
आमतौर पर फिजिकल थेरेपी के साइड इफेक्ट्स और आफ्टर इफेक्ट्स नहीं होते हैं और न ही इसमें दवाएं दी जाती हैं। वैसे भारत में जोड़ों और मांसपेशियों से संबंधित दर्द को दूर करने के लिए अनेक शताब्दियों से मालिश और व्यायाम का चलन रहा है, लेकिन आधुनिक फिजिकल थेरेपी जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द, रीढ़ की समस्या जैसे कमर दर्द के अलावा लकवाग्रस्त हो चुके मरीजों की समस्याओं को दूर करने में पूरक चिकित्सा के तौर पर पीड़ितों को राहत पहुंचा रही है। फिजिकल थेरेपी का दायरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अनेक मामलों में फिजिकल थेरेपी पूरक चिकित्सा के तौर पर कार्य करती है, तो वहीं कुछ ऐसे भी मामले होते हैं, जहां यह मरीज को एकल चिकित्सा के तौर पर राहत प्रदान करती है। सबसे पहले फिजिकल थेरेपिस्ट मरीज के दर्द का कारण क्या है, इसे जानने का प्रयास करते हैं। कारण का पता चलने पर फिजिकल थेरेपी से इलाज की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाती है।
ऑस्टियोअर्थराइटिस से आराम
ऑस्टियोआर्थराइटिस खासकर घुटने और कूल्हे में दर्द, अकड़न और चलने या सीढ़ियां चढ़ने जैसी आम गतिविधियों में मुश्किलें उत्पन्न करता है। फिजियोथेरेपी से इलाज में जोड़ों की गतिविधियों को सक्रियगतिमान बनाए रखने और उनके आसपास की मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलती है। ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या में राहत दिलाने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की स्थितियों के अनुसार इन विधियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
दर्द कम करना: हाथों से की जाने वाली थेरेपी और मालिश से जोड़ों का दर्द और जकड़न घटती है।
मांसपेशियां मजबूत करना: प्रभावित जोड़ के आसपास की मांसपेशियों को ताकत मिलने से जोड़ पर दबाव कम पड़ता है।
गतिशीलता बढ़ाना: स्ट्रेचिंग और एक्सरसाइज से उठनेबैठने, चलने और सीढ़ियां चढ़ने में आसानी होती है।
स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज: कुर्सी पर बैठकर पैर को सीधा ऊपर उठाना और कुछ सेकंड रोकना।
दर्द निवारक साधन: सूजन और दर्द घटाने के लिए ‘टीईएन एस’ थेरेपी, हॉट या कोल्ड पैक का सहारा लिया जाता है।
संतुलन और स्ट्रेचिंग: मांसपेशियों की जकड़नकड़ेपन को दूर करने और संतुलन सुधारने वाले हल्के व्यायाम करवाए जाते हैं।
पीठ के पुराने दर्द में राहत
लंबे समय तक बैठे रहना, चलने फिरने, उठनेबैठने और कार्य करने के दौरान गलत मुद्राएं
रखना, कमजोर मसल्स और पिछली चोटें, ये सभी लगातार पीठ दर्द का कारण बन सकती हैं। फिजियोथेरेपी का मकसद दर्द कम करना है, लेकिन इसका मकसद मूवमेंट को बेहतर बनाना भी है ताकि दर्द वापस न आए।
कमर दर्द के इलाज में कोर और ट्रंक को मजबूत करने वाले व्यायामों को महत्व दिया जाता है। कोर और ट्रंक थेरेपी रीढ़ की हड्डी, पेट और कमर के आसपास की मांसपेशियों को मजबूत और स्थिर बनाने वाली एक महत्वपूर्ण फिजियोथेरेपी प्रक्रिया है। यह थेरेपी विशेष रूप से पीठ दर्द से राहत पाने, शारीरिक संतुलन सुधारने और उठनेबैठने की मुद्रा को ठीक करने के लिए की जाती है।
मूवमेंट कंट्रोल को बेहतर बनाने वाली एक्सरसाइज, एरोबिक कंडीशनिंग और प्रभावित मांसपेशियों को मजबूत करने के साथसाथ फ्लेक्सिबिलिटी पर काम करना शामिल हो सकता है।
इलेक्ट्रोथेरेपी आदि से सूजन और दर्द में राहत
