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​155 दिन, 10 बड़े मामले और 23 मृत्युदंड: जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा- डरकर नहीं, निष्पक्ष होकर करूंगा न्याय

​155 दिन, 10 बड़े मामले और 23 मृत्युदंड: जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा- डरकर नहीं, निष्पक्ष होकर करूंगा न्याय

डिजिटल डेस्क लखनऊः मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर3 के जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने एक फैसले में न्यायिक दबाव और कथित धमकियों को लेकर एक बड़ा खुलासा किया। जज ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया और गैंगस्टरों की ओर से उनके पास मैसेज भिजवाया गया कि अगर वह उनके पीछे पड़े तो उनका कोर्ट बदलवा दिया जाएगा या उनका जिले से बाहर ट्रांसफर करा दिया जाएगा।

जज दिवाकर ने साफ शब्दों में कहा कि वह डरपोक जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि उनके मातापिता ने उन्हें भगवान के अलावा किसी और से कभी भी न डरने की सीख दी है। न्यायाधीश ने यह टिप्पणी मुजफ्फरनगर के शाहपुर कस्बे में करीब आठ साल पहले घरेलू विवाद में जिंदा जलाई गई 23 साल की शहजादी के मामले में उसके शौहर नदीम को मृत्युदंड सुनाते हुए की।

फैसले में जज ने बताया धमकी का पूरा संदर्भ

शहजादी हत्याकांड के फैसले में जज रवि कुमार दिवाकर ने लिखा कि उन्हें मैसेज के जरिए चेतावनी दी गई थी कि फिलहाल उनसे केवल पत्रावलियां हटवाई गई हैं। अगर वह संबंधित लोगों के पीछे पड़े या कोई टिप्पणी की तो उन्हें इसका अंजाम भुगतना होगा। उनका कोर्ट बदलवाया जा सकता है या फिर उन्हें जिले से बाहर स्थानांतरित कराया जा सकता है।

जज ने कहा कि अगर कोई न्यायाधीश बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों के दबाव में काम करने लगे तो इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होगा। उन्होंने फैसले में यह भी कहा कि अगर वह ऐसी शक्तियों से डरे होते हैं तो न्यायिक संस्था से इस्तीफा देना उनके लिए ज्यादा सही होगा।

गवाहों के मुकरने के बावजूद मृत्यु पूर्व बयान बना आधार

शहजादी को जिंदा जलाने के मामले में अदालत ने उसके शौहर नदीम को फांसी की सजा सुनाई। मुकदमे के दौरान वादी के पिता समेत अन्य गवाहों के पक्षद्रोही होने के बावजूद अदालत ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज शहजादी के मृत्यु पहले बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।

फैसले में जज ने कहा कि एक अबला महिला को जिंदा जलाने वाला व्यक्ति सहानुभूति का हकदार नहीं है। अदालत ने मौजूद साक्ष्यों और मृत्यु पूर्व बयान के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाई।

155 दिनों में 10 मामलों में सुनाए मृत्युदंड

जज रवि कुमार दिवाकर के कार्यकाल में छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिनों में 10 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड यानी की फांसी की सुनाई है। इसे मुजफ्फरनगर न्यायालय की करीब 70 साल की न्यायिक यात्रा में एक उल्लेखनीय रिकॉर्ड के तौर पर बताया गया है।

मुजफ्फरनगर में न्यायालय की शुरुआत 12 अप्रैल 1956 को मेरठ से विभाजन के बाद अस्थायी न्यायालय के रूप में हुई थी। इसके बाद 14 जुलाई 1958 से यहां स्थायी रूप से न्यायिक कार्य शुरू हुआ।

इन चर्चित मामलों में सुनाई फांसी

एडवोकेट समीर सैफी हत्याकांड — 6 अप्रैल 2026
15 अक्टूबर 2019 को 40 लाख रुपये के लेनदेन के विवाद में अधिवक्ता समीर सैफी की हत्या कर दी गई थी। अदालत ने सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को फांसी की सजा सुनाई। 

शेखर हत्याकांड — 28 अप्रैल 2026
भौराकलां थाना क्षेत्र के सिसौली निवासी शेखर की 2019 में 70 हजार रुपये के लेनदेन के विवाद में खेड़ी सूंडियान गांव के पास हत्या कर दी गई थी। मामले में अदालत ने मुकेश, उसके बेटे प्रदीप, संदीप और सोनू को सजा सुनाई।

राजेश देवीहिमांशु हत्याकांड — 30 मई 2026
छपार के सलेमपुर निवासी सुरेश की पत्नी राजेश देवी अपने छह वर्षीय बेटे हिमांशु के साथ नवंबर 2011 में घर से निकली थीं। बाद में दोनों के शव चरथावल क्षेत्र में मिले थे। हत्या के इस मामले में अदालत ने रईस को मृत्युदंड सुनाया।

राजेंद्र सैनी हत्याकांड — 20 जून 2026
ककरौली निवासी राजेंद्र सैनी की 2018 में हत्या कर शव जलाने के मामले में अदालत ने रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को मृत्युदंड सुनाया। मामले के एक आरोपी वीरसैन की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी थी।

होमगार्ड रतिराम हत्याकांड — 2 जुलाई 2026
शहर कोतवाली के बुढ़ाना मोड़ पर वर्ष 2020 में गश्त के दौरान होमगार्ड रतिराम की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले में अदालत ने दोषी दीपक को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

न्यायपालिका पर भरोसा बनाए रखने पर जोर

जज दिवाकर ने अपने फैसले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि न्यायाधीश अपराधियों या प्रभावशाली लोगों के दबाव में निर्णय लेने लगें तो आम जनता का अदालतों पर विश्वास प्रभावित होगा। उनका कहना है कि न्यायिक पद पर रहते हुए भय के बजाय कानून और न्याय के आधार पर निर्णय लेना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।

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