Moradabad News: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे महान नायकों के नाम दर्ज हैं, जिनके त्याग और अदम्य साहस ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं. उन्हीं अग्रिम पंक्ति के जुझारू महानायकों में से एक सूफ़ी अम्बा प्रसाद थे. मूल रूप से अगवानपुर व मुरादाबाद के मोहल्ला क़ानून गोयान से ताल्लुक रखने वाले सूफ़ी अम्बा प्रसाद न केवल एक उच्च शिक्षित विचारक और पत्रकार थे, बल्कि एक ऐसे प्रखर क्रांतिकारी भी थे जिनकी कलम और विचारों से अंग्रेज़ हुक्मरान थरथर कांपते थे.

बरेली कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने वाले सूफ़ी साहब उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे. जीवन की राह में पत्नी के असामयिक निधन के बाद सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने वैराग्य और तसव्वुफ़ का मार्ग चुना था, जिसके बाद जनजन में वे ‘सूफ़ी’ नाम से सुविख्यात हुए. 1884 में अपने पत्र ‘जामेउल उलूम’ के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत की धांधलियों की पोल खोलकर सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने पत्रकारिता को राष्ट्रसेवा का सशक्त माध्यम बनाया था.
पंजाब में ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ जैसे किसान आंदोलनों को धार देने से लेकर ‘भारत माता सोसायटी’ के बैनर तले आज़ादी की अलख जगाने तक, उनका पूरा जीवन मातृभूमि की सेवा में समर्पित रहा. निरंतर गिरफ्तारी के वारंट, मुक़दमों और निर्वासन के बावजूद सूफ़ी अम्बा प्रसाद जी ने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया और ईरान की धरती पर अंतिम सांस तक क्रांति की मशाल जलाए रखी.
निडर पत्रकारिता और शाही मुक़दमे
सूफ़ी अम्बा प्रसाद की पत्रकारिता सत्ता के दमन के ख़िलाफ़ एक खुली बग़ावत थी. 1884 में ‘जामेउल उलूम’ के माध्यम से सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने नवाब रामपुर की बदउनवानियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था. जब नवाब का आगमन हुआ तो सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने “नवाब रामपुर आय भाग आय” जैसी तीखी सुर्ख़ी छापी, जिससे बौखलाकर नवाब ने उन पर मुक़दमा दर्ज कराया था. हालांकि, सूफ़ी साहब ने अदालत में ‘भाग’ शब्द की व्याख्या ‘भाग्य’ के रूप में करके मुक़दमे को ख़ारिज करा दिया था. बाद में पंजाब में लाला लाजपत राय और सय्यद हैदर रज़ा के साथ मिलकर सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने पत्रपत्रिकाओं और इनक़लाबी तहरीरों के ज़रिए जनजागरण का काम निरंतर जारी रखा.
‘स्वराज्य’, ‘भारत माता सोसायटी’ और राजकीय दमन
ब्रिटिश हुकूमत ने सूफ़ी साहब की क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने के लिए कई कठोर हथकंडे अपनाए थे. इनक़लाबी अख़बारों पर पाबंदियाँ लगाई गईं और सूफ़ी अम्बा प्रसाद, लाला पिण्डीदास तथा लाला दीनानाथ पर मुक़दमे चलाकर उन्हें 55 वर्ष की कठोर सज़ा सुनाई गई थी. इसके बावजूद ‘स्वराज्य’ अख़बार और ‘भारत माता सोसायटी’ के माध्यम से आज़ादी का प्रचार नहीं रुका था.
इस अख़बार में ‘एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी’ की न्यूनतम शर्त पर संपादकों की नियुक्ति की जाती थी. नन्द गोपाल और लधा राम जैसे संपादकों की गिरफ़्तारियों के बाद भी सूफ़ी साहब ने पंजाब के किसानों को एकजुट किया था.
अंतरराष्ट्रीय पलायन, महाग्रंथ और शहादत
लंदन से गिरफ़्तारी के आदेश जारी होने पर सूफ़ी अम्बा प्रसाद और सरदार अजीत सिंह ईरान तथा नेपाल चले गए थे. निर्वासन के कठिन दौर में भी उन्होंने ‘जामे जम जिंदाबाद’, ‘तीर बहद्फ़’ और ‘इल्मेकयाफ़ा’ जैसी कई ऐतिहासिक पुस्तकें एवं अनुवाद लिखे.
अंततः ईरान में ब्रिटिश और मित्र राष्ट्रों की सेना ने सूफ़ी अम्बा प्रसाद जी को घेरकर गिरफ़्तार कर लिया था. उन्हें गोली से उड़ाने का हुक्म दिया गया था, लेकिन जिस दिन उन्हें फांसी या मृत्युदंड दिया जाना था, उसी सुबह सितम्बर 1920 में वे अपनी जेल की कोठरी में मृत पाए गए और इस तरह यह महान क्रांतिकारी मातृभूमि पर न्योछावर हो गया.



