
लखनऊ, अमृत विचार : सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने द आर्ट ऑफ लिविंग के प्रतिष्ठित 2016 वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को लेकर चल रहे एक दशक लंबे मीडिया ट्रायल और झूठे आरोपों पर पूरी तरह विराम लगा दिया है। अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के फैसले के साथसाथ उसके बाद की गई सभी अंतरिम कार्रवाइयों को खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि द आर्ट ऑफ लिविंग के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना के बाढ़ क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।अदालत ने आगे कहा कि द आर्ट ऑफ लिविंग जमा किए गए 5 करोड़ की पूरी राशि वापस पाने की हकदार है। इस जमा राशि को संस्था की छवि खराब करने के इरादे से गलत तरीके से “जुर्माना” बताया गया था। वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल 2016 एक ऐतिहासिक वैश्विक आयोजन था।
इस फैसले के बाद द आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सत्य को कायम रखा है। इस दौरान उन्होंने एक वीडियो संदेश के जरिये वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल की पूरी जानकारी भी साझा की। उन्होंने कहा कि हमने यमुना के तट पर वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल का आयोजन किया था। यमुना को चुनने का कारण यह था कि वह बहुत गंदी थी। हमने दिल्ली में ‘मेरी दिल्ली, मेरी यमुना’ कार्यक्रम चलाया और दिल्ली को स्वच्छ किया। कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली हर जगह बहुत खराब स्थिति में थी। दिल्ली नगर निगम ने हमसे मदद मांगी। हमारे हजारों स्वयंसेवकों ने मिलकर पूरी दिल्ली को साफ किया। उसी समय मैंने कहा कि हमें यमुना को भी साफ करना चाहिए।
जब हमने यमुना की सफाई की, तो आपको पता है कितना कचरा निकाला? सफाई के दौरान करीब 700 टन कचरा यमुना से निकाला गया। उसके बाद भी नदी इतनी प्रदूषित और बदबूदार थी। इसलिए मैंने सोचा कि हम इसके तट पर विश्व सांस्कृतिक महोत्सव करेंगे, ताकि दुनिया भर से लोग आएंगे और स्थानीय व राष्ट्रीय सरकार इसे साफ करने की पहल करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, लगातार हमारी उम्मीदें कम होती जा रही थीं क्योंकि किसी ने सफाई नहीं की, हमें खुद ही करना पड़ा। हमने सभी विभागों और प्राधिकरणों से लाइसेंस प्राप्त किए थे। यह एक बड़ा कार्यक्रम था। 7 एकड़ का विशाल मंच बनाया गया था, 36,602 कलाकार आने वाले थे और दुनिया भर से 200 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष और गणमान्य व्यक्ति शिरकत करने वाले थे।
इस मोड़ पर, कुछ निहित स्वार्थ वाले एनजीओ और राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया कि हम यमुना के मैदानों को नष्ट कर रहे हैं। कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ था और उन्होंने कहा कि हमने जगह प्रदूषित कर दी है! वह जगह पहले से ही इतनी प्रदूषित थी, हम तो उसे साफ करना चाहते थे। लेकिन उन्होंने हम पर आरोप लगा दिया। मैंने कहा, ‘आपको शुरुआत में ही अनुमति देने से इनकार कर देना चाहिए था। आपने हमें अनुमति दी, कहा कि आगे बढ़ो और कार्यक्रम करो, हमने जो भी फंड आवश्यक था वह जमा किया।’ उन्होंने यह भी नहीं देखा कि जगह कैसी थी और कह दिया कि हमने प्रदूषण फैलाया है।
कुछ लोगों ने मिलीभगत की और NGT यानी की राष्ट्रीय हरित अधिकरण में रिपोर्ट दी कि यमुना का मैदान पूरी तरह नष्ट हो गया है। हमने इसे चुनौती दी। हमने जो विशाल मंच बनाया था, वह एक फ्लोटिंग मंच था। हमने मेटल शीट्स बिछाई थीं और उन पर पिलर खड़े किए गए थे। उस बड़े मंच के लिए कोई खुदाई नहीं की गई थी। हमने पर्यावरण का अत्यधिक ध्यान रखा था, क्योंकि जब हमने मंच हटाया तो प्लेटों के नीचे अभी भी घास मौजूद थी, जिसके चित्र भी उपलब्ध थे। लेकिन हमारे खिलाफ बड़ा मीडिया ट्रायल चलाया गया। फिर एनजीटी ने कहा कि 5 करोड़ रुपये जमा करो, यदि कोई नुकसान नहीं होगा तो वापस कर देंगे। लेकिन उस 5 करोड़ के डिपॉजिट को ऐसे प्रचारित किया गया जैसे हम पर जुर्माना लगाया गया हो! जुर्माना तो तब लगता है जब आप कुछ नष्ट करते हैं, है ना? कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ था, तो कोई जुर्माना कैसे लगा सकता है? मैंने कहा कि मैं जुर्माना नहीं भरूंगा, हमने कुछ गलत नहीं किया है। मैं सत्य के लिए जेल जाने को तैयार था।
लेकिन फिर हमारे लोगों ने अनुरोध किया,केवल दो दिन बचे थे, अंतरराष्ट्रीय गणमान्य व्यक्ति, संसद सदस्य, कई प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भारत आ रहे थे। मैंने कहा ठीक है, विरोध दर्ज कराते हुए हमने 5 करोड़ का डिपॉजिट जमा किया। शुक्रवार को कार्यक्रम शुरू होना था। समिति के सदस्यों ने मुझसे अनुरोध किया, ‘गुरुदेव, कृपया इसे देने के लिए सहमत हों, वरना अनुमति नहीं मिलेगी।’ हमने सब कुछ तैयार कर लिया था, इसलिए मैंने कहा ठीक है, लेकिन सत्य की जीत होगी और हम इसके लिए लड़ेंगे।
जिस समिति ने रिपोर्ट दी थी कि बहुत नुकसान हुआ है, उस समिति के अध्यक्ष ने ही बाद में पत्र लिखकर स्वीकार किया, समिति के अध्यक्ष ने खुद कहा कि मुझे खेद है, मैंने उस जगह का निरीक्षण ही नहीं किया था, मैं कभी वहां गया ही नहीं। मुझे बुखार था, मेरे सहायक ने रिपोर्ट बनाई और मैंने केवल हस्ताक्षर कर दिए, इसलिए यह प्रामाणिक नहीं है और मैं इसकी पुष्टि नहीं कर सकता। उन्होंने खुद अपने आरोपों का खंडन किया। अभी तक यह चल रहा था कि ‘यमुना जी को नुकसान पहुंचा दिया, यह कर दिया, वो कर दिया।’ इससे हमारे सभी स्वयंसेवकों और शिक्षकों को ठेस पहुंची थी। मैंने उनसे कहा, ‘धैर्य रखो, मजबूत बनो, सत्य की विजय होगी और धैर्य का फल मिलेगा।’
उन्होंने कहा कि 10 साल बाद आज वही हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि हमारे कार्यक्रम से कोई नुकसान हुआ था। 155 देशों के लोग वहां आए थे और जिस तरह का मीडिया ट्रायल हुआ, वह न केवल आर्ट ऑफ लिविंग के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए सुखद नहीं था। लेकिन हम सब उससे गुजरे, मुस्कुराते रहे, हिम्मत नहीं हारी और डटे रहे।
एक रिपोर्ट के आधार पर नहीं बनानी चाहिए धारणा
इस मामले में जो निष्कर्ष और आरोप हमारे खिलाफ लगाए गए, उनके संबंध में स्वयं उपलब्ध दस्तावेजों, संबंधित पक्षों के बयानों और न्यायिक रिकॉर्ड को देखा जाना चाहिए. किसी भी संस्था या व्यक्ति के बारे में धारणा केवल एक रिपोर्ट या एक पक्ष के आधार पर नहीं बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारा स्पष्ट मानना है कि सत्य को सामने लाने के लिए पूरे रिकॉर्ड और सभी संबंधित तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए. यदि किसी रिपोर्ट के निष्कर्ष पर संबंधित समिति के अध्यक्ष ने स्वयं आपत्ति दर्ज की है, तो उस तथ्य को भी सार्वजनिक विमर्श में उचित स्थान मिलना चाहिए। वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल का उद्देश्य लोगों को जोड़ना, संस्कृति और शांति का संदेश देना था। हमने यमुना और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कभी नकारा नहीं है। हमारा विश्वास है कि पर्यावरण की रक्षा और मानवीय एकता एकदूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एकदूसरे के पूरक हैं।



