
बांग्लादेश की सामाजिक कार्यकर्ता रूना खान को 2026 के रैमोन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। एशिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में गिने जाने वाले इस पुरस्कार के पीछे उनकी ऐसी कहानी है, जो मुश्किल हालात में रहने वाले लोगों के लिए कुछ अलग करने की कोशिश से जुड़ी है।
रूना खान ने उन इलाकों में काम करने का फैसला किया, जहां सड़क और परिवहन की कमी के कारण अस्पताल, स्कूल और दूसरी जरूरी सुविधाएं लोगों से बहुत दूर थीं। उन्होंने सोचा कि जब लोग सुविधाओं तक नहीं पहुंच सकते, तो क्यों न सुविधाओं को ही उनके पास ले जाया जाए। इसी सोच ने आगे चलकर उनके काम की दिशा बदल दी।
संपन्न परिवार में हुआ जन्म, लेकिन रास्ता चुना अलग
रूना खान का जन्म 7 नवंबर 1958 को ढाका में हुआ था। उनका परिवार बांग्लादेश के पुराने और संपन्न परिवारों में गिना जाता था। बचपन से ही उन्हें एक ऐसा माहौल मिला, जहां अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग उनके घर आते-जाते थे।
इस वातावरण ने उन्हें समाज और दुनिया को अलग-अलग नजरिए से समझने का मौका दिया। हालांकि उनका बचपन सुविधाओं के बीच बीता, लेकिन बड़े होने के बाद उन्होंने अपना काम उन समुदायों के साथ करना चुना, जिन्हें बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था।
पढ़ाई कई जगह हुई
रूना खान की शिक्षा भी अलग-अलग जगहों पर हुई। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में की और बाद में पाकिस्तान के मरी स्थित सेंट डेनिस हाई स्कूल में पढ़ाई की।
उच्च शिक्षा के लिए वह भारत आईं और कोलकाता के लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज से भूगोल में ऑनर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने ढाका के ईडेन मोहिला कॉलेज से ह्यूमैनिटीज में भी स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
आगे चलकर उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और हार्वर्ड कैनेडी स्कूल के नेतृत्व और गैर-लाभकारी संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया।
शिक्षक के रूप में शुरू किया सफर
सामाजिक क्षेत्र में बड़े स्तर पर काम करने से पहले रूना खान ने शिक्षक के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। 1979 में चटगांव में बच्चों को पढ़ाते हुए उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबों की बातें याद कराना नहीं होना चाहिए। बच्चों को सवाल पूछने और चीजों को समझने का अवसर भी मिलना चाहिए।
इसके बाद वह बच्चों के लिए किताबें और शैक्षणिक सामग्री तैयार करने से जुड़ीं। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में भी काम किया और बच्चों तथा शिक्षकों के लिए अलग-अलग संसाधन तैयार किए।
बाद में महिलाओं और स्थानीय कारीगरों को रोजगार से जोड़ने के लिए भी उन्होंने काम किया। 1988 में उन्होंने कारीगरों और शिल्पकारों को बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक बुटीक शुरू किया।
एक नदी यात्रा ने बदल दी सोच
रूना खान के जीवन में बड़ा बदलाव 1997 में आया। ब्रह्मपुत्र नदी के एक ‘चार’ इलाके की यात्रा के दौरान उन्होंने वहां रहने वाले लोगों की मुश्किलों को करीब से देखा।
बांग्लादेश में ‘चार’ उन नदी द्वीपों या रेत से बनी जमीन को कहा जाता है, जो नदी के बहाव और कटाव के कारण लगातार अपना स्वरूप बदलती रहती हैं। इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए अस्पताल, स्कूल और दूसरी जरूरी सुविधाओं तक पहुंचना बेहद मुश्किल था।
रूना खान ने महसूस किया कि इन लोगों को सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वे अस्पताल आएं। जब उनके लिए वहां पहुंचना ही मुश्किल है, तो स्वास्थ्य सेवा को उनके पास ले जाना होगा।
यहीं से एक ऐसे मॉडल की कल्पना शुरू हुई, जिसने बाद में हजारों लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया।
2002 में बनाई ‘फ्रेंडशिप’, नाव बनी अस्पताल
इसी सोच के साथ रूना खान ने 2002 में ‘फ्रेंडशिप’ नाम की सामाजिक संस्था की स्थापना की। शुरुआत में संस्था का ध्यान नदी से कटे और बेहद दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर रहा।
इसके लिए नाव को ही अस्पताल के रूप में इस्तेमाल करने का मॉडल अपनाया गया। फ्लोटिंग हॉस्पिटल उन इलाकों तक पहुंचने लगे, जहां सामान्य अस्पताल बनाना या मरीजों का वहां तक पहुंचना बेहद कठिन था।
इस पहल ने स्वास्थ्य सेवा को उन लोगों के करीब पहुंचाने का काम किया, जो भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक जरूरी इलाज से दूर रहे थे।
स्कूल भी ऐसे, जिन्हें जरूरत पड़ने पर दूसरी जगह ले जा सकें
बांग्लादेश के नदी वाले इलाकों में सिर्फ स्वास्थ्य ही चुनौती नहीं थी। नदी का कटाव और बाढ़ अक्सर लोगों के घर, जमीन और स्कूल तक प्रभावित कर देते हैं।
ऐसे में फ्रेंडशिप ने शिक्षा के लिए भी अलग तरीका अपनाया। संस्था ने ऐसे स्कूलों और शिक्षा केंद्रों की व्यवस्था विकसित की, जिन्हें बदलती परिस्थितियों के अनुसार दूसरी जगह ले जाना संभव हो।
इसका मकसद यह था कि बाढ़ या नदी के कटाव के कारण बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बंद न हो।
काम सिर्फ अस्पताल और स्कूल तक सीमित नहीं रहा
समय के साथ रूना खान और उनकी संस्था का काम स्वास्थ्य और शिक्षा से आगे बढ़ा। जलवायु परिवर्तन से प्रभावित समुदायों, आपदा प्रबंधन, रोजगार, नागरिक अधिकार और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया।
उनका पूरा मॉडल इस विचार पर आधारित रहा कि जिन लोगों तक सामान्य व्यवस्था नहीं पहुंच पा रही है, उनके लिए व्यवस्था का तरीका बदला जाना चाहिए।
अब मिला एशिया का बड़ा सम्मान
दशकों तक दूरदराज और जलवायु संकट से प्रभावित लोगों के बीच काम करने के लिए रूना खान को 2026 के रैमोन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।
रूना खान की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने सुविधाओं से भरी जिंदगी से निकलकर उन लोगों के बीच काम करना चुना, जिनके लिए अस्पताल तक पहुंचना भी एक बड़ी चुनौती थी।
नाव को अस्पताल और बदलती परिस्थितियों के अनुकूल स्कूल में बदलने का उनका विचार यही बताता है कि किसी समस्या का समाधान हमेशा लोगों को बदलने से नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलने से भी निकाला जा सकता है।



