सुप्रीम कोर्ट ने ‘उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि अधिनियम, 1986’ को शुरुआत से ही बेकार करार दिया. कोर्ट ने कहा कि यह कानून कोई अलग आपराधिक अपराध तय नहीं करता. किसी व्यक्ति को सिर्फ़ गैंगस्टर का लेबल लगाकर उस पर मुकदमा चलाने या सज़ा देने का आधार नहीं बन सकता. कोर्ट ने ये बातें दो वकीलों के खिलाफ गैंगेस्टर एक्ट तहत चल रही यूपी पुलिस की कार्रवाई को रद्द करते हुए कगा.

कोर्ट ने कहा कि हिंसा और संगठित आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया यह कानून असल में निर्दोष नागरिकों के खिलाफ ही काम कर सकता है.जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, कानून में बिना अपराध के कोई सज़ा नहीं हो सकती. जैसा कि हमने पाया, 1986 का अधिनियम कोई अपराध नहीं बनाता है।. यह केवल धारा 2 की उपधाराओं और में दी गई ‘गैंग’ और ‘गैंगस्टर’ की परिभाषा के आधार पर परिभाषा खंड में बताए गए अपराध में शामिल व्यक्ति की स्थिति को ‘गैंगस्टर’ के रूप में परिभाषित करता है.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि जिस दंड कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाती है, उसे एक अपराध बनाना चाहिए और सजा भी उसी कानून के अनुसार होनी चाहिए. जिस कानून की हम समीक्षा कर रहे हैं, उसमें हमें कोई अपराध बनता हुआ नहीं दिखता.
पिछले एक दशक से यूपी में गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ है. योगी आदित्यनाथ की तरफ से अक्टूबर 2025 में पुलिस स्मृति दिवस के कार्यक्रम में इसको लेकर जानकारी भी दी गई थी. उनके बयान के मुताबिक साल 2017 में सत्ता में बीजेपी के आने के बाद बाद अक्टूबर 2025 तक गैंगस्टर एक्ट में 26,920 मुकदमें दर्ज हुए थे.80 हजार से ज्यादा लोगों के गिरफ्तार किया गया. साथ ही 14,467 करोड़ की संपत्ति जब्त भी की गई.
गैंगस्टर एक्ट आखिर है क्या?
उत्तर प्रदेश ने 1986 में यह कानून संगठित और आदतन अपराध करने वाले गिरोहों पर कार्रवाई के लिए बनाया था. इसका उद्देश्य ऐसे अपराधियों पर शिकंजा कसना है जो हिंसा, धमकी, डर, दबाव या दूसरे गैरकानूनी तरीकों से आर्थिक, भौतिक या दूसरे फायदे हासिल करते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं.
कानून में ‘गैंग’ की परिभाषा है उसके मुताबिक इसमें ऐसे लोगों का समूह शामिल है जो अकेले या मिलकर हिंसा, हिंसा की धमकी, डराने, दबाव या अन्य गैरकानूनी तरीकों से अपराध करते हैं. ‘गैंगस्टर’ में गिरोह का सदस्य, नेता या आयोजक ही नहीं, बल्कि उसकी गतिविधियों में मदद या सहयोग करने वाला व्यक्ति भी सकता है.
इसी परिभाषा के चलते इस कानून को ताकत भी मिलती है. लेकिन, असल में विवाद का कारण भी यही बनता है कि पुलिस किन लोगों पर और कैसे मामले में गैंगेस्टर की कार्रवाई कर सकती है.
गैंगेस्ट किन लोगों पर लगाया जाता है?
- गैंगस्टर एक्ट केवल हत्या या डकैती जैसे गंभीर अपराधों तक सीमित नहीं है.
- कानून में कई तरह की एंटीसोशल गतिविधियों को इसके दायरे में रखा गया है.
- हिंसा, धमकी, जबरन वसूली, अपहरण, तस्करी, धोखाधड़ी जैसी गतिविधियां शामिल हैं
मामला दर्ज होने के बाद क्या होता है?
- गैंगस्टर एक्ट में कार्रवाई के लिए पुलिस गैंग चार्ट तैयार करती है.
- इसमें आरोपी और उसके कथित गिरोह की आपराधिक गतिविधियों तथा उनसे जुड़े मामलों का विवरण होता है.
