लकवा, बोलने में परेशानी या शरीर के एक हिस्से में कमजोरी जैसे लक्षणों को ब्रेन स्ट्रोक से जोड़ा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार स्ट्रोक बिना किसी साफ लक्षण के भी हो सकता है? मेडिकली इसे साइलेंट स्ट्रोक या साइलेंट ब्रेन इंफार्क्ट पुकारा जाता है. इस सिचुएशन का तब पता चलता है, जब सिर में दर्द या दूसरी वजह से से कराए गए एमआरआई से ब्रेन में इसके निशान दिखाई देते हैं.

इस तरह का स्ट्रोक तुरंत लकवा नहीं करता, लेकिन आगे चलकर में डिमेंशिया, याददाश्त कमजोर होने और बड़े स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है. डॉ. रितु झा के मुताबिक हमें साइलेंट स्ट्रोक को भूल से भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.
ये बताता है कि दिमाग की छोटी रक्त वाहिकाएं प्रभावित हो रही हैं और आने वाले समय में सीरियस न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम्स का जोखिम बढ़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि साइलेंट स्ट्रोक क्या होता है? इसके लक्षण क्या है और इससे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है.
क्या होता है Silent Brain Infarct?
डॉ रितु कहती हैं कि जब दिमाग के किसी छोटे हिस्से में कुछ समय के लिए रक्त प्रवाह रुक जाता है, तो वहां के सेल्स डैमेज होने लगते हैं. अगर ये नुकसान ऐसी जगह में होता है, जहां तुरंत स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, तो मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसे स्ट्रोक हुआ है. ये सिचुएशन साइलेंट ब्रेन इंफार्क्ट कहलाती है. हालांकि, मरीज सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन समय के साथ ऐसे कई छोटेछोटे स्ट्रोक मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं.
किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा होता है?
एक्सपर्ट ने बताया हाई ब्लड प्रेशर के मरीज, डायबिटीज से पीड़ित लोग, हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान या तंबाकू का सेवन, मोटापा, हृदय रोग या अनियमित धड़कन , जेनेटिक और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में साइलेंट स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है.
एमआरआई में कैसे पता चलता है?
साइलेंट ब्रेन इंफार्क्ट की पहचान आमतौर पर एमआरआई से होती है. कई बार मरीज सिरदर्द, चक्कर या किसी अन्य कारण से ये जांच कराता है और उसे पुराने छोटे स्ट्रोक के निशान दिखाई देते हैं. ये टेस्ट मस्तिष्क के उन हिस्सों को भी दिखा सकता है, जहां पहले रक्त प्रवाह बाधित हुआ था.
क्या इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है?
डॉ रितु बताती हैं कि यदि समय के साथ कई साइलेंट स्ट्रोक होते रहें, तो मस्तिष्क की कोशिकाओं को लगातार नुकसान पहुंचता है. इससे वैस्कुलर डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. यही कारण है कि साइलेंट स्ट्रोक की पहचान होने के बाद जोखिम कारकों को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है.
उनके मुताबिक समय पर जोखिम कारकों को कंट्रोल करके और सही ट्रीटमेंट से भविष्य में होने वाले गंभीर स्ट्रोक और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
कैसे करें बचाव?
विशेषज्ञों के अनुसार, साइलेंट स्ट्रोक से बचाव के लिए ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना चाहिए. धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाएं, नियमित व्यायाम करें, संतुलित आहार लें, पर्याप्त नींद लें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाओं का नियमित सेवन करें. जिन लोगों में स्ट्रोक का जोखिम अधिक है, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए.



