भारत और जापान के कूटनीतिक रिश्तों में बीते कुछ हफ्तों से जो जबर्दस्त तेजी देखी जा रही है, वो महज एक औपचारिक मुलाकात भर नहीं है. दोनों देश अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक दोस्ती को अब एक ठोस आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी साझेदारी में बदलने के मिशन पर निकल चुके हैं. इस पूरी कवायद के केंद्र में व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन और बड़े पैमाने पर निवेश शामिल है.
इस नई रफ्तार की मजबूत नींव जुलाई में 16वें भारतजापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान पड़ी. जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची की पहली भारत यात्रा ने दोनों देशों के विजन को एक नई दिशा दी. इस बैठक में आर्थिक सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , क्रिटिकल मिनरल्स, सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी थी. इसी के साथ जापान ने अगले एक दशक में भारत के भीतर 10 ट्रिलियन येन के भारीभरकम निवेश का लक्ष्य भी तय किया.
व्यापार घाटा पाटने पर भारत का कड़ा रुख
इस रणनीतिक बातचीत का सबसे अहम पहलू भारतजापान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते की समीक्षा है. वित्त वर्ष 202526 के आंकड़ों पर नजर डालें तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 27.47 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. लेकिन इस आंकड़े के पीछे एक बड़ा असंतुलन भी छिपा है.
कुल व्यापार में से भारत को जापान का निर्यात 21.43 अरब डॉलर रहा, जबकि जापान को भारत का निर्यात महज 6.04 अरब डॉलर पर ही सिमट कर रह गया. भारत अब इस असंतुलन को ठीक करने के लिए लगातार दबाव बना रहा है. भारत की स्पष्ट मांग है कि उसके उत्पादों को जापानी बाजार में ज्यादा पहुंच मिले ताकि द्विपक्षीय व्यापार दोनों पक्षों के लिए बराबरी का और टिकाऊ बन सके.
उत्तर प्रदेश से टोक्यो तक जमीन पर उतरी योजनाएं
अगस्त का महीना इस पूरे एजेंडे को कागजों से निकालकर जमीन पर लागू करने का गवाह बना है. राज्य स्तर पर उत्तर प्रदेश ने जापानी पूंजी और तकनीक को आकर्षित करने में बाजी मारी है. हाल ही में आयोजित यूपीजापान इन्वेस्टमेंट मीट में 200 से अधिक जापानी बिजनेस लीडर्स, सीईओ और नीति निर्माताओं ने हिस्सा लिया. इसी कड़ी में यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में जापान समर्थित दो अहम प्रोजेक्ट्स की शुरुआत भी हो चुकी है.
राष्ट्रीय स्तर पर इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 27 अगस्त तक जापान के दौरे पर हैं. उनके साथ 200 से ज्यादा प्रतिनिधियों वाला भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल गया है. ये दल टोक्यो, नागोया और ओसाका जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में बैठकें कर रहेगा . बातचीत का मुख्य फोकस सेमीकंडक्टर, एआई, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और भविष्य के नए उद्योगों में निवेश पर टिका है.
इंडोपैसिफिक में सुरक्षा तकनीक का मजबूत कवच
इस आर्थिक हलचल के पीछे का भूराजनीतिक पहलू भी बेहद अहम है. दोनों देश केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रक्षा सहयोग का दायरा भी तेजी से बढ़ रहा है. इसमें समुद्री सुरक्षा के साथसाथ नौसैनिक जहाज निर्माण में संयुक्त विकास की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं.
वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित और लचीला बनाने के लिए दोनों देश क्रिटिकल टेक्नोलॉजी पर एकदूसरे का सहारा बन रहे हैं. कुल मिलाकर संदेश बिल्कुल साफ है कि जापान की उन्नत पूंजी और तकनीक का मेल जब भारत के विशाल बाजार, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और इंडोपैसिफिक में उसकी रणनीतिक ताकत से होगा, तो ये साझेदारी पूरे क्षेत्र के शक्ति संतुलन को एक नया आकार देगी.



