शिवसेना UBT में टूट की आहट तेज हो गई है. पार्टी की संसदीय दल की बैठक में 9 में से सिर्फ 3 सांसद पहुंचे, जबकि 6 सांसद गैरहाजिर रहे. उद्धव ठाकरे खेमे ने इन्हें नोटिस भेज दिया है और कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन सवाल है कि क्या बैठक में नहीं आने से सदस्यता जा सकती है? और दोतिहाई सांसद साथ हों तो कानून क्या कहता है?

दिल्ली में शिवसेना की संसदीय दल की बैठक बुलाई गई थी. मकसद था शक्ति प्रदर्शन, लेकिन तस्वीर कुछ और ही दिखी. 9 में से सिर्फ 3 सांसद पहुंचे और 6 सांसदों ने दूरी बना ली.
इन 6 सांसदों को लेकर दावा है कि वे शिंदे शिवसेना के साथ जाने की तैयारी में हैं. UBT ने इसे पार्टी अनुशासन का मामला बताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है. संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया कि अनुपस्थित सांसदों की सदस्यता रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी.
क्या बागी सांसदों की जाएगी सदस्यता?
लेकिन कानूनी तस्वीर और राजनीतिक बयानबाजी दोनों ही अलगअलग है. सदन में जारी व्हिप का उल्लंघन करना और संसदीय दल की बैठक में नहीं पहुंचना दोनों ही अलगअलग बातें हैं. दलबदल कानून सदन के अंतर मतदान के दौरान पार्टी निर्देशों की अवहेलना से संबंधित है.
यानी सिर्फ बैठक में अनुपस्थित रहने भर से सदस्यता पर खतरा नहीं आता. हां, अगर पार्टी इसे अनुशासनहीनता मानती है तो संगठनात्मक कार्रवाई कर सकती है.
दूसरी तरफ, अगर 9 में से 6 सांसद एक साथ अलग होकर शिंदे शिवसेना में विलय का दावा करते हैं, तो वे दोतिहाई संख्या के आधार पर मर्जर क्लॉज का सहारा ले सकते हैं. ऐसी स्थिति में फैसला लोकसभा अध्यक्ष को करना होगा.
जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट
एक्सपर्ट के अनुसार मीटिंग में नहीं आना अपने आप में दलबदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार नहीं है. अगर दोतिहाई सांसद किसी विलय के साथ जाते हैं तो उन्हें दसवीं अनुसूची के मर्जर प्रावधान का संरक्षण मिल सकता है। अंतिम निर्णय स्पीकर का होगा.
फिलहाल लड़ाई सिर्फ 6 सांसदों की गैरहाजिरी की नहीं, बल्कि शिवसेना UBT के अस्तित्व की है. एक तरफ उद्धव ठाकरे का खेमा इसे बगावत बता रहा है, दूसरी तरफ बागी सांसद संख्या बल के दम पर कानूनी सुरक्षा तलाश रहे हैं. ऐसे में अगली चाल सांसदों की नहीं, बल्कि स्पीकर के पाले में दिखाई दे रही है.



