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न बाबर का ईमान पक्का, न हुमायूं, मुगलों ने कैसे सियासी फायदे के लिए मज़हब को बनाया हथियार?

सियासी फायदे के लिए मज़हब के इस्तेमाल का चलन कोई नया नहीं है. मुगलों के दौर में तो यह नुस्खा लगातार आजमाया गया. कभी गंवाये राज्य को फिर से हासिल करने को तो कभी हुकुमत पर पकड़ मजबूत रखने की रणनीति या फिर दुश्मनों को अपने पाले में करने के लिए. असलियत में राजशाही के दौर में सियासी फायदे के लिए मज़हब को जरिया बनाने लेकिन उससे दूर दिखने के पाखंड की जरूरत नहीं थी. सुन्नी बाबर ने ईरान के बादशाह से मदद के एवज में शिया मत अपनाने की शर्त कुबूल की. फिर काम निकल जाने पर पलट गया.

न बाबर का ईमान पक्का, न हुमायूं, मुगलों ने कैसे सियासी फायदे के लिए मज़हब को बनाया हथियार?

शेरशाह से हारने के बाद उसके बेटे हुमायूं ने भी ईरान के बादशाह की शरण ली. वालिद की वादा खिलाफी की याद दिलाते हुए बादशाह ने वही शर्त उसके सामने रखी. हुमायूं ने भी तब शिया मत कुबूल किया लेकिन बाद में निगाह फेर ली. पढ़िए सियासत और मज़हब के रिश्तों को लेकर मुगल बादशाहों से जुड़े कुछ किस्से.

फिर बाबर पलट गया

मुगलों ने हिंदुस्तान पर सवा तीन सौ साल राज किया. इसकी नींव तैमूर वंश के बाबर ने डाली थी. हिंदुस्तान में दाखिल होने से पहले बाबर ने फरगना, समरकंद और मध्य एशिया में कई युद्ध लड़े. उस समय मध्य एशिया में उज़बेक शक्ति तेजी से बढ़ रही थी. मुहम्मद शायबानी खान बाबर के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों में एक था.

हिन्दुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाला मुगल बादशाह बाबर.

अकेले बाबर उसे पार नहीं पा रहा था. उसने ईरान के सफवी शासक शाह इस्माइल प्रथम से मदद मांगी. शाह ने 1501 में ईरान में सफवी सत्ता स्थापित की थी. उसने शिया मत को राज धर्म बनाया था. उज़बेकों के विरुद्ध सहायता के लिए शाह ने बाबर के सामने शिया मत कुबूल करने की शर्त रखी. बाबर ने इसे तब मान लिया. कुछ दिनों इसे व्यवहार में अपनाया. लेकिन बाद में बाबर पलट गया.

हुमायूं.

काम निकलने पर हुमायूं भी शर्त भूल गया

ईरान का शाह मुगलों की इस वादा खिलाफी को भूला नहीं था. 1530 में बाबर की मौत के बाद हिंदुस्तान की गद्दी पर उसका बेटा हुमायूं बैठा. शेरशाह सूरी ने उसे चुनौती दी. मुकाबले में हुमायूं चौसा और कन्नौज की लड़ाई में हार गया. हुमायूं को भारत छोड़ना पड़ा. वह सिंध, फिर ईरान की ओर गया. पिता बाबर की ही तरह आखिरी उम्मीद में वह ईरान के सफवी शासक के दरबार में पहुंचा. शाह मदद को राजी था. लेकिन इस बार भी उसकी शर्त पुरानी थी कि हुमायूं शिया मत को स्वीकार कर ले. हुमायूं राजी हो गया.

शाह ने उससे कहा कि अपने वालिद की तरह हमारी शर्त न भूलना. हुमायूं उस समय मोलभाव की हैसियत में नहीं था. राजपाट गंवाकर वह इधरउधर भटक रहा था. किसी शक्तिशाली सम्राट की मदद के बिना पुरानी हैसियत की वापसी मुमकिन नहीं थी. शाह की मदद से हुमायूं ने कंधार पर 1545 में जीत के बाद भारत की ओर एक बार फिर कदम बढ़ाए और आगे दिल्ली की सत्ता हासिल की. बाबर की तर्ज पर हुमायूं ने भी ईरान के शाह की शिया मत की शर्त को भुला दिया.

मुगल बादशाह अकबर. फोटो: Getty Images

अकबर की सियासत में मज़हबी टकराव नहीं

मुगल वंश में अकबर सबसे ज्यादा कामयाब शासक के तौर पर याद किया जाता है. इसकी बड़ी वजह थी कि उसने अपने राज में मज़हब को टकराव की वजह नहीं बनने दिया. साम्राज्य विस्तार और उसकी मजबूती के लिए उसने खुद को एक ऐसे शासक के तौर पर पेश किया जो दूसरे धर्मों के अनुयायियों से धार्मिक वजहों से बैर नहीं रखता. शुरुआती दौर में अकबर ने इस्लामी रास्ते से शासन किया, लेकिन जैसेजैसे उसका साम्राज्य बढ़ा, उसने अलगअलग समुदायों को साथ जोड़ा.

बड़ी शक्ति राजपूतों को साथ करने के लिए आमेर के राजघराने से उसने वैवाहिक संबंध स्थापित किए. 1563 में तीर्थ यात्रियों पर लगने वाला टैक्स और 1564 में जज़िया समाप्त कर दिया. 1575 में उसने फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनवाया, जहां सभी धर्मों के विद्वान साथ बैठते और संवाद करते थे. इतिहासकारों के मुताबिक अकबर की धार्मिक सहिष्णुता उसकी शासन शैली की रणनीति हिस्सा थी, जिसके जरिए सीमाओं के विस्तार के साथ ही वह कामयाबी के साथ शासन कर सका.

