तेल कंपनियां फिलहाल E85 ईंधन की बिक्री का बड़े स्तर पर विस्तार करने से बच रही हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह E100 ईंधन के साथ मिला निराशाजनक अनुभव है. उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि करीब 400 पायलट E100 पेट्रोल पंपों पर ईंधन की मांग लगभग न के बराबर रही. ऐसे में कंपनियां चाहती हैं कि पहले फ्लेक्सफ्यूल वाहनों की बिक्री बढ़े, उसके बाद ही E85 नेटवर्क का विस्तार किया जाए. सरकार एथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा देकर कच्चे तेल के आयात और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना चाहती है.

एक वरिष्ठ इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमने शुरुआत में करीब 400 पंपों पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर E100 उपलब्ध कराया था, लेकिन इसकी मांग लगभग नहीं के बराबर रही. इसलिए अब इसे घटाकर सिर्फ 56 आउटलेट तक सीमित कर दिया गया है. सरकार लगातार इसे बढ़ावा दे रही है, लेकिन हम फिलहाल हालात पर नजर रख रहे हैं.”
फ्लेक्सफ्यूल वाहनों की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती
E100 पूरी तरह एथेनॉल से बना ईंधन है, जिसे सिर्फ फ्लेक्सफ्यूल वाहनों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं E85 में 85% एथेनॉल और 15% पेट्रोल होता है, लेकिन इसके लिए भी फ्लेक्सफ्यूल इंजन जरूरी है. देश में ऐसे वाहनों की संख्या बहुत कम होने के कारण इन ईंधनों का विस्तार रुक गया है.
उद्योग का कहना है कि जब तक फ्लेक्सफ्यूल वाहनों की बिक्री पर्याप्त स्तर तक नहीं पहुंचती, तब तक बड़ी संख्या में E85 पंप लगाना व्यावहारिक नहीं होगा.
E25 लागू करने की रफ्तार भी हो सकती है धीमी
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार E25 को लागू करने की योजना की रफ्तार भी धीमी कर सकती है. इसकी वजह यह चिंता है कि ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन से मौजूदा वाहनों के इंजन पर असर पड़ सकता है.
जानकारी के अनुसार, 2012 से मार्च 2023 के बीच बने वाहन केवल E10 के लिए डिजाइन किए गए थे. वहीं अप्रैल 2025 से पहले बने अधिकांश वाहन पूरी तरह E20 के अनुरूप भी नहीं हैं.
सरकार का लक्ष्य बड़ा, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले महीने E100 के इस्तेमाल को कानूनी मंजूरी देने वाले नियमों को मंजूरी दी थी. योजना के तहत दिसंबर तक करीब 500 फ्लेक्सफ्यूल आउटलेट और 2027 के अंत तक प्रमुख शहरों में लगभग 5,000 आउटलेट शुरू करने का लक्ष्य है.हालांकि, फिलहाल देशभर में केवल करीब 48 पेट्रोल पंपों पर ही E85 उपलब्ध है और वहां भी ग्राहकों की संख्या बेहद कम है.
कीमत भी बनी बड़ी वजह
OMCs का मानना है कि E85 की मांग कम रहने की एक बड़ी वजह इसकी कीमत और सीमित बचत है. दिल्ली में E85 की कीमत 82.12 रुपये प्रति लीटर है, जबकि पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है.
एक अध्ययन के मुताबिक, मौजूदा कीमतों पर शुद्ध एथेनॉल कई मामलों में पेट्रोल की तुलना में 2% से 14% तक महंगा पड़ता है. इसकी वजह यह है कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए समान दूरी तय करने के लिए वाहन को ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ती है. इससे इसकी वास्तविक लागत पेट्रोल के मुकाबले 15% से 25% तक अधिक हो जाती है.
रिपोर्ट के अनुसार, अगर एथेनॉल को पेट्रोल से सस्ता विकल्प बनाना है तो इसकी कीमत करीब 52 से 63 रुपये प्रति लीटर के बीच होनी चाहिए. लेकिन यह कीमत मौजूदा उत्पादन लागत से काफी कम है. ऐसे में जब तक एथेनॉल सस्ता नहीं होता और फ्लेक्सफ्यूल वाहनों की संख्या नहीं बढ़ती, तब तक तेल कंपनियों के लिए E85 और E100 के विस्तार में तेजी लाना मुश्किल माना जा रहा है.



