
हड्डियों की मजबूती को लेकर ज्यादातर लोग तब तक गंभीर नहीं होते, जब तक कोई फ्रैक्चर या दूसरी परेशानी सामने न आ जाए। लेकिन हड्डियों की एक ऐसी बीमारी है जो लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में बढ़ सकती है। इसे Osteoporosis यानी ऑस्टियोपोरोसिस कहा जाता है। इस स्थिति में हड्डियों का घनत्व और उनकी मजबूती कम होने लगती है, जिससे हड्डियां कमजोर और नाजुक हो सकती हैं।
ऑस्टियोपोरोसिस में मामूली गिरने, चोट लगने या कभी-कभी सामान्य गतिविधियों के दौरान भी फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ सकता है। खासतौर पर रीढ़, कूल्हे और कलाई की हड्डियां इससे प्रभावित हो सकती हैं।
दिल्ली के St. Stephen’s Hospital के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. वर्गीस के अनुसार, हड्डियों की मजबूती पर काम करने की शुरुआत केवल 40 साल की उम्र के बाद नहीं करनी चाहिए। बचपन और युवावस्था में पर्याप्त पोषण और शारीरिक गतिविधि के जरिए अच्छी बोन हेल्थ बनाने पर आगे चलकर हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
तो आखिर ऑस्टियोपोरोसिस क्या है, इसका खतरा कब बढ़ता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? आइए विस्तार से समझते हैं।
Osteoporosis क्या होता है?
ऑस्टियोपोरोसिस ऐसी स्थिति है जिसमें हड्डियों का बोन मिनरल डेंसिटी और माइक्रोआर्किटेक्चर प्रभावित हो सकता है। आसान भाषा में कहें तो हड्डियां अपनी सामान्य मजबूती खोने लगती हैं और उनमें कमजोरी बढ़ सकती है।
स्वस्थ हड्डियां पूरी तरह ठोस नहीं होतीं, बल्कि उनके अंदर एक खास संरचना होती है। ऑस्टियोपोरोसिस में यह संरचना कमजोर हो सकती है और हड्डियों की मजबूती कम हो जाती है।
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में अक्सर कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देता। व्यक्ति सामान्य रूप से रोजमर्रा के काम करता रहता है और उसे पता भी नहीं चलता कि उसकी हड्डियों की ताकत धीरे-धीरे कम हो रही है।
कई मामलों में बीमारी का पता पहली बार तब चलता है जब मामूली गिरने या चोट लगने पर फ्रैक्चर हो जाता है।
उम्र बढ़ने के साथ क्यों कमजोर होने लगती हैं हड्डियां?
बचपन और युवावस्था के दौरान शरीर में हड्डियों का निर्माण तेजी से होता है। इसी समय बोन मास यानी हड्डियों का भंडार विकसित होता है। आमतौर पर लगभग 25 से 30 साल की उम्र तक व्यक्ति अपनी अधिकतम बोन डेंसिटी के करीब पहुंच जाता है।
इसके बाद उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों की डेंसिटी धीरे-धीरे कम हो सकती है। हालांकि यह कमी हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती।
किसी व्यक्ति की हड्डियों की मजबूती पर जेनेटिक्स, पोषण, शारीरिक गतिविधि, हार्मोन, कुछ बीमारियां और दवाओं सहित कई कारकों का प्रभाव पड़ सकता है।
इसीलिए हड्डियों की सेहत पर ध्यान केवल बुढ़ापे में नहीं बल्कि बचपन और युवावस्था से ही देना महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या सिर्फ बुजुर्गों को होता है Osteoporosis?
ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा उम्र बढ़ने के साथ जरूर बढ़ता है, लेकिन इसे केवल बुजुर्गों की बीमारी समझना सही नहीं है।
कुछ लोगों में कम उम्र में भी बोन डेंसिटी कम हो सकती है। इसके पीछे हार्मोनल समस्या, कुछ मेडिकल कंडीशन, पोषण की कमी या लंबे समय तक कुछ विशेष दवाओं का इस्तेमाल जैसे कारण हो सकते हैं।
महिलाओं में menopause के बाद हड्डियों के नुकसान की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इसका एक कारण estrogen hormone का स्तर कम होना है। पुरुषों में भी उम्र बढ़ने और कुछ हार्मोनल या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण हड्डियों की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
इसलिए उम्र के अलावा व्यक्तिगत जोखिम कारकों को समझना भी जरूरी है।
लंबे समय तक Steroid लेने वालों को क्यों रहना चाहिए सावधान?
कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल बोन हेल्थ पर असर डाल सकता है। इनमें खासतौर पर लंबे समय तक इस्तेमाल की जाने वाली corticosteroid या steroid medicines शामिल हैं।
कुछ अन्य दवाएं भी विशेष परिस्थितियों में बोन डेंसिटी को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, किसी भी दवा को डॉक्टर की सलाह के बिना बंद करना सही नहीं है।
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से steroid या ऐसी दवाएं ले रहा है जिनका हड्डियों पर असर पड़ सकता है, तो डॉक्टर से बोन हेल्थ के जोखिम के बारे में चर्चा करनी चाहिए।
कम उम्र में हड्डियां कमजोर होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
अगर किसी युवा व्यक्ति में बोन डेंसिटी सामान्य से काफी कम मिलती है, तो केवल उम्र को इसकी वजह नहीं माना जाना चाहिए।
कुछ मेडिकल कंडीशन हड्डियों की मजबूती को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें कुछ हार्मोनल विकार, hyperparathyroidism, किडनी से जुड़ी बीमारियां और अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं शामिल हो सकती हैं।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर जरूरत के अनुसार अतिरिक्त जांच कराकर हड्डियों के कमजोर होने के पीछे का कारण पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं।
Osteoporosis के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
ऑस्टियोपोरोसिस को अक्सर ‘silent disease’ कहा जाता है क्योंकि शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण नहीं होते।
कई लोगों को तब तक बीमारी का पता नहीं चलता, जब तक कोई फ्रैक्चर न हो जाए। इसलिए सिर्फ दर्द न होने का मतलब यह नहीं है कि हड्डियां पूरी तरह स्वस्थ हैं।
गंभीर स्थिति में पीठ या हड्डियों में दर्द, शरीर की लंबाई कम होना या रीढ़ की हड्डियों में बदलाव जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। लेकिन इन लक्षणों के आधार पर अकेले ऑस्टियोपोरोसिस की पुष्टि नहीं की जा सकती।
मामूली चोट में फ्रैक्चर हो जाए तो सावधान
अगर सामान्य स्थिति में हल्की चोट या मामूली गिरने के बाद हड्डी टूट जाती है, तो इसे सिर्फ दुर्घटना मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
खासकर कलाई, कूल्हे या रीढ़ की हड्डी में मामूली चोट के बाद फ्रैक्चर होना कमजोर हड्डियों का संकेत हो सकता है।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो सकता है ताकि बोन डेंसिटी और फ्रैक्चर के भविष्य के जोखिम का आकलन किया जा सके।
Osteoporosis की जांच के लिए कौन सा टेस्ट होता है?
ऑस्टियोपोरोसिस की जांच के लिए डॉक्टर आमतौर पर Bone Mineral Density यानी BMD टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इसके लिए DXA या DEXA स्कैन सबसे सामान्य जांचों में से एक है।
इस टेस्ट से शरीर की कुछ प्रमुख हड्डियों में मिनरल डेंसिटी को मापा जाता है। रिपोर्ट में T-score जैसे मापदंडों का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि हर व्यक्ति को केवल उम्र बढ़ने के कारण तुरंत बोन डेंसिटी टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, लिंग, मेडिकल हिस्ट्री, दवाओं और फ्रैक्चर के जोखिम जैसे कारकों को देखकर जांच की सलाह देते हैं।
किन लोगों को Bone Density Test की जरूरत पड़ सकती है?
जिन लोगों में ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम अधिक है, उनमें डॉक्टर बोन डेंसिटी टेस्ट पर विचार कर सकते हैं।
इनमें menopause के बाद की महिलाएं, उम्रदराज लोग, पहले से कमजोर हड्डियों या कुछ प्रकार के फ्रैक्चर वाले लोग, लंबे समय तक steroid लेने वाले व्यक्ति और कुछ खास मेडिकल कंडीशन वाले लोग शामिल हो सकते हैं।
किसी व्यक्ति को टेस्ट की जरूरत है या नहीं, इसका फैसला उसकी व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर डॉक्टर बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
बचपन से ही हड्डियों की सेहत पर दें ध्यान
हड्डियों की मजबूती बनाने के लिए बचपन और युवावस्था महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान शरीर को पर्याप्त पोषण देने के साथ शारीरिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी है।
दौड़ना, खेल-कूद और उम्र के अनुसार weight-bearing activities हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य को सपोर्ट कर सकती हैं।
बड़े होने के बाद भी शारीरिक गतिविधि बंद नहीं करनी चाहिए। नियमित एक्टिविटी हड्डियों के साथ-साथ मांसपेशियों और शरीर के संतुलन को बनाए रखने में भी मदद कर सकती है।
40 की उम्र के बाद क्या करें?
