
दूसरा अंतर… लाइन का अंतर भी इन्हें अलग करता है. हाईवे पर आमतौर पर 2 से 4 लेन होती हैं. ये गांव, कस्बों और शहरों को जोड़ती हैं. हाईवे अक्सर घनी आबादी वाले रास्ते से होकर गुजरते हैं. चौराहे, मोड़ के साथ इनके रास्ते में रुकावटें आ सकती हैं. वहीं, एक्सप्रेस-वे को खासतौर पर तेज रफ्तार के लिए डिजाइन किया गया है, जहां रास्ते में बाधाएं न हों. इनमें से 6 से 8 लाइनें होती हैं. यह तस्वीर एक्सप्रेस-वे की होती है. (फोटो: PTI)
तीसरा अंतर… बनावट और मजबूती की तुलना करें तो एक्सप्रेस-वे की बनावट और मजबूती हाईवे से ज्यादा बेहतर होती है. एक्सप्रेस-वे में रुकावट न होने के कारण इसे डिजाइन ही तेज गति के लिए किया जाता है. इसलिए यहां स्पीड लिमिट भी ज्यादा रखी जाती है. वहीं, नेशनल हाईवे पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नियमों के मुताबिक अधिकतम रफ्तार सीमा आमतौर पर कम रखी जाती है, क्योंकि इन पर स्थानीय ट्रैफिक, पैदल यात्री और छोटे वाहन भी चलते हैं.(फोटो: PTI)
चौथा अंतर… दोनों को बनाने के मकसद में भी बारीक सा अंतर है. हाईवे के निर्माण का उद्देश्य दूर-दराज के इलाकों, गांवों और शहरों को आपस में जोड़ना है ताकि आम जनता की रोजमर्रा की आवाजाही को आसान बना सकें. वहीं, एक्सप्रेस-वे दो बड़े शहरों के बीच की दूरी को कम करने के लिए बनाए जाते हैं. यानी लम्बी दूरी को कम समय में तय करने के लिए. यह तस्वीर मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे की है. (फोटो: PTI)
पांचवा अंतर… इनकी संख्या का अंतर भी फर्क पैदा करता है. भारत में करीब 600 नेशनल हाईवे हैं और 44 एक्सप्रेस-वे. इस तरह देश में हाईवे का नेटवर्क बेहद बड़ा है. देश का सबसे लंबा नेशनल हाईवे NH 44 है, जो श्रीनगर से कन्याकुमारी तक जाता है. लेकिन एक बात साफ है कि देश में बढ़ रहे हाईवे और एक्सप्रेस-वे सफर को आसान जरूर बना रहे हैं.