जहांगीर. फोटो: Getty Images

जहांगीर जुदा राह पर

राजपाट में मजहबी सवालों पर अकबर के आगे की नस्लें जुदा रास्ते पर चलीं. अकबर का जोर सुलहएकुल पर था. तुलना में जहांगीर और शाहजहां के समय में सियासत पर मज़हब का असर अधिक इस्लामिक और कट्टर रहा. हालांकि शासन व्यवस्था में राजपूतों का प्रभाव बना रहा लेकिन खासतौर पर युद्धों के दौरान कई मौकों पर मंदिरों के ध्वंस के उसने आदेश दिए. उसके बेटे खुसरो मिर्जा ने 1606 में बगावत की. पंजाब के रास्ते गुजरते उसने सिख गुरु अर्जन देव से मुलाकात की.

अपनी आत्मकथा तुज़ुकएजहांगीरी में जहांगीर ने लिखा कि गुरु अर्जन के बहुत से अनुयायी हो गए थे और शासन के लिए चुनौती बन रहे थे. जहांगीर ने गुरु जी को लाहौर में कैद किया . अमानवीय यातनाएं देकर जहांगीर के आदेश पर उन्हें मारा गया. इसकी वजह पर इतिहासकारों की राय में भिन्नता है. एक कारण बागी खुसरो को गुरु अर्जुनदेव का कथित समर्थन माना जाता है. लेकिन बड़े वर्ग की राय में गुरु अर्जन देव के समय तक सिख पंथ पंजाब में एक मजबूत सामाजिकधार्मिक समुदाय बन चुका था. धार्मिक स्वतंत्रता के लिए सिख मर मिटने को तैयार थे. जहांगीर में अकबर जैसी सहिष्णुता नहीं थी. गुरु अर्जन देव को निर्ममता से रास्ते से हटाकर सिखों हिंदुओं को अकबर का समय और सोच पीछे छूट जाने का संदेश दिया.

शाहजहां.

शाहजहां के समय इस्लामी कायदों पर जोर बढ़ा

अगली पीढ़ी के शाहजहां की सियासत में इस्लामी कायदों पर जोर बढ़ा. मंदिरों के निर्माण पर रोक और कुछ मंदिरों के ध्वंस के उसके आदेशों से पता चलता है कि अकबर का रास्ता उसे भी स्वीकार नहीं था. 1632 में बनारस और कुछ अन्य इलाकों के मंदिर उसने तुड़वाए.

राजपूत और अन्य हिंदू सरदार मुगल सत्ता का हिस्सा उसके समय में भी रहे लेकिन उनकी हैसियत मुस्लिम सरदारों की तुलना में कमतर थी. अगर अकबर की नीतियों से तुलना की जाए तो जहांगीर उस रास्ते से अलग हटकर चला. शाहजहां का शासन आने तक इस्लामी प्रभाव और अधिक बढ़ गया. हालांकि दोनों के शासन के समय व्यापक धर्मांतरण की सियासी कोशिशें नहीं चलीं लेकिन इस्लाम कुबूल करने के फायदों के पैग़ाम प्रजा के बीच शासन की नीतियों के जरिए जरूर पहुंचे.

औरंगजेब.

औरंगज़ेब ने सियासत को पहनाया मज़हबी बाना

औरंगज़ेब ने सियासत को पूरी तौर पर मज़हब का बाना पहना दिया. हिंदुओं के लिए उसके शासन में किसी उदारता की गुंजाइश नहीं थी. अकबर ने जिस जजिया कर को खत्म करके धार्मिक सहिष्णुता और हिंदू मुस्लिम मेल जोल का संदेश दिया था, औरंगज़ेब ने उसे पूरी सख्ती से लागू किया. उसके शासन में व्यापक पैमाने पर मंदिरों का ध्वंस और देव प्रतिमाओं का अनादर हुआ.

इस्लाम को राजधर्म घोषित कर शरीयत को शासन का आधार बनाया. जिहाद के जरिए दार उल हर्व भारत को दार उल इस्लाम में बदलना उसके शासन का मकसद था. इसके लिए उसने गैर मुस्लिम प्रजा को राजनीतिकसामाजिकधार्मिक पहलुओं पर अधिकारों से वंचित किया. आर्थिक रूप से उन पर अतिरिक्त बोझ डाला. मुस्लिम धर्म प्रचारकों को राज्य का संरक्षण दिया तो दूसरी ओर हिंदुओं के मंदिरों के ध्वंस और उनके तीज त्योहारों पर पाबंदियां थोप कर उन्हें कदमकदम पर अहसास दिलाया कि इन परेशानियों से इस्लाम कुबूल करके निजात मिल सकती है. इसके लिए प्रलोभन और प्रताड़ना दोनों रास्तों पर वह चला.

मशहूर इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार औरंगज़ेब के हुक्म से धर्म परिवर्तन करने वालों को सम्मान में हाथी पर बिठा गाजेबाजे के साथ जुलूस निकाला जाता था. कुछ लोगों को चार आना रोज के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी. नौकरियों में तरजीह दी जाती थी. भूमि विवादों में जो पक्ष इस्लाम कुबूल कर लेता उसके पक्ष में फैसला दे दिया जाता. अपराधिक मामलों में भी छूट का यह आसान उपाय था. दूसरी ओर प्राणों का भय दिखा भी बलात धर्मपरिवर्तन हुए. औरंगज़ेब की धर्मांधता की सियासत ने हिन्दू जनता के बीच व्यापक असंतोष पैदा कर उसे विद्रोह के रास्ते पर डाला. मुगल साम्राज्य के पतन की वजहों में औरंगज़ेब के शासन और नीतियों की बड़ी भूमिका थी.

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