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​समाजवादी सरकार आने पर यूपी में मिलेंगी 8 अतिरिक्त छुट्टियां, अखिलेश यह दांव क्यों खेल रहे हैं?

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है. इसके लिए सभी पार्टियों ने जनता के बीच अपनीअपनी रणनीति दिखानी शुरू कर दी है. इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐसा चुनावी दांव चला है, जिसका सीधा संबंध सरकारी कर्मचारियों से लेकर अलगअलग जातीय और सामाजिक समूहों तक जाता है.

​समाजवादी सरकार आने पर यूपी में मिलेंगी 8 अतिरिक्त छुट्टियां, अखिलेश यह दांव क्यों खेल रहे हैं?

अखिलेश यादव ने कहा है कि अगर 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो कई महापुरुषों और धार्मिकसामाजिक हस्तियों की जयंती पर सरकारी छुट्टियां फिर से शुरू की जाएंगी. इनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल, निषादराज, भगवान परशुराम, अवंतीबाई लोधी, सम्राट अशोक मौर्य, महाराणा प्रताप और विश्वकर्मा जयंती जैसे दिन शामिल हैं. इन मौकों पर 8 दिन की अतिरिक्त सरकारी छुट्टी देने की बात कही गई है.

जातीय समीकरण से है कनेक्शन

जिन छुट्टियों की चर्चा अखिलेश यादव ने की है, उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार ने रद्द किया था. अखिलेश यादव का ये दांव कहीं न कहीं जातीय समीकरण से भी जुड़ा हुआ है. इसको समझने के लिए यूपी की जातीय राजनीति को समझना काफी अहम है. उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर्फ पार्टियों के बीच मुकाबला नहीं होता, बल्कि अलगअलग जातियों और सामाजिक समूहों का समर्थन भी सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है. ऐसे में अलगअलग समुदायों से जुड़े महापुरुषों की जयंती पर छुट्टी देने का ऐलान एक साथ कई वोट बैंक तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है.

छुट्टियों के जरिए ऐसे वोट का जुगाड़

  • महाराणा प्रताप के जरिए राजपूत, परशुराम के नाम पर ब्राह्मण वोटरों को साधने की कोशिश
  • निषादराज, सम्राट अशोक और अवंतीबाई के जरिए पिछड़े वर्गों पर नजर
  • विश्वकर्मा जयंती की छुट्टी से कारीगर और विश्वकर्मा समुदाय को संदेश

चर्चा में अखिलेश यादव का नया दांव

आने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन पहले से ही चर्चा में है. इसी बीच अखिलेश यादव का ये नया दांव काफी असरदार लग रहा है. हालांकि, सपा पहले भी ऐसे फैसलों के जरिए अलगअलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही है. दूसरी तरफ बीजेपी सरकार ने पहले कई महापुरुषों की जयंती पर होने वाली छुट्टियों को खत्म किया था. ऐसे में अखिलेश अब इसे पुराने फैसलों को पलटने और अपनी सरकार की अलग पहचान दिखाने के मौके के तौर पर भी इस्तेमाल कर रहे हैं.

छुट्टी के बहाने कई वोट बैंक पर नजर

अखिलेश यादव का यह ऐलान सिर्फ सरकारी कैलेंडर बदलने तक सीमित नहीं है. इसमें यूपी की चुनावी राजनीति का एक बड़ा संदेश छिपा है. अलगअलग महापुरुषों के नाम पर छुट्टी की घोषणा के जरिए सपा अलगअलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. महाराणा प्रताप का नाम राजपूत समाज में खास महत्व रखता है, अखिलेश यादव ने महाराणा प्रताप की जयंती पर 2 दिन की छुट्टी की बात कही है. ऐसे में उनकी जयंती पर छुट्टी का ऐलान राजपूत वोटरों तक पहुंच बनाने की कोशिश माना जा सकता है.

हर नाम के पीछे है वोट का गणित

इसी तरह सम्राट अशोक के नाम के जरिए मौर्य और अन्य पिछड़े वर्ग के वोटरों को संदेश देने की कोशिश है. भगवान परशुराम का नाम ब्राह्मण समाज से जुड़ा है. निषादराज का नाम निषाद समाज के लिए खास महत्व रखता है. यूपी में निषाद समुदाय कई विधानसभा सीटों पर चुनावी समीकरण को प्रभावित करता है.

इसलिए निषादराज जयंती पर छुट्टी की घोषणा इस समाज को अपने पाले में लाने का संदेश दे सकती है. वहीं विश्वकर्मा जयंती के जरिए विश्वकर्मा और कारीगर समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश नजर आती है. अवंतीबाई लोधी का नाम लोधी समाज से जुड़ता है, जबकि सम्राट अशोक का नाम मौर्य समाज के बीच विशेष पहचान रखता है.

सरकारी कर्मचारियों को भी साधने की कोशिश?

इस पूरे ऐलान का एक और पहलू सरकारी कर्मचारी हैं. अतिरिक्त सरकारी छुट्टियों का सीधा फायदा सरकारी दफ्तरों और उनसे जुड़े कर्मचारियों को मिल सकता है. यूपी में सरकारी कर्मचारियों की संख्या कुल मतदाताओं की तुलना में भले कम हो, लेकिन उनका प्रभाव सिर्फ उनके वोट तक सीमित नहीं रहता. उनके परिवार और सामाजिक नेटवर्क के जरिए भी राजनीतिक संदेश आगे पहुंच सकता है. यूपी में करीब 2 प्रतिशत वोटर्स सरकारी नौकरी में हैं. इन्हें अगर ज्यादा छुट्टियां मिलेंगी तो ये भी सपा की तरफ जा सकते हैं.

योगी सरकार के फैसले से अलग रास्ता

अखिलेश यादव का यह ऐलान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि योगी आदित्यनाथ सरकार ने सत्ता में आने के बाद कई महापुरुषों की जयंती पर मिलने वाली छुट्टियों को लेकर बदलाव किया था. 2017 में योगी सरकार ने स्कूलों में महापुरुषों की जयंती पर होने वाली कई छुट्टियों को खत्म करने का फैसला लिया था.

सरकार का तर्क था कि छुट्टी देने के बजाय उन दिनों स्कूलों में महापुरुषों के जीवन और उनके विचारों के बारे में बच्चों को जानकारी दी जानी चाहिए. उस समय इस फैसले पर राजनीतिक विवाद भी हुआ था. अब अखिलेश उसी मुद्दे को एक नए राजनीतिक वादे के रूप में सामने ला रहे हैं. इसका मकसद यह बताना भी हो सकता है कि सपा की सरकार बनने पर जिन छुट्टियों को खत्म किया गया था, उन्हें दोबारा कैलेंडर में जगह मिलेगी.

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