- इसके बाद सक्षम अधिकारी इसकी जांच और स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी करते हैं.
- दोषी पाए जाने पर अपराधी को 2 से 10 साल तक जेल भेजा जाता है और संपत्ति भी कुर्क की जा सकती है
गेैंगेस्टर एक्ट की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
गैंगस्टर एक्ट को सामान्य आपराधिक कानून से ज्यादा सख्त बनाने वाली प्रमुख वजह इसकी संपत्ति कुर्क करने की शक्ति है. कानून के तहत यदि जिला मजिस्ट्रेट को यह विश्वास हो कि किसी व्यक्ति की चल या अचल संपत्ति अपराध से अर्जित की गई है.इस प्रावधान का इस्तेमाल यूपी में कथित माफिया और संगठित अपराध से जुड़े लोगों की संपत्तियों पर कार्रवाई के लिए बड़े पैमाने पर हुआ है. साल 2017 में सत्ता में बीजेपी के आने के बाद अक्टूबर 2025 तक गैंगस्टर एक्ट के तहत 14,467 करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई.
फिर गैंगस्टर एक्ट पर विवाद क्यों?
सबसे बड़ा विवाद यह है कि क्या सामान्य आपराधिक मामलों को भी गैंगस्टर एक्ट का रूप दिया जा रहा है. कई मीडिया रिपोर्ट्स में भी इसको लेकर दावा किया गया है, पुलिस की तरफ से किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से दर्ज आपराधिक मामलों के आधार पर पुलिस, गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू कर रही है
Outlook की एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि चोरी, जालसाजी या दूसरे अपराधों में पहले से आरोपी लोगों पर गैंगस्टर एक्ट लगाया गया. रिपोर्ट में 2021 के एक मामले का उदाहरण दिया गया, जिसमें दो आपराधिक मामलों का सामना कर रही एक महिला पर गैंगस्टर एक्ट भी लगाया गया था, जबकि वे मामले किसी गैंग गतिविधि से जुड़ी नहीं थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी 2020 में मामूली मामलों में गैंगस्टर एक्ट के इस्तेमाल पर सवाल उठाया था और दिशानिर्देशों के पालन की जरूरत बताई थी. अदालत ने यह भी चिंता जताई थी कि पुलिस कई मामलों में पहले से दर्ज केसों को आधार बनाकर गैंगस्टर एक्ट लगा रही है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में गाजियाबाद के राजेंद्र त्यागी एंड टू अदर्स वर्सेज स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश मामले मेंफैसला सुनाते हुए राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार पर दर्ज गैंगस्टर एक्ट का मुकदमा रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा था सिर्फ दो वित्तीय विवादों के आधार पर परिवार के सदस्यों पर गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है. अदालत ने कहा कि केवल आरोप या पुलिस की सामान्य दलीलें गैंगस्टर एक्ट लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.
क्या दूसरे राज्यों में भी ऐसा कानून है?
- महाराष्ट्र में मकोका नाम का ऐसा ही एक्ट है. यह संगठित अपराध सिंडिकेट के खिलाफ विशेष कानून है.
- कर्नाटक में KCOCA नाम का एक्ट लागू है. इसके तहत संगठित अपराधों के खिलाफ कार्रवाई होती है.
- गुजरात में GUJCTOC नाम से एक एक्ट है. संगठित अपराध के साथ आतंकवादी गतिविधियों को भी कानून के दायरे में.
- राजस्थान ने भी 2023 में RCOC एक्ट लाया था, जिसका ढांचा काफी हद तक MCOCA जैसा है.
अदालत ने कहा मकसद सही होने से गलत तरीके सही नहीं हो जाते हैं
गैंगस्टर एक्ट का मकसद संगठित अपराध और अपराधियों के नेटवर्क पर शिकंजा कसना है, लेकिन इसके इस्तेमाल को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. अदालत ने भी कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे को रोकना जरूरी है, लेकिन मकसद सही होने से गलत तरीके सही नहीं हो जाते हैं, खासकर तब, जब कोई ऐसा दंडात्मक कानून बनाया जा रहा हो जो नागरिकों की आजादी में दखल देता हो.



