हिंदू धर्म और वैदिक ग्रंथों में रुद्राक्ष को बेहद पवित्र और शक्तिशाली माना गया है। भारत और दुनिया में कई लोग सदियों से रुद्राक्ष को धारण करते आ रहे हैं। हिंदू धर्म में रुद्राक्ष की मान्यता और भी खास इसलिए हो जाती है। क्योंकि इसको भगवान शिव से जुड़ा माना जाता है। शिव महापुराण के मुताबिक भगवान शिव के आंसुओं से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई है।
इसको धारण करने से जातक के कर्म शुद्ध होते हैं और आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको रुद्राक्ष से जुड़े कुछ ऐसे मिथकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको लेकर लोग असमंजस की स्थिति में रहते हैं।

पीरियड्स के दौरान रुद्राक्ष उतारना सही है या नहीं
कई महिलाओं के मन में सवाल रहता है कि पीरियड्स के समय रुद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए। लेकिन इस बात में बिलकुल भी सच्चाई नहीं है। दरअसल, रुद्राक्ष एक बीज है, जिसकी एनर्जी नाजुक नहीं है। किसी भी धार्मिक शास्त्र में पीरियड्स के समय इसको न धारण करने के किसी भी नियम के बारे में नहीं बताया गया है। यह फैसला पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है।
अलगअलग मुखी का रुद्राक्ष धारण करना अशुभ
सबसे पहले यह समझें कि हिंदू धर्म में रुद्राक्ष का आध्यात्मिक महत्व बेहद होता है। जिस कारण इसको धारण करना अशुभ नहीं माना जाता है। 5 मुखी और 7 मुखी रुद्राक्ष को एक साथ पहने से एक साथ मनके की एनर्जी काम करती है। न कि उसके खिलाफ। अलगअलग मुखी रुद्राक्ष आपकी ऊर्जा को समर्थन करने के लिए है।
साधुसंत और हिंदू ही धारण कर सकते हैं रुद्राक्ष
हिंदू धर्म के मुताबिक कोई भी व्यक्ति रुद्राक्ष को पहन सकता है। फिर चाहे उसका धर्म, जीवनशैली और लिंग कुछ भी हो। कई लोगों का मानना होता है कि सिर्फ साधुसंतों या कट्टर धार्मिक अनुयायी की मालाएं आदि पहन सकते हैं। जबकि रुद्राक्ष सार्वभौमिक आध्यात्मिक साधन है, जिसको कोई भी पहन सकता है।
एक बार रुद्राक्ष पहनने के बाद कभी नहीं उतारें
जबकि सच्चाई यह है कि कई लोग नहाते समय, शारीरिक संबंध बनाते समय या शमशान घाट जाते समय रुद्राक्ष को उतार देते हैं। हालांकि ऐसा सम्मान के दृष्टिकोण से किया जाता है, न कि इससे रुद्राक्ष की एनर्जी कमजोर होती है। हिंदू धर्म में सम्मान का असल अर्थ पवित्र चीजों का सम्मान करना है। वहीं बारबार इसको उतारने से रुद्राक्ष की ऊर्जा कम नहीं होती है।