शरीर के किसी भी अंग में तेज दर्द और बहुत ज्यादा सूजन होने पर फिजियोथैरेपी और इससे संबंधित गैजेट्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता,जब तक कि तेज दर्द की स्थिति नियंत्रण में नहीं आ जाती और मरीज राहत महसूस नहीं करता। दवाओं से सूजन और दर्द कम हो जाने के बाद ही फिजियोथैरेपी की विधियों का मरीज पर इस्तेमाल किया जाता है।
सूजन और दर्द के नियंत्रित हो जाने के बाद
फिजिकल थेरेपी
की विभिन्न विधियां जैसे इलेक्ट्रोथेरेपी आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इलेक्ट्रोथेरेपी से सूजन और दर्द में राहत मिलती है। कई तरह के इलेक्ट्रिक उपकरण हैं,जो सूजन और दर्द को कम करने में सहायक हैं। जैसे टीईएनएस, आईएफटी, पल्स इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड थेरेपी, टीकार थेरेपी और अल्ट्रासोनिक थेरेपी। हाई पॉवर लेजर तकनीक फिजियोथैरेपी की आधुनिक उपचार विधि है।
स्ट्रोक के बाद रिकवरी
स्ट्रोक के बाद व्यक्ति को कमजोरी, चलनेफिरने और शारीरिक संतुलन को स्थापित करने में दिक्कत होती है। स्ट्रोक के कारण प्रभावित हुए हाथ की गतिविधियों में दिक्कत हो सकती है। वैसे स्ट्रोक में पीईएमएफ का इस्तेमाल अच्छा है। स्ट्रोक से रिकवरी के लिए पीईएमएफ थेरेपी और पारंपरिक फिजियोथेरेपी का समन्वय एक असरदार आधुनिक इलाज माना जाता है। जहां फिजियोथेरेपी मरीज के शरीर को बाहरी रूप से हिलानेडुलाने और मांसपेशियों को मजबूत करने में मदद करती है, वहीं पीईएमएफ थेरेपी मस्तिष्क की कोशिकाओं को गहरे स्तर पर जाकर सक्रिय करती है। बहरहाल स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी का मकसद मरीज के शारीरिक संतुलन को बेहतर बनाना है।
डेवलपमेंटल डिले की समस्या
डेवलपमेंटल डिले या विकासात्मक विलंब वह स्थिति है, जब कोई बच्चा अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तुलना में शारीरिक, मानसिक, भाषा या सामाजिक व्यवहार में लगातार पीछे रह जाता है। फिजियोथेरेपी से ऐसे बच्चों की न्यूरो प्राॅब्लम्स और सेरेब्रल पाल्सी सरीखी बीमारी के कारण होने वाली दिक्कतों या कुछ डिसऑर्डर्स को एक ‘पर्सनलाइज्ड फिजियोथेरेपी प्रोग्राम’ से फायदा हो सकता है।
सांस की बीमारियां
फिजियोथेरेपी उन लोगों के मामले में भी राहत प्रदान कर सकती है, जो सांस की कुछ बीमारियों से ग्रस्त हैं या जो किसी लंबी बीमारी से ठीक हो रहे हैं या अस्पताल में रहने के बाद स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। रेस्पिरेटरी फिजियोथेरेपी का मकसद सांस लेने की क्षमता में सुधार करना है, जिसके अंतर्गत सांस लेने की एक्सरसाइज, पोजीशनिंग, चेस्ट फिजियोथेरेपी आदि शामिल की जा सकती हैं।
याद रखें फिजियोथेरेपी असरदार तब होती है, जब इसे व्यक्ति के हिसाब से बदला जाए, न कि सिर्फ इसलिए चुना जाए, क्योंकि कोई खास तकनीक आजकल प्रचलन में है। इलाज का कोई भी तरीका तय करने से पहले, एक फिजियोथेरेपिस्ट मरीज के दर्द, उसके मूवमेंट की रेंज व उसकी शारीरिक स्थिति, उसके शारीरिक संतुलन की क्षमता और मेडिकल हिस्ट्री की जांच करता है।
स्पोर्ट्स इंजरीज में राहत
खेलकूद में भाग लेने वाले किसी भी व्यक्ति को चोट लग सकती है। खेल के दौरान उनके टेंडन या लिगामेंट में चोट लग सकती है, जिसके कारण उनके प्रभावित अंग में मोच, दर्द और खिंचाव आदि समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह बात एथलीटों के अलावा जॉगिंग करने वाले लोगों पर भी लागू होती है। फिजियोथेरेपी के जरिए ऐसे मामलों में सबसे पहले लक्षणों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। स्पोर्ट्स इंजरी के मामलों में इलाज के अंतर्गत थेराप्यूटिक एक्सरसाइज, मोबिलिटी एक्सरसाइज, मैनुअल थेरेपी और बैलेंस स्थापित करने की ट्रेनिंग शामिल हो सकती है।



