
डिजिटल डेस्क लखनऊ: गौतमबुद्ध नगर की DM मेधा रूपम को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर NSA लगाने और हिरासत में लेने के मामले में कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि IAS और IPS अधिकारियों की निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर अधिकारी और पुलिस अपनी शक्तियों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल करते रहे तो उत्तर प्रदेश एक दिन ‘Orwellian Dystopia’ यानी ऐसी दमनकारी व्यवस्था में बदल जाएगा है, जहां लोगों की आजादी और अधिकारों पर सरकारी नियंत्रण हावी हो जाएगा।
यह टिप्पणी कोर्ट के 15 पेज के विस्तृत आदेश में सामने आई है। इससे पहले 2 सितंबर को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी थी।
क्या है आकृति चौधरी का पूरा मामला?
आपको बता दें कि अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया था। इसी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में दिल्ली यूनिवर्सिटी की 25 साल की हिस्ट्री ग्रेजुएट आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था।
बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी की NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया। आकृति ने अपने ऊपर हुई इस कार्रवाई को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी।
इससे पहले की आगे बढ़े तो आपको बता दें की NSA क्या है और क्या लगाया जाता है यह बता देते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980 में लागू किया गया एक सख्त निवारक निरोध कानून है, जो केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि यदि उन्हें लगे कि कोई व्यक्ति देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, या आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति के लिए खतरा है, तो वे उसे गिरफ्तार कर सकते हैं। इसे इसलिए लगाया जाता है ताकि किसी संभावित अपराध या खतरे को होने से पहले ही रोका जा सके। इस कानून के तहत किसी संदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी आरोप के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है, और इस दौरान उसे वकील की सहायता का अधिकार भी नहीं होता है।
2 सितंबर को हाई कोर्ट ने NSA के तहत उनकी हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत के लिए जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, उसमें पूरे आधार नहीं थे और पूरी कार्रवाई में कानून से जुड़ी कई गंभीर कमियां भी थीं।
इसके बाद कोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। अदालत ने कहा कि मुआवजे की पूरी रकम DM मेधा रूपम की सैलरी से वसूली जाए।
कोर्ट ने प्रशासन को क्यों फटकारा?
डिटेल में दिए गए आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को बड़ी शक्तियां इसलिए दी जाती हैं ताकि वे लोगों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, उनकी गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा कर सकें।
कोर्ट ने साफ कहा कि अधिकारियों की पहली जिम्मेदारी संविधान के प्रति होनी चाहिए, किसी राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं।
अदालत ने चेतावनी दी कि अगर नौकरशाही और पुलिस संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलकर मनमाने तरीके से काम करती है, तो जनता उन्हें ब्रिटिश शासन जैसी दमनकारी व्यवस्था के रूप में देखने लगेगी। इससे लोगों में व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा और अशांति बढ़ सकती है।
‘Orwellian Dystopia’ का जिक्र क्यों आया?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में ‘Orwellian Dystopia’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसका मतलब होता है ऐसी दमनकारी व्यवस्था, जहां सरकार की निगरानी और सख्ती लोगों की आजादी और अधिकारों पर हावी हो जाए।
कोर्ट ने कहा कि अगर प्रशासन में गलत तरीके से काम करने वाले अधिकारी इसी तरह अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते रहे तो उत्तर प्रदेश ऐसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है।
आकृति के खिलाफ पुलिस के आरोपों पर भी सवाल
कोर्ट के मुताबिक आकृति एक महिला छात्रा और एक्टिविस्ट थीं और उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।
पुलिस ने उन पर भीड़ को उकसाने और हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप लगाए था, लेकिन कोर्ट के सामने ऐसा कोई भरोसेमंद मैसेज, ऑडियो, वीडियो या अन्य ठोस सामग्री नहीं रखी गई, जिससे ये आरोप साबित हो सकें।
हाई कोर्ट ने पुलिस की कहानी को ‘concocted’ यानी गढ़ी हुई कहानी तक कहा।
गिरफ्तारी के समय को लेकर भी उठे सवाल
कोर्ट ने आकृति की गिरफ्तारी के समय को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए।
अदालत के मुताबिक आकृति को 11 अप्रैल की शाम करीब 5:30 बजे नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया गया था, जबकि पुलिस रिकॉर्ड में उनकी गिरफ्तारी 12 अप्रैल की दिखाई गई।
ऐसे में कोर्ट ने नोटिस और जनरल डायरी की एंट्री पर भी सवाल उठाए। रिकॉर्ड देखने के बाद अदालत को ऐसा लगा कि पहले आकृति को हिरासत में लिया गया और बाद में पुलिस ने कागजी कार्रवाई पूरी की।
अदालत ने कहा कि जब पुलिस की रिपोर्ट में पुख्ता और भरोसेमंद सबूत न हों, तो NSA जैसे सख्त कानून को लागू करने से पहले DM की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
DM मेधा रूपम के आचरण पर भी टिप्पणी
हाई कोर्ट ने गौतमबुद्धनगर की DM मेधा रूपम के आचरण की भी कड़ी आलोचना की।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि DM आकृति को ‘एक उदाहरण’ के तौर पर पेश करना चाहती थीं। कोर्ट के मुताबिक इसका उद्देश्य सार्वजनिक जगहों पर मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने से लोगों को रोकना था।
इसी वजह से अदालत ने सिर्फ NSA हिरासत रद्द करने तक मामला सीमित नहीं रखा। कोर्ट ने 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया और इसकी वसूली DM समेत जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से करने की बात कही।
अदालत ने जिम्मेदारी तय करने की बात SHO तक कही है। साथ ही संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज करने का निर्देश भी दिया गया है।
NSA हिरासत रद्द हुई, लेकिन आकृति अभी जेल में क्यों हैं?
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। हाई कोर्ट द्वारा NSA के तहत हिरासत रद्द किए जाने का मतलब यह नहीं है कि आकृति चौधरी तुरंत जेल से बाहर आ गईं।
उनके खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े दूसरे आपराधिक मामले भी चल रहे हैं और उन मामलों में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है। इसलिए NSA आदेश रद्द होने के बावजूद वह न्यायिक हिरासत में बनी हुई हैं।
नौकरशाही और पुलिस के लिए हाई कोर्ट का बड़ा संदेश
इस मामले में हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत को गलत ठहराने के साथसाथ प्रशासन और पुलिस को भी स्पष्ट संदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों के पास कानून लागू करने की ताकत जरूर है, लेकिन इस ताकत की सीमा संविधान तय करता है।
यही वजह है कि हाई कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ आकृति चौधरी के मामले तक सीमित नहीं मानी जा रही है। इसे उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और पुलिस के लिए भी एक बड़ी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है।
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