने पुलिस को रवि को रिहा करने का निर्देश दिया और 30 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. साथ ही प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करने को कहा. अगर जांच में सोरांव थाना प्रभारी की लापरवाही सामने आती है तो कोर्ट की नाराजगी को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश भी दिया गया.

अवैध हिरासत पर लगा ₹10 लाख का हर्जाना

अप्रैल 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनोज कुमार के मामले में भी पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की थी. कोर्ट के मुताबिक मनोज को 27 जनवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन गिरफ्तारी के लिखित कारण उन्हें नहीं बताए गए. 29 अप्रैल तक उनकी हिरासत जारी थी.

वह तीन महीने से ज्यादा समय जेल में रहे. कोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड को गैरकानूनी मानते हुए राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये की चेतावनी देने वाली भारी कीमत लगाई. हालांकि बाद में जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस 10 लाख रुपये के भुगतान वाले आदेश पर रोक लगा दी. इसलिए इसे फिलहाल दिए जा चुके मुआवजे के रूप में नहीं गिना जा सकता.

8 दिन की हिरासत पर 2 लाख का हर्जाना

जून में मंसूर अहमद के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 8 दिन की अवैध हिरासत पर 25 हजार रुपये प्रति दिन यानी कुल 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने एहतियातन हिरासत के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई. आंकड़ों के मुताबिक, गाजियाबाद में 1 मई 2025 से 30 अप्रैल 2026 तक 2,522 लोगों को 1 से 17 दिन तक हिरासत में रखा गया. वहीं प्रयागराज में ऐसे मामले 2024 के 283 से बढ़कर 2025 में 1,321 हो गए. 2026 में जून तक 721 मामले दर्ज हो चुके थे.

हाई कोर्ट के सख्त फैसले, लाखों का मुआवजा

सुनील कांडू: 2017 की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.
सचिन आर्य: कोर्ट के रिहाई आदेश के बावजूद करीब 20 घंटे की देरी हुई; हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए.
मनोज कुमार: 3 महीने से ज्यादा कथित अवैध हिरासत पर हाई कोर्ट ने 10 लाख रुपये की exemplary costs लगाई, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस भुगतान पर रोक लगा दी.
अनिल सोनी: हाई कोर्ट के गिरफ्तारी पर रोक वाले अंतरिम आदेश के बावजूद गिरफ्तारी के मामले में 5 लाख रुपये मुआवजा दिया गया और SHO पर विभागीय कार्रवाई के निर्देश हुए.
चंदर पाल सिंह: 24 घंटे से ज्यादा की अवैध हिरासत पर 25 हजार रुपये प्रति दिन, कुल 75 हजार रुपये मुआवजा दिया गया.
मंसूर अहमद: 8 दिन की अवैध हिरासत के लिए 2 लाख रुपये मुआवजा दिया गया, जिसकी वसूली जिम्मेदार अधिकारी की सैलरी से करने का निर्देश था.
यासीन मामला: पुलिस की ओर से जरूरी जानकारी नहीं देने के कारण जमानत सुनवाई में 10 दिन से ज्यादा की देरी हुई, जिस पर 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई गई.
विनोद कुमार सिंह: वाहन की अवैध जब्ती पर रिहाई तक 20 हजार रुपये प्रति माह मुआवजा और मानसिक/आर्थिक परेशानी के लिए 25 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश हुआ.
देवरिया के 4 लोग: गौरी बाजार थाने में कथित अवैध हिरासत के मामले में चारों को कुल 65 हजार रुपये मुआवजा दिया गया; रकम SHO की सैलरी से वसूलने का निर्देश हुआ.
अभिषेक त्यागी: गुंडा कंट्रोल एक्ट के तहत कार्रवाई रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने 50 हजार रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया. यह मामला सीधे अवैध हिरासत का नहीं था.
कमलेश कुमार: 15 से 19 अगस्त तक हिरासत में रखने और 19 अगस्त को ही गिरफ्तारी दिखाने के मामले में 50 हजार रुपये मुआवजा दिया गया.

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