Shrimad Bhagwat Katha By Jaya Kishori Agra: “रिश्ता कोई भी हो, यदि उसमें स्वार्थ है तो वह रिश्ता अधूरा है। प्रेम में स्वार्थ नहीं, समर्पण होना चाहिए। निस्वार्थ प्रेम वह शक्ति है, जिसके आगे स्वयं भगवान भी भक्तों के प्रेम में बंध जाते हैं।” यह भावपूर्ण संदेश प्रसिद्ध कथावाचक पूज्यश्री जया किशोरी ने श्रीमद्भागवत कथा के विश्राम दिवस पर श्रद्धालुओं को दिया।

अंतिम दिन हजारों की संख्या में उमड़े श्रद्धालु
फतेहाबाद रोड स्थित राजदेवम में श्रीश्याम परिवार सेवा ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े। पंडाल के भीतर जगह कम पड़ने पर सैकड़ों श्रद्धालुओं ने खड़े होकर कथा का श्रवण किया। कथा के समापन पर जब पूज्यश्री जया किशोरी विदा हुईं तो अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। पूरे पंडाल में “श्रीराधेराधे” और “हरि बोल” के जयकारे गूंजते रहे।
भगवान श्रीकृष्ण के निस्वार्थ प्रेम का दिया उदाहरण
जया किशोरी ने निस्वार्थ प्रेम का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमवश अपनी ठकुराई भुलाकर अर्जुन यानी पार्थ का सारथी बनना स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण के लिए प्रेम और भक्त का भाव सबसे ऊपर था। इसी प्रेम के कारण उन्होंने दुर्योधन के यहां मिलने वाले मेवामिष्ठान को त्यागकर अपने भक्त विदुर के घर जाकर सादा साग ग्रहण किया।
भजन के माध्यम से उन्होंने कहा, “प्रेम वश पारथ रथ हांका, भूल गए ठकुराई, सबसे ऊंची प्रेम सगाई, दुर्योधन की मेवा त्यागे, साग विदुर घर खाई…” उन्होंने कहा कि भगवान के साथ रिश्ता बनाने के लिए धन, वैभव या दिखावे की आवश्यकता नहीं होती। सच्चे प्रेम, समर्पण और भक्ति से ही भगवान को पाया जा सकता है।
जरासंध वध से परीक्षित मोक्ष तक भक्तिमय कथा
विश्राम दिवस पर पूज्यश्री जया किशोरी ने जरासंध वध, श्रीकृष्ण के 16,108 विवाह, सुदामा चरित्र और राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन के कर्म और उसके परिणाम का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। जीवन में सुख हो या दुख, व्यक्ति को जो भी प्राप्त होता है, उसके पीछे उसके कर्मों की भूमिका होती है। ऐसे में सुख के समय ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान का नाम नहीं छोड़ना चाहिए।
जया किशोरी ने कहा कि मनुष्य को अपने अच्छे कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म का हिसाब निश्चित है। उन्होंने कहा कि ईश्वर में आस्था रखने वाला व्यक्ति परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उसका नाम जपते हुए जीवन में आगे बढ़ सकता है।
राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा के साथ श्रीमद्भागवत कथा का विश्राम हुआ। समापन के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर जयकारे लगाए और कथा के अंतिम क्षणों को अपने भीतर संजो लिया।
पहले वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी
कथा के दौरान जया किशोरी ने वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था के बिगड़े स्वरूप पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पहले चारों वर्ण कर्म के आधार पर निर्धारित होते थे और उनका उद्देश्य समाज की सेवा करना था।
उन्होंने बताया कि समाज को शिक्षित करना, क्षत्रिय का समाज की रक्षा करना, वैश्य का समाज का पालनपोषण करना और शूद्र का सेवा कार्य करना था। लेकिन आज व्यक्ति के कर्मों में समाज की अपेक्षा उसका अपना हित अधिक दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि जिस व्यवस्था में सभी लोग समाज के लिए अपनेअपने दायित्व निभाते थे, वही व्यवस्था वास्तव में समाज को मजबूत बनाती थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और मानवता के लिए भी कर्म करे।
भजनों पर देर तक झूमे श्रद्धालु
कथा विश्राम के बाद भी भक्ति का रंग देर तक बरकरार रहा। के भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमते और नृत्य करते नजर आए।
“ऐसो चटक मटक सो ठाकुर तीनों लोकन में हूं नाहे…”,
“एक बार हमसे सांवरे नजरे मिलाइये…”,
“अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, दर पे सुदामा गरीब आ गया है…”,
“मीठे रस से भरी रे राधा रानी लागे…”,
“मोहन आवो तो सही, कान्हा के मंदिर में मीराबाई एकली खड़ी…”
जैसे भजनों पर श्रद्धालु काफी देर तक भक्ति में डूबे रहे। कई श्रद्धालु भावुक होकर झूमते और नृत्य करते दिखाई दिए। कथा के समापन ने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक और भावनात्मक माहौल में बदल दिया।
इस अवसर पर मुख्य रूप से बाबू रोशनलाल गुप्ता, राजकुमार गुप्ता, राधा गुप्ता, विकास मांगलिक, जयश्री मांगलिक, अनिल गुप्ता, विनीत मांगलिक, ऋषिक मांगलिक, अर्पित गुप्ता, विपिन गुप्ता, अंजू मांगलिक, तनु मांगलिक, रेखा गुप्ता, आकांक्षा गुप्ता, अलका गुप्ता, नीता गुप्ता, साक्षी गुप्ता, अर्चना गुप्ता सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।



