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वैश्विक मंच पर चमका सारनाथ, UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल होकर बढ़ाया भारत का गौरव

भारत के ऐतिहासिक स्थल वस्तुतः ईंट व पत्थर से निर्मित भवन अथवा इमारत मात्र ही नहीं हैं, अपितु वे एक ऐसी अक्षुण्ण एवं जीवंत सांस्कृतिक विरासत के दीप्यमान प्रतीक हैं, जिसे वैश्विक पटल पर स्वीकार्यता प्राप्त हो रही है। सारनाथ भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर का एक ऐसा ही जीता जागता प्रतिबिंब है। यही वह धरा है, जहां राजवैभव का परित्याग कर ज्ञान प्राप्त करने वाले सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त करने के उपरांत अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया और मानव इतिहास में करुणा, मध्यम मार्ग तथा अहिंसा के नए अध्याय का उद्घाटन किया था।

हाल में यूनेस्को के द्वारा दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48 वें सत्र में सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया जाना महज एक पुरातात्विक स्थल का सम्मान नहीं, अपितु उन सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की वैश्विक स्वीकृति है, जिनकी आज संपूर्ण विश्व को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आवश्यकता है। लगभग अट्ठाईस वर्षों की प्रतीक्षा के बाद प्राप्त यह मान्यता भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके साथ ही सारनाथ भारत का 45 वां तथा उत्तर प्रदेश का चौथा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है।

वैश्विक धरोहर का दर्जा किसी स्थल को केवल अंतर्राष्ट्रीय पहचान ही नहीं देता, बल्कि उसके संरक्षण, संवर्धन, सांस्कृतिक पुनर्जीवन और सतत विकास हेतु नई संभावनाओं के द्वार भी खोल देता है। गौतम बुद्ध  के ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ के साथ ऐसे जीवन दर्शन एवं मूल्यों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने एशिया के विशाल भूभाग की संस्कृति, कला, साहित्य, स्थापत्य और जीवनदर्शन को गहराई से प्रभावित किया। चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, वियतनाम, मंगोलिया और अनेक अन्य देशों में आज भी सारनाथ श्रद्धा और प्रेरणा का केंद्र है। दूसरे शब्दों में कहें, तो सारनाथ केवल भारत की धरोहर ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में व्याप्त मानवता की एक साझा विरासत है। बौद्ध परंपरा में इस स्थल को अलगअलग नामों ऋ षिपत्तन, इषिपत्तन, मृगदाव इत्यादि से जाना जाता है। ये सभी नाम उसी पवित्र स्थान की ओर इशारा करते हैं, जहां छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध आए थे और उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे ‘धर्म के पहिये का घूमना’ कहा जाता है। इसी घटना से बौद्ध संघ की शुरुआत हुई और अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांतों की स्थापना हुई। 

आज विश्व जब युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक असहिष्णुता, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन जैसी अनेक गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब सारनाथ का संदेश नितांत प्रासंगिक हो उठता है। ज्ञात हो कि बुद्ध ने न तो किसी साम्राज्य की स्थापना की और न ही किसी शक्ति प्रदर्शन के मार्ग को अपनाया। उन्होंने मनुष्य के भीतर की अशांति को पहचानने और उसे दूर करने का उपाय पूरे विश्व को बताया। सारनाथ प्रतिशोध के स्थान पर करुणा, कट्टरता के स्थान पर विवेक और अतिवाद के स्थान पर मध्यम मार्ग का संदेश देकर मानवता को सहअस्तित्व, शांति और आत्मबोध की राह दिखाता है। गौरतलब है कि यह दर्शन किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानवीय चेतना का आधार है। 

यूनेस्को द्वारा सारनाथ को दिया गया सम्मान वस्तुतः इन मनावताकेंद्रित मूल्यों की वैश्विक पुनर्पुष्टि है। निस्संदेह विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के एक आकर्षक वैश्विक केंद्र के रूप में पहचान प्राप्त करेगा।

शिशिर शुक्ला, असिस्टेंट प्रोफेसर

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