
वर्ष 1998 के खन्ना रेल दुर्घटना मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए रेलवे की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने दावेदार दादा को दिए गए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा है।
यह मामला 26 नवंबर 1998 को हुए उस भीषण रेल हादसे से जुड़ा है, जिसे देश के सबसे बड़े रेल दुर्घटनाओं में गिना जाता है। खन्ना-लुधियाना रेलखंड पर कोलकाता जा रही सियालदह एक्सप्रेस और अमृतसर जाने वाली एक अन्य ट्रेन के बीच टक्कर हो गई थी। इस हादसे में करीब 212 लोगों की मौत हुई थी, जबकि लगभग 2500 यात्री दोनों ट्रेनों में सवार थे।
इस दुर्घटना में दावेदार की पोती की भी मौत हो गई थी। रेलवे दावा अधिकरण ने पहले दादा के पक्ष में चार लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसे केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
रेलवे का तर्क था कि मुआवजा केवल उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जो मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर हो, जबकि इस मामले में दादा आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे।
हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पंकज जैन ने स्पष्ट किया कि “निर्भरता” को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि परिवार में भावनात्मक जुड़ाव, देखभाल, स्नेह और मानसिक सहारा भी निर्भरता का अहम हिस्सा होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच विशेष भावनात्मक संबंध होता है, जिसे कानून की संकीर्ण व्याख्या में सीमित नहीं किया जा सकता। चूंकि दावेदार के पास कोई अन्य पोता या पोती नहीं थी, इसलिए यह रिश्ता और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मुआवजा पूरी तरह न्यायसंगत है और केंद्र सरकार की अपील में कोई दम नहीं है।
इस फैसले के साथ अदालत ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि मुआवजा कानूनों में “निर्भरता” का अर्थ केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक भी होता है।



