CrimeIndia

डांगावास कांड: 1500 रुपये में 23 बीघा जमीन गिरवी की कहानी, जिसमें हुईं 5 हत्याएं; CBI भी नहीं ढूंढ पाई कातिल, अब 40 आरोपी क्यों हुए बरी?

5 Dalits Massacre Story: राजस्थान के नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास हत्याकांड मामले में घटना के 11 साल बाद अदालत का बड़ा फैसला सामने आया है. साल 2015 में 23 बीघा विवादित जमीन के कब्जे को लेकर हुए खूनी संघर्ष और 5 दलितों की दर्दनाक मौत के मामले में अदालत ने सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने अपने 245 पन्नों के विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया है कि 14 मई 2015 को हिंसक घटना में 5 लोगों की मौत जरूर हुई थी, लेकिन CBI द्वारा पेश किए गए सबूत यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे कि इस अपराध को अंजाम देने वाले असल में कौन लोग थे.

डांगावास कांड: 1500 रुपये में 23 बीघा जमीन गिरवी की कहानी, जिसमें हुईं 5 हत्याएं; CBI भी नहीं ढूंढ पाई कातिल, अब 40 आरोपी क्यों हुए बरी?

इस मामले में एक तरफ जहां 5 दलितों की हत्या हुई थी, वहीं दूसरे पक्ष के भी एक व्यक्ति की गोली लगने से मौत हो गई थी. दलित संगठनों और राजनीतिक दबाव के बाद इस केस की जांच CBI को सौंपी गई थी. हालांकि, सीबीआई की चार्जशीट में गवाहों के बयानों का विरोधाभास, हथियारों की बरामदगी न होना और मुख्य आरोपियों की स्पष्ट पहचान न हो पाना अदालत में CBI के दावों पर भारी पड़ा.

नागौर जिले के डांगावास गांव में 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन के कब्जे को लेकर दो समुदायों के बीच वर्षों पुराना विवाद चल रहा था. सीबीआई जांच के मुताबिक, विवादित जमीन 1964 में 1500 रुपये में चिमनाराम जाट के पास गिरवी रखी गई थी. चिमनाराम की मौत के बाद उनके बेटों कानाराम और ओमाराम का जमीन पर कब्जा रहा, लेकिन बाद में रतनाराम मेघवाल ने जमीन वापस लेने के लिए वहां झोपड़ी और कमरा बना लिया.

14 मई 2015 का खूनी तांडव

14 मई 2015 को 200 से 250 लोग ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और हथियारों के साथ खेत में घुस आए. इस हिंसक झड़प में रतनाराम, पोखरराम, पांचाराम, खेमाराम और गणपतराम मेघवाल की मौत हो गई, जबकि दूसरे पक्ष के रामपाल पुरी की गोली लगने से जान चली गई.

वे 10 बड़े कारण, जिनके चलते CBI केस अदालत में ध्वस्त हो गया

1 किसी गवाह ने नहीं बताया किसने किसकी हत्या की

अदालत ने अपने 245 पन्नों के फैसले में सीबीआई जांच और अभियोजन पक्ष के दावों की बखिया उधेड़ कर रख दी. अदालत के फैसले का सबसे बड़ा आधार गवाहों के बयानों में स्पष्टता न होना रहा. मृतक रतनाराम के दोनों बेटे और उनकी पत्नी अदालत में किसी भी हमलावर की पहचान नहीं कर पाए. पांचाराम की पत्नी ने किसी आरोपी का नाम नहीं लिया, जबकि उनके बेटे ने बताया कि उनके पिता की मौत कमरा ढहने से हुई थी. पोखरराम और गणपतराम के परिजनों व गवाहों ने भी लगातार यही कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि जानलेवा हमला किसने किया.

2 ‘पूर्व नियोजित हत्या’ की सीबीआई थ्योरी खारिज

सीबीआई ने दावा किया था कि आरोपी पहले से हत्या की साजिश रचकर हथियारों के साथ खेत पहुंचे थे. गवाह सोनकी देवी ने बयान दिया कि पीड़ित पक्ष को पहले से सूचना थी कि गांव के लोग खेत पर जमा हो रहे हैं. गवाह के अनुसार, भीड़ आने के बाद करीब 2025 मिनट तक खेमाराम और मुन्नाराम हाथ जोड़कर लोगों से झगड़ा न करने की गुहार लगाते रहे. कोर्ट ने माना कि यदि दोनों पक्षों के बीच इतनी देर बातचीत हुई, तो यह मानना मुश्किल है कि भीड़ केवल हत्या के इरादे से आई थी.

