ओडिशा के बालासोर में एक जंगल से पांच ओरंगुटान बचाए गए हैं. वन अधिकारी भी इनकी मौजूदगी से हैरान हैं क्योंकि ये भारत के जंगलों में आमतौर पर नहीं पाए जाते. कई ग्रामीणों ने इन्हें देखा और उन्हें ये अजीबोगरीब जीव लगे. उन्होंने इसकी जानकारी दूसरे गांववालों को दी और वन अधिकारी यहां तक पहुंचे. इन्हें बिचित्रपुर वन क्षेत्र में देखा गया. इनकी मौजूदगी के बाद सवाल उठा है कि आखिर ये भारत के जंगलों में कैसे पहुंचे क्योंकि ये यहां की प्राकृतिक प्रजाति है ही नहीं.

ओरंगुटान दुनिया में सिर्फ दो जगह पाए जाते हैं. इंडोनेशिया के बोर्नियो और सुमात्रा द्वीप में. ये एशिया में पाया जाने वाला इकलौता ग्रेप एप है, जबकि बाकी सभी ग्रेप एप अफ्रीका में पाए जाते हैं.
ओरंगुटान की तीन प्रजातियां हैं
- बोर्नियन ओरंगुटान: ये बोर्नियो द्वीप पर इंडोनेशिया और मलेशिया दोनों हिस्सों में पाए जाते हैं.
- सुमात्रन ओरंगुटान: सुमात्रा के उत्तरी हिस्से में पाए जाते हैं.
- तापानुली ओरंगुटान: इस प्रजाति को 2017 में खोजा गया था. यह सबसे नई प्रजाति है जो सुमात्रा के बटांग तोरू इलाके तक सीमित है.
ये तीनों सघन उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में रहते हैं और 90% समय पेड़ों पर बिताते हैं और वहीं सोते भी हैं. ओरंगुटान की तीनों ही प्रजातियां IUCN की रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त कैटेगरी में शामिल हैं.
ओरंगुटान की तीन प्रजातियां हैं.
भारत में क्यों नहीं पाए जाते ओरंगुटान?
इसके पीछे कई वजह हैं. आइए एकएक करके समझते हैं.
- अलगअलग रास्ते: ओरंगुटान लाखों साल पहले दक्षिणपूर्व एशिया के एक अलग हिस्से में विकसित हुए. भारतीय उपमहाद्वीप का जीवभूगोल दक्षिणपूर्व एशियाई द्वीपों से अलग रहा है, जिस वजह से यहां इनकी कोई प्राकृतिक आबादी कभी विकसित ही नहीं हुई.
- वालेस रेखा जैसी प्राकृतिक सीमाएं: दक्षिणपूर्व एशिया में कई ऐसी जैवभौगोलिक सीमाएं हैं, जो अलगअलग इलाकों की प्रजातियों को समुद्र और भौगोलिक बाधाओं के जरिए अलग रखती हैं. इससे कई जीवजंतु सिर्फ एक तरफ ही सीमित रह जाते हैं, आगे नहीं फैल पाते.
ये दक्षिणपूर्व एशिया के एक अलग हिस्से में विकसित हुए. फोटो: Pexels
- सिकुड़ता ऐतिहासिक क्षेत्र: दिलचस्प बात यह है कि प्लीस्टोसीन युग में ओरंगुटान जावा से लेकर दक्षिणी चीन तक फैले हुए थे. यानी इनका दायरा कभी आज से कहीं बड़ा था, लेकिन जलवायु परिवर्तन, वनों के सिकुड़ने और मानव विस्तार के कारण अब ये सिर्फ बोर्नियो और सुमात्रा के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह गए हैं. यानी अपने ऐतिहासिक दायरे के मुकाबले 75% तक इनकी आबादी घट चुकी है.
- भारत का अलग पारिस्थितिकी तंत्र: भारत के जंगलों में बाघ, हाथी, तेंदुआ, लंगूर, गिबन जैसे स्थानीय प्राइमेट और वन्यजीव पाए जाते हैं, लेकिन इनका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है. ओरंगुटान के लिए जरूरी विशेष प्रकार का पीटस्वैंप और डिप्टेरोकार्प वन भारत में प्राकृतिक रूप से मौजूद ही नहीं हैं.
ओरंगुटान की तीनों ही प्रजातियां IUCN की रेड लिस्ट में “गंभीर रूप से संकटग्रस्त” कैटेगरी में शामिल हैं. फोटो: Pexels
ये ओडिशा के बालासोर के जंगल में कैसे पहुंचे?
ओरंगुटान भारत के किसी भी प्राकृतिक जंगल में खुद नहीं पहुंच सकते. बोर्नियोसुमात्रा से बालासोर की दूरी करीब 4000 किलोमीटर है और बीच में समुद्र भी है, इसलिए इन्हें तस्करी का मामला भी माना जा रहा है. एक ओरंगुटान की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लाखों में होने की वजह से, अवैध वन्यजