
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ जिला अदालत परिसर के पास कथित तौर पर सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण करके बनाए गए वकीलों के चैंबर गिराने से संबंधित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से मंगलवार को इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा, ”ध्वस्तीकरण की कार्रवाई होनी ही है।”
पीठ द्वारा याचिका पर विचार करने से अनिच्छा जताए जाने के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस ले लिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुके हैं। उन्होंने कहा, ”मैंने इसे खुद देखा है। मैं दो साल तक वहां वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में रहा हूं। मुझे पता है कि वहां किस तरह के निर्माण हैं।” याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया। पीठ ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने से इनकार करते हुए वकील को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
हाईकोर्ट ने 72 कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस का दिया था आदेश
यह याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के चार अगस्त के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। उच्च न्यायालय ने लखनऊ जिला अदालत परिसर के पास सार्वजनिक रास्तों या सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर कथित तौर पर चैंबर और अन्य ढांचे बनाए जाने के मामले में लखनऊ नगर निगम को 72 कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया था जिनमें ज्यादातर अधिवक्ता हैं।
उच्च न्यायालय ने कथित अतिक्रमणकारियों को या तो इन ढांचों को खाली करने या जमीन और निर्माण पर अपना वैध अधिकार साबित करने का निर्देश दिया था। ऐसा करने में विफल रहने पर एलएमसी को निर्माण गिराने की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
ः