40 साल के बाद हड्डियों की सेहत को लेकर लापरवाही नहीं करनी चाहिए। नियमित वॉकिंग जैसी गतिविधियां शरीर को सक्रिय रखने का आसान तरीका हो सकती हैं।
हालांकि, केवल एक ही तरह की एक्सरसाइज हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होती। उम्र, फिटनेस, मेडिकल कंडीशन और फ्रैक्चर के जोखिम के अनुसार एक्सरसाइज का चुनाव किया जाना चाहिए।
अगर पहले से ऑस्टियोपोरोसिस है या फ्रैक्चर का जोखिम अधिक है, तो नई एक्सरसाइज या वर्कआउट शुरू करने से पहले डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह लेना बेहतर है।
हड्डियों को मजबूत रखने के लिए कैसी डाइट लें?
हड्डियों की मजबूती के लिए सिर्फ कैल्शियम पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन D और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की भी जरूरत होती है।
दूध और दही जैसे डेयरी उत्पाद कैल्शियम के अच्छे स्रोत हो सकते हैं। इसके अलावा दालें, सोया, कुछ हरी सब्जियां, नट्स और सीड्स भी संतुलित डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।
विटामिन D शरीर में कैल्शियम के उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्याप्त धूप लेना कुछ लोगों में विटामिन D की जरूरत पूरी करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसकी मात्रा और जरूरत व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करती है।
जरूरत पड़ने पर डॉक्टर विटामिन D या कैल्शियम की जांच और सप्लीमेंट की सलाह दे सकते हैं।
सिर्फ दूध पीना ही काफी नहीं
हड्डियों की मजबूती के लिए केवल दूध या कैल्शियम सप्लीमेंट पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है।
संतुलित डाइट, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त विटामिन D, स्वस्थ वजन बनाए रखना और धूम्रपान जैसी हानिकारक आदतों से बचना बोन हेल्थ के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसके अलावा शराब का अधिक सेवन भी हड्डियों और सामान्य स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
Osteoporosis से बचाव के लिए इन बातों का रखें ध्यान
हड्डियों को लंबे समय तक मजबूत रखने के लिए बचपन से ही स्वस्थ आदतें अपनाना बेहतर है।
- डाइट में पर्याप्त कैल्शियम और प्रोटीन शामिल करें।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार विटामिन D की जरूरत पूरी करें।
- नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करें।
- उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत और शरीर का संतुलन बनाए रखने पर ध्यान दें।
- लंबे समय तक steroid लेने की स्थिति में डॉक्टर से बोन हेल्थ के बारे में चर्चा करें।
- धूम्रपान से बचें और शराब का अधिक सेवन न करें।
- मामूली चोट में फ्रैक्चर होने पर जांच को नजरअंदाज न करें।
- जोखिम अधिक होने पर डॉक्टर की सलाह से Bone Density Test कराएं।
हड्डियों को मजबूत बनाने की शुरुआत आज से करें
ऑस्टियोपोरोसिस ऐसी समस्या है जिसका खतरा उम्र के साथ बढ़ सकता है, लेकिन हड्डियों की सेहत पर ध्यान देने की शुरुआत किसी एक उम्र का इंतजार करके नहीं करनी चाहिए। बचपन और युवावस्था में मजबूत बोन मास बनाना और आगे चलकर उसे बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
अगर किसी व्यक्ति में फ्रैक्चर का जोखिम अधिक है, लंबे समय से कुछ विशेष दवाएं चल रही हैं या किसी बीमारी के कारण हड्डियां कमजोर होने की आशंका है, तो समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हड्डियों में कमजोरी हमेशा दर्द के रूप में सामने नहीं आती। इसलिए सही पोषण, नियमित गतिविधि और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच को अपनी हेल्थ रूटीन का हिस्सा बनाना बेहतर है।
डिस्क्लेमर
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। इसे किसी बीमारी के निदान या इलाज का विकल्प न समझें। कैल्शियम, विटामिन D या किसी अन्य सप्लीमेंट को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू न करें। अगर मामूली चोट में बार-बार फ्रैक्चर हो रहा है, लगातार हड्डियों या पीठ में दर्द है या ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम अधिक है, तो योग्य डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लें।


