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कांटे से कांटा निकालना होगा

डॉ. विकास शुक्ला, लेखक

कांटे से कांटा निकालना होगा

बांग्लादेश अब दूसरा पाकिस्तान बन रहा है। पहले पाकिस्तान और चीन भारत के लिए खतरा थे, लेकिन अब बांग्लादेश भी उसी कतार में खड़ा हो गया है। समय रहते सरकार को चेतना होगा अन्यथा वहां की कट्टरपंथी सरकार हमारे लिए मुश्किलें पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बांग्लादेश में जब भी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनी भारत के लिए हालात मुश्किल ही रहे। अब तो वहां की सरकार खुलकर चीन और पाकिस्तान के समर्थन में गोद आ गई है और किसी न किसी बहाने भारत के विरुद्ध आग उगलती है। 

अभी भारत इस खतरे की काट खोज ही रहा था कि सऊदी अरब का पाकिस्तान के बताए रास्ते पर आगे बढ़ना चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे में अब भारत को अफगानिस्तान के साथ भी सैन्य समझौता करना चाहिए ताकि पाकिस्तान की ताबूत में आखिरी कील ठोकने में आसानी हो। साथ ही म्यांमार से अपने रक्षा संबंध और कूटनीतिक संबंध को और मजबूत करना होगा ताकि बांग्लादेश को भी जरूरत पड़ने पर सबक सिखाया जा सके। सऊदी अरब कभी पाकिस्तान के समर्थन में सिर न उठा सके इसके लिए संयुक्त अरब अमीरात को सैन्य दृष्टि से मजबूत करना होगा। ताकि जरूरत पड़ने पर कांटे से कांटा निकाला जा सके। 

बांग्लादेश को आजाद कराने में हमारे जवानों ने प्राणों की आहुति दी थी। इस बात को बांग्लादेश का बच्चाबच्चा मानता रहा है। इस अहसान के कारण ही शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान ने कभी भारत के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया और न ही शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते वहां भारत विरोधी गतिविधियां पनपीं। शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते दोनों देशों के बीच न सिर्फ व्यापार बढ़ा, बल्कि आर्थिक रूप से बांग्लादेश भी मजबूत हुआ। इतना ही नहीं चीन, अमेरिका और पाकिस्तान की दाल वहां कभी नहीं गली, लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की मुखिया खालिदा जिया के सत्ता में होने पर वहां भारत के लिए मुश्किलें पैदा हुईं। 

अब उनके बेटे तारिक रहमान सत्ता में हैं, तो भी अपनी मां के बताई राह पर चल रहे हैं। अब न सिर्फ वहां पाकिस्तान पैर जमा रहा है, बल्कि भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों पर चीन और अमेरिका की घुसपैठ भी वहां बढ़ रही है। तुर्किए भी घातक हथियार उसे देने जा रहा है। जाहिर सी बात है ये तैयारियां पाकिस्तान और चीन के इशारे पर हो रहीं हैं। बांग्लादेश भी इस्लामिक नाटो का हिस्सा हो सकता है ऐसी आशंका जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो भारत के लिए और मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसे में जरूरत है कि बांग्लादेश की काट के लिए हम म्यांमार से अपने रिश्ते को और प्रगाढ़ करें। 

बांग्लादेश और म्यांमार के बीच रोहिंग्या शरणार्थी संकट को लेकर तनाव है। बांग्लादेश आर्मी इस वक्त विद्रोही गुटों से परेशान है। हमें उसकी मदद करनी होगी ताकि बांग्लादेश हमारे लिए संकट उत्पन्न करे, तो म्यांमार हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो जाए। साथ ही अफगानिस्तान को भी सामरिक दृष्टि से मजबूती देने की आवश्यकता है ताकि पाकिस्तान जब भी सिर उठाए उसके फन को कुचलने में आसानी हो। तालिबान सरकार जरूरत पड़ने पर अपने एयरबेस हमें उपलब्ध करा सके। पाकिस्तान ने कभी भी अफगानिस्तान में शांति नहीं चाही, जबकि भारत वहां सदैव शांति का पक्षधर रहा है। उसके विकास में योगदान भी दे रहा है। दोनों देशों का दुश्मन एक ही है। 

बात करें सऊदी अरब की तो उसका पाकिस्तान के पाले में जाना हमारे लिए व्यापारिक दृष्टि से उचित नहीं है। सामरिक दृष्टि से भी सऊदी अरब का यह फैसला हमारे खिलाफ है। ऐसे में वहां के हुक्मरानों पर यह दबाव डालना होगा कि उनका कदम भारत विरोधी है इसलिए इस पर वे पुनर्विचार करें। यदि इसके बाद भी पाकिस्तान और सऊदी अरब की गलबहियां बनी रहती है, तो फिर हमें संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपना समझौता वैसा ही करना चाहिए जैसा कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच है।

सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। यदि हम ऐसा ही समझौता सऊदी अरब के विरोधी देश से करेंगे, तो निश्चित रूप से कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। सऊदी अरब के हुक्मरानों का पता है कि भारत यदि समझौता करेगा, तो वह सफल होगा, जबकि पाकिस्तान से उसका समझौता बहुत देर नहीं टिकेगा। क्योंकि पाकिस्तान की फितरत काम निकालो और भूल जाओ वाली है।  

अब देखना यह है कि पाकिस्तान की सरकार बांग्लादेश से सैन्य समझौता की पहल को कब सार्वजनिक करती है। वैसे उसकी कोशिश है कि उसका समझौता नाटो जैसा हो ताकि एक देश पर हमले को दोनों देशों पर हमला माना जाए। बांग्लादेश की सरकार गुपचुप तरीके से मिले इस समझौते को अभी परख रही है, लेकिन यदि ऐसा समझौता वहां के प्रधानमंत्री करते हैं, तो यह मान लिया जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसा भारत को ध्यान में रखकर किया है और अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है।

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