डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारत से अमेरिका जाने वाले ज्यादातर सामान पर लगने वाले अतिरिक्त टैरिफ को 12.5% से घटाकर 10% कर दिया है. इससे भारतीय निर्यातकों को कुछ राहत मिलेगी और भारत को कई प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले व्यापार में बढ़त मिल सकती है. हालांकि, अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की लागत पहले की तुलना में फिर भी अधिक रहेगी.

नई टैरिफ व्यवस्था 24 जुलाई को अस्थायी Section 122 शुल्क खत्म होने के तुरंत बाद लागू हो गई. यह भारत के अमेरिका को होने वाले करीब 70% निर्यात पर लागू होगी. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने हाल ही में जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर नियम कड़े किए हैं. साथ ही नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच श्रम मानकों को लेकर हुई बातचीत के बाद अमेरिका ने टैरिफ कम करने का फैसला लिया.
भारत को कम टैरिफ क्यों मिला?
यह फैसला अमेरिका की Section 301 जांच के तहत लिया गया है. इस कानून के तहत अमेरिका उन देशों से आने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगा सकता है, जिनका संबंध उसकी नजर में जबरन मजदूरी से बने उत्पादों से हो. जून में जब प्रस्ताव आया था, तब भारत को 12.5% टैरिफ वाले समूह में रखा गया था.
लेकिन भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, श्रम मानकों पर अमेरिका के साथ सकारात्मक बातचीत और जबरन मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर भारत द्वारा प्रतिबंध लगाने के फैसले के बाद अमेरिका ने भारत के लिए टैरिफ घटाकर 10% कर दिया.
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव के अनुसार, 10% टैरिफ उन देशों पर लागू होगा जो पहले से ही जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगा चुके हैं, ऐसा करने का वादा कर चुके हैं या ऐसे आयात को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठा चुके हैं.
भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम समेत कुल 16 देशों पर भी 10% टैरिफ लागू होगा, जबकि जांच के दायरे में आने वाले कई अन्य देशों पर 12.5% शुल्क लगेगा.
भारतीय निर्यातकों पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले का असर अलगअलग सेक्टरों पर अलग होगा. Global Trade Research Initiative के मुताबिक, स्टील, एल्युमीनियम, तांबा, ऑटो कंपोनेंट्स और कुछ अन्य उत्पाद, जो पहले से Section 232 के तहत आते हैं, उन पर पहले की तरह 25% या 50% अतिरिक्त टैरिफ लागू रहेगा. यह भारत के कुल निर्यात का करीब 8% हिस्सा है.
कुछ चुनिंदा उत्पादों पर केवल सामान्य Most Favoured Nation टैरिफ ही लागू रहेगा. सबसे ज्यादा असर उन उत्पादों पर होगा जो भारत के अमेरिका को होने वाले लगभग 70% निर्यात का हिस्सा हैं. इनमें इंजीनियरिंग सामान, मशीनरी, केमिकल्स, प्लास्टिक, चमड़े के उत्पाद, जेम्स एंड ज्वेलरी, फर्नीचर और कई अन्य मैन्युफैक्चरिंग उत्पाद शामिल हैं. इन पर अब 10% का Section 301 टैरिफ, सामान्य MFN ड्यूटी के अलावा लगाया जाएगा.
हालांकि, GTRI ने कहा कि भारत को उन देशों की तरह टेक्सटाइल और गारमेंट्स टैरिफरेट कोटा में छूट नहीं मिली है, जो अमेरिकी कपास और फाइबर से बने कुछ उत्पादों के निर्यात पर बांग्लादेश, कंबोडिया, इंडोनेशिया और मलेशिया को दी गई है.
भारत को क्या मिलेगा फायदा?
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत को पूरी राहत नहीं देता, लेकिन प्रतिस्पर्धा में जरूर बढ़त दिलाता है. Grant Thornton Bharat के पार्टनर मनोज मिश्रा के अनुसार, भारत अब बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों के बराबर 10% टैरिफ वाले समूह में आ गया है. वहीं जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, वियतनाम, थाईलैंड, सिंगापुर और यूरोपीय संघ के कुछ उत्पादों पर प्रभावी टैरिफ 12.5% तक हो सकता है.
उनका कहना है कि इससे इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्पेशलिटी केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, मेडिकल डिवाइस और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत हो सकती है. हालांकि, GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है जिससे साबित हो कि भारत जबरन मजदूरी से बने उत्पादों का आयात करता है. उनका मानना है कि यह नया टैरिफ अस्थायी Section 122 शुल्क खत्म होने के बाद ट्रंप प्रशासन की व्यापक टैरिफ नीति को जारी रखने की रणनीति का हिस्सा ज्यादा लगता है.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि भविष्य में अमेरिका की दूसरी Section 301 जांच, जो अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता से जुड़ी है, उसके आधार पर औद्योगिक उत्पादों पर और अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं. इसके अलावा रूस से तेल खरीदने जैसे भूराजनीतिक मुद्दों के आधार पर भारत पर अलग से देशविशेष शुल्क लगाए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.



