भाग 5.1 (अध्याय–3)

मृत्यु के समय शरीर में क्या होता है? – पाँच प्राण, इन्द्रियों का लय और अंतिम क्षण का शास्त्रीय रहस्य
॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
भगवान श्रीहरि विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—
“हे गरुड़! मृत्यु एक क्षण की घटना नहीं है। यह शरीर, प्राण और आत्मा के बीच चलने वाली एक गहन प्रक्रिया है। जिसे संसार केवल ‘मृत्यु’ कहता है, वह वास्तव में प्रकृति के नियमों के अनुसार होने वाला परिवर्तन है।”
मनुष्य बाहर से केवल इतना देखता है कि किसी व्यक्ति की साँस रुक गई और उसका शरीर निश्चल हो गया। लेकिन गरुड़ पुराण बताता है कि उस अंतिम क्षण में शरीर के भीतर अनेक सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं।
पाँच प्राण क्या हैं?
योग और वैदिक शास्त्रों में शरीर के भीतर पाँच प्रमुख प्राण बताए गए हैं—
- प्राण – श्वास और हृदय की क्रियाओं का संचालन।
- अपान – शरीर से मल-मूत्र आदि के निष्कासन का नियंत्रण।
- समान – भोजन के पाचन और ऊर्जा के संतुलन का कार्य।
- उदान – वाणी, चेतना और ऊपर की ओर गति का संचालन।
- व्यान – पूरे शरीर में ऊर्जा और रक्त के प्रवाह का संतुलन।
गरुड़ पुराण संकेत देता है कि जब मृत्यु का समय आता है, तब ये प्राण अपनी-अपनी क्रियाएँ धीरे-धीरे समेटने लगते हैं। शरीर की शक्ति कम होने लगती है और अंततः आत्मा सूक्ष्म शरीर के साथ शरीर से अलग हो जाती है।
इन्द्रियाँ कैसे शांत होती हैं?
मृत्यु के समीप पहुँचने पर इन्द्रियाँ धीरे-धीरे अपनी शक्ति खोने लगती हैं।
सबसे पहले शरीर दुर्बल होता है। फिर देखने, सुनने, बोलने और स्पर्श की क्षमता कम होती जाती है। अंत में शरीर पूरी तरह निश्चल हो जाता है।
गरुड़ पुराण इस प्रक्रिया का वर्णन इसलिए करता है ताकि मनुष्य समझ सके कि शरीर नश्वर है और इस पर अहंकार करना उचित नहीं।
अंतिम समय में मन की स्थिति
भगवान विष्णु कहते हैं कि अंतिम समय में मनुष्य का मन अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जिस व्यक्ति ने जीवन भर सत्य, भक्ति, सेवा और भगवान के नाम का अभ्यास किया है, उसका मन उस समय अपेक्षाकृत शांत रह सकता है।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति केवल लोभ, क्रोध, मोह और अन्याय में जीवन बिताता है, उसका मन अशांत और व्याकुल हो सकता है।
इसी कारण संतजन जीवनभर भगवान के नाम-स्मरण का अभ्यास करने की प्रेरणा देते हैं।
क्या मृत्यु अचानक होती है?
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु का अंतिम क्षण भले ही अचानक दिखाई दे, लेकिन शरीर लंबे समय से उस दिशा में बढ़ रहा होता है।
जन्म के साथ ही शरीर में परिवर्तन आरंभ हो जाता है—
- बाल्यावस्था
- युवावस्था
- प्रौढ़ावस्था
- वृद्धावस्था
यह क्रम हमें याद दिलाता है कि शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा शाश्वत है।
मृत्यु के समय भगवान का स्मरण क्यों?
भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—
यदि मनुष्य ने पूरे जीवन भगवान का नाम नहीं लिया, तो अंतिम क्षण में मन को स्थिर करना कठिन हो सकता है।
इसीलिए शास्त्रों में प्रतिदिन नाम-जप, सत्संग और भक्ति का महत्व बताया गया है।
मृत्यु के समय भगवान का स्मरण कोई अंतिम क्षण का उपाय नहीं, बल्कि पूरे जीवन की साधना का परिणाम होता है।
शास्त्रीय प्रमाण
“अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥” (भगवद्गीता 8.5)
भावार्थ:
जो मनुष्य अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरी दिव्य अवस्था को प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
मृत्यु हमें क्या सिखाती है?
गरुड़ पुराण कहता है कि मृत्यु का स्मरण मनुष्य को निराश करने के लिए नहीं, बल्कि जागृत करने के लिए है।
यदि प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन कुछ क्षण यह स्मरण करे कि एक दिन यह शरीर छूट जाएगा, तो—
- उसका अहंकार कम होगा।
- दूसरों के प्रति व्यवहार मधुर होगा।
- समय का मूल्य समझ आएगा।
- धर्म और भक्ति के प्रति श्रद्धा बढ़ेगी।
यही मृत्यु के ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य है।
इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है।
- पाँच प्राण शरीर की जीवन-शक्ति का आधार हैं।
- अंतिम समय की शांति पूरे जीवन के आचरण पर निर्भर करती है।
- भगवान का स्मरण जीवनभर का अभ्यास होना चाहिए।
- मृत्यु हमें हर दिन सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
अगले अध्याय में
गरुड़ पुराण – भाग 5.1 (अध्याय–4)
“मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेत – क्या गरुड़ पुराण में मृत्यु के पूर्व संकेतों का वर्णन मिलता है? उनका वास्तविक अर्थ क्या है?”
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे



