
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 1984 के हत्या मामले में दो अभियुक्तों संत राम और राम लाल को अपराध से बरी कर दिया है। शाहजहांपुर के विशेष/अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा दो अगस्त 1984 को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा रद करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि यदि अभियोजन की कहानी की उत्पत्ति और घटना का तरीका संदिग्ध हो तो केवल दुश्मनी या आशंका के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला 24 जनवरी 1984 का है। शाहजहांपुर जिले के पुवायां थाना क्षेत्र में रामचंद्र नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी।
शिकायतकर्ता और प्रत्यक्षदर्शी नत्थू लाल ने पुलिस और अदालत में बयान दिया था कि अभियुक्तों ने पहले बंदूक से गोली चलाई, जिससे रामचंद्र गिर गया। फिर भाले व चाकू से उस पर हमला किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने वाले डा.केके श्रीवास्तव की चिकित्सकीय जांच में मृतक के शरीर पर चाकू के 24 घाव तो मिले, लेकिन बंदूक की गोली या भाले की चोट का कोई निशान नहीं मिला।
खंडपीठ ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों के बीच गंभीर विरोधाभास है। इससे पता चलता है कि घटना के समय साक्षी मौके पर मौजूद नहीं थे। इसके अलावा शिकायतकर्ता डल्लू मोतियाबिंद से पीड़ित था और घटना सुबह सात बजे ठंड व घने कोहरे के दौरान हुई थी।
ऐसे में 20-22 कदम की दूरी से घटना को स्पष्ट देखना संदेहास्पद था। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के इस कथन को दोहराया कि रंजिश एक दोधारी तलवार है जो झूठे आरोप का कारण भी बन सकती है। केवल संदेह चाहे कितना भी गहरा हो, साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।