3 एकतरफा हमला नहीं, दोनों पक्षों के बीच था हिंसक संघर्ष

अदालत ने माना कि यह मामला एकतरफा हमले का नहीं था. मुख्य गवाह श्रवणराम ने स्वीकार किया कि करीब एक घंटे तक दोनों पक्षों की तरफ से पथराव हुआ था. एक अन्य गवाह ने बताया कि मुख्य भीड़ खेत में नहीं, बल्कि 1.5 से 2 किलोमीटर दूर बस स्टैंड पर मौजूद थी, जिससे सीबीआई का 300 लोगों के सीधे हमले का दावा कमजोर पड़ा.

4 40 आरोपियों की भूमिका और पहचान में अस्पष्टता

घटना के दो घंटे के भीतर जांच अधिकारी के पास केवल 13 नाम थे, जो बाद में बढ़कर 40 हो गए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब यह साबित ही नहीं हुआ कि कौन व्यक्ति अवैध भीड़ का हिस्सा था, तब उसके खिलाफ सामूहिक अपराध का केस नहीं बनता.

5 हथियारों और आरोपियों का संबंध साबित न होना

मौके से लाठियां, सरिए, कुल्हाड़ी और चेन बरामद हुईं, लेकिन सीबीआई यह साबित नहीं कर सकी कि किस आरोपी के हाथ में कौन सा हथियार था.

6 ट्रैक्टर से कुचलने का आरोप साबित नहीं हुआ

CBI जिस ट्रैक्टर से झोपड़ी तोड़ने और लोगों को कुचलने का दावा कर रही थी, उस ट्रैक्टर को ही बरामद नहीं कर पाई. कोई भी गवाह अदालत में यह साबित नहीं कर सका कि कथित ट्रैक्टर मानाराम चला रहा था.

7 आगजनी के बदलते आरोपी

शुरुआती जांच में ओमाराम और कानाराम पर आगजनी का आरोप था, जो बाद में दीपूराम, श्यामलाल और मानाराम पर शिफ्ट कर दिया गया. इससे CBI की कहानी संदेहास्पद हो गई.

8 जमीन के वैधानिक कब्जे पर अनिश्चितता

कोर्ट ने पाया कि घटना के दिन विवादित जमीन पर असल में किसका कानूनी या वैधानिक कब्जा था, यह भी सीबीआई स्पष्ट नहीं कर पाई.

9 मेडिकल और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का विरोधाभास

डॉक्टरों ने माना कि रतनाराम और पोखरराम को लगी चोटें मकान का कमरा गिरने से भी लग सकती थीं. पांचाराम की मौत पत्थर लगने से हुई, लेकिन सैकड़ों की भीड़ में किसने जानलेवा पत्थर फेंका, यह कोई गवाह नहीं बता सका.

10 सीबीआई की चार्जशीट में तकनीकी व साक्ष्य संबंधी खामियां

CBI ने जून 2015 में एफआईआर दर्ज कर अगस्त 2015 में 6 लोगों और अक्टूबर 2016 में 34 अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की थी. साक्ष्यों की कड़ी न जुड़ पाने के कारण अदालत ने सभी 40 आरोपियों को संदेह का लाभ दिया.

अदालत की बड़ी टिप्पणी: ‘अपराध हुआ, पर कातिल साबित न हो सके’

अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में टिप्पणी करते हुए लिखा यद्यपि सभी आरोपी दोषमुक्त हो रहे हैं, लेकिन यह तथ्य निर्विवाद रूप से साबित है कि 14 मई 2015 की घटना में 5 व्यक्तियों की मौत हुई है. ऐसे में इस दोषमुक्ति का अर्थ यह कदापि नहीं है कि अपराध घटित ही नहीं हुआ. इसका अर्थ मात्र यह है कि अपराध कारित करने वाले व्यक्तियों को विधिसम्मत साक्ष्य द्वारा तय नहीं किया जा सका. कोर्ट ने इसके साथ ही मृतक के आश्रितों और सभी घायलों को SC/ST नियम 1995 तथा राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत उचित मुआवजा प्रदान करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं.

हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा पीड़ित पक्ष

अदालत के फैसले के बाद पीड़ित पक्ष के एडवोकेट अब्दुल सलीम अंसारी ने अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि वे न्यायिक व्यवस्था का सम्मान करते हैं, लेकिन इस फैसले से पीड़ित परिवार बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय केवल कागजों पर मिलना ही काफी नहीं है, बल्कि पीड़ित समाज को न्याय महसूस होना भी जरूरी है. पीड़ित पक्ष अब इस फैसले के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय में अपील दायर करेगा.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply