
गरुड़ पुराण – भाग 1
गरुड़ पुराण के पूर्व खंड में भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं गरुड़ जी को सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य बताते हैं। यह वर्णन केवल संसार की रचना का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भी समझाता है कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और इस जीवन का उद्देश्य क्या है।
1. सृष्टि से पहले क्या था?
भगवान विष्णु कहते हैं कि एक समय ऐसा था जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा, न दिन था और न रात। न देवता थे, न मनुष्य, न पर्वत, न समुद्र। चारों ओर केवल अनंत जल और परमब्रह्म भगवान नारायण का अस्तित्व था।
उन्हीं की इच्छा से सृष्टि की रचना का संकल्प हुआ। भगवान की योगमाया सक्रिय हुई और सृष्टि का आरंभ प्रारंभ हुआ।
शास्त्रीय प्रमाण
“नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।
अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी॥”
भावार्थ: भगवान नारायण अव्यक्त प्रकृति से भी परे हैं। उन्हीं से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई और उसी ब्रह्मांड में सभी लोक तथा पृथ्वी की रचना हुई।
2. ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई?
भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल पर चतुर्मुख ब्रह्माजी का जन्म हुआ। प्रारंभ में ब्रह्माजी अपने जन्म का कारण नहीं समझ सके। उन्होंने कमल की डंडी के मूल तक पहुँचने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुए।
तब उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की। भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देकर सृष्टि की रचना का ज्ञान प्रदान किया। उनके आदेश से ब्रह्माजी ने चौदह लोकों, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और समस्त चराचर जगत की रचना की।
3. पंचमहाभूतों की उत्पत्ति
गरुड़ पुराण के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि पाँच मूल तत्वों से बनी है, जिन्हें पंचमहाभूत कहा जाता है।
आकाश – सबसे पहले आकाश की उत्पत्ति हुई, जिससे ध्वनि प्रकट हुई।
वायु – आकाश से वायु उत्पन्न हुई, जिससे स्पर्श का अनुभव संभव हुआ।
अग्नि – वायु से अग्नि प्रकट हुई, जिससे प्रकाश और रूप की उत्पत्ति हुई।
जल – अग्नि से जल उत्पन्न हुआ, जिससे रस और जीवन का आधार बना।
पृथ्वी – जल से पृथ्वी प्रकट हुई, जिसमें गंध का गुण समाहित हुआ और समस्त जीवों के रहने योग्य संसार बना।
हमारा शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित है। मृत्यु के बाद यही शरीर पुनः इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा सनातन है।
4. भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव की भूमिका
गरुड़ पुराण में त्रिदेवों की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से बताई गई हैं।
भगवान विष्णु – सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और समस्त ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी इच्छा से ही सृष्टि का आरंभ होता है।
ब्रह्माजी – भगवान विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना करते हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, लेकिन सर्वोच्च परमात्मा नहीं।
भगवान शिव – जब सृष्टि का एक चक्र पूर्ण हो जाता है, तब भगवान शिव संहार की लीला करते हैं, जिससे नई सृष्टि के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। उनका संहार विनाश नहीं, बल्कि पुनः सृजन की तैयारी है।
इस प्रकार सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार तीनों कार्य ईश्वर की दिव्य व्यवस्था के अंतर्गत चलते हैं।
5. समय चक्र और कल्पों का वर्णन
गरुड़ पुराण बताता है कि समय कभी रुकता नहीं। ब्रह्मांड एक निश्चित चक्र में चलता है।
चार युग होते हैं—
- सतयुग
- त्रेतायुग
- द्वापरयुग
- कलियुग
इन चारों युगों का एक चक्र महायुग कहलाता है। ऐसे एक हजार महायुग मिलकर ब्रह्माजी का एक दिन अर्थात एक कल्प बनाते हैं। जब ब्रह्माजी का दिन समाप्त होता है, तब आंशिक प्रलय होती है। पुनः उनके दिन के आरंभ में नई सृष्टि का विस्तार होता है।
ब्रह्माजी के सौ वर्ष पूर्ण होने पर महाप्रलय होती है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान में लीन हो जाता है। समय के इस अनंत चक्र में सृष्टि बार-बार उत्पन्न होती है और पुनः विलीन हो जाती है।
इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- भगवान ही सम्पूर्ण सृष्टि के आदि और अंतिम कारण हैं।
- हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है और एक दिन इन्हीं में मिल जाएगा।
- केवल आत्मा ही शाश्वत है, इसलिए शरीर के बजाय आत्मा के कल्याण पर ध्यान देना चाहिए।
- धन, पद और अहंकार सब यहीं रह जाते हैं; केवल कर्म ही आत्मा के साथ जाते हैं।
- इसलिए मनुष्य को धर्म, सत्य, सेवा और भगवान के नाम-स्मरण में जीवन बिताना चाहिए।
अगले भाग में:
भगवान विष्णु की महिमा – क्यों उन्हें जगत का पालनकर्ता और परम पुरुष कहा गया है?
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे



