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भारत को दुश्मन मानते हैं 91% पाकिस्तानी, 80 साल बाद भी भारत-पाकिस्तान में इतनी नफरत क्यों? प्यू सर्वे में बड़ा खुलासा

डिजिटल डेस्कः भारत और पाकिस्तान को अलग हुए करीब आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन दोनों देशों के आम लोगों के बीच एकदूसरे को लेकर अविश्वास और नकारात्मक धारणा अब भी गहरी है। अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के 2026 के सर्वे ने भारतपाकिस्तान संबंधों की इसी जटिल तस्वीर को सामने रखा है। आंकड़े बताते हैं कि दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोग पड़ोसी देश को नकारात्मक नजर से देखते हैं।

प्यू सर्वे में भारतपाकिस्तान को लेकर क्या सामने आया?

प्यू रिसर्च सेंटर ने भारत में फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच 3,566 वयस्कों से आमनेसामने बातचीत के आधार पर सर्वे किया। यह सर्वे 13 भारतीय भाषाओं में हुआ। पाकिस्तान में 8 अप्रैल से 7 मई 2026 के बीच 1,039 वयस्कों से पांच पाकिस्तानी भाषाओं में बातचीत की गई।

सर्वे के मुताबिक, 73 प्रतिशत पाकिस्तानियों की भारत के प्रति बेहद नकारात्मक राय है, जबकि 18 प्रतिशत की राय कुछ हद तक नकारात्मक है। दूसरी ओर, 65 प्रतिशत भारतीयों की पाकिस्तान के प्रति बेहद खराब राय है और 16 प्रतिशत भारतीयों की राय कुछ हद तक नकारात्मक है।

यानी दोनों देशों में पड़ोसी को लेकर सकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या अब भी सीमित है। प्यू रिसर्च के 2013 से अब तक के सर्वेक्षणों में 20 प्रतिशत से अधिक भारतीयों ने किसी भी समय पाकिस्तान को लेकर सकारात्मक रुख नहीं दिखाया। पाकिस्तान में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय रखने वालों का आंकड़ा अलगअलग वर्षों में एकल अंक से लेकर 33 प्रतिशत तक रहा है।

 

https://twitter.com/pewresearch/status/2089381940583436412?s=20

सबसे बड़ी दीवार है एकदूसरे के इरादों पर शक

सर्वे का एक अहम पहलू दोनों देशों के लोगों का अपनी और पड़ोसी सरकार को लेकर अलगअलग नजरिया है।

भारत में 57 प्रतिशत लोग मानते हैं कि उनकी सरकार पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करती है। वहीं 65 प्रतिशत पाकिस्तानी भारत को संबंध सुधारने के लिए प्रतिबद्ध नहीं मानते।

इसी तरह 61 प्रतिशत पाकिस्तानी अपनी सरकार को भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने का इच्छुक मानते हैं, जबकि 51 प्रतिशत भारतीय पाकिस्तान को ऐसा करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं मानते।

यानी दोनों देशों में एक समान पैटर्न दिखाई देता है—लोग अपनी सरकार के इरादों पर भरोसा करते हैं, लेकिन पड़ोसी सरकार के इरादों पर शक करते हैं।

आखिर बदगुमानी की जड़ कहां है?

विदेश मामलों के जानकार और जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. ए.के. पाशा के मुताबिक, इसके पीछे कई वजहें हैं। उनका मानना है कि पहले दोनों देशों में संबंध सुधारने और शांति की वकालत करने वाली एक मजबूत लॉबी दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ उसका प्रभाव कम हुआ है।

उनके मुताबिक, विभाजन के दौर को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाली पीढ़ी अब काफी कम रह गई है और नई पीढ़ी को पड़ोसी देश के बारे में अलग तरह के नैरेटिव के बीच बड़ा होना पड़ा है।

एक दूसरी समस्या यह है कि दोनों देशों में लोग कई बार अपनी वास्तविक राय सार्वजनिक रूप से जाहिर करने से बचते हैं। खासकर युवाओं और पेशेवर समूहों में लोग विवाद से बचने के लिए प्रचलित राष्ट्रीय नैरेटिव के अनुरूप अपनी बात रखने को प्राथमिकता दे सकते हैं।

डॉ. पाशा के मुताबिक, मौजूदा माहौल में अमन और बातचीत की बात करना कई बार युद्ध की भाषा बोलने से ज्यादा मुश्किल दिखाई देता है। यही स्थिति दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर भरोसे की कमी को और गहरा करती है।

कारोबारियों को दिखता है रिश्ते सुधारने का रास्ता

इस नकारात्मक माहौल के बीच आर्थिक रिश्तों को लेकर एक उम्मीद भी दिखाई देती है। पाकिस्तान के छोटे कारोबारी और व्यापारी दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के पक्ष में बताए गए हैं।

उनका तर्क है कि पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति के लिए भारत के साथ बातचीत और व्यापारिक संबंध जरूरी हो सकते हैं। यानी भले ही आम धारणा में भारत को दोस्त के रूप में स्वीकार करने में झिझक हो, लेकिन आर्थिक सहयोग को लेकर व्यावहारिक सोच मौजूद है।

चीन पर भारतपाकिस्तान की सोच बिल्कुल अलग

सर्वे में चीन को लेकर दोनों देशों की सोच में बड़ा अंतर सामने आता है। 21 प्रतिशत भारतीय चीन को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, जबकि 75 प्रतिशत पाकिस्तानी चीन को सबसे अहम सहयोगी मानते हैं।

पाकिस्तान को चीन से संयुक्त राष्ट्र में समर्थन, आर्थिक सहायता और तकनीकी सहयोग मिलता रहा है। दूसरी ओर, भारत में चीन को लेकर रणनीतिक चिंता लंबे समय से मौजूद रही है।

विदेश मामलों के विशेषज्ञ और बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. प्रियांकर उपाध्याय के अनुसार, भारत की आजादी के शुरुआती दौर से ही चीन को एक बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाता रहा है।

क्या बदल सकती है भारतपाकिस्तान की तस्वीर?

प्यू सर्वे की तस्वीर फिलहाल उत्साह बढ़ाने वाली नहीं है। 91 प्रतिशत पाकिस्तानी और 78 प्रतिशत भारतीय एकदूसरे के प्रति नकारात्मक नजरिया रखते हैं। दोनों तरफ पड़ोसी देश की सरकार के इरादों को लेकर भरोसे की कमी भी स्पष्ट है।

इसके बावजूद आर्थिक सहयोग एक संभावित रास्ता जरूर दिखाता है। कारोबार और व्यापार से जुड़े लोगों की व्यावहारिक सोच इस बात का संकेत देती है कि राजनीतिक मतभेदों के बीच भी जनता के स्तर पर आर्थिक जरूरतें संवाद की जमीन तैयार कर सकती हैं।

आखिरकार, करीब 80 साल पुरानी दूरी सिर्फ राजनीतिक बयानों से खत्म नहीं होगी। इसके लिए भरोसा, संवाद, लोगों के बीच संपर्क और आर्थिक रिश्तों को लगातार मजबूत करना होगा। सवाल यही है कि क्या दोनों देशों की नई पीढ़ी पुरानी बदगुमानी से आगे बढ़कर रिश्तों की कोई नई कहानी लिख पाएगी?

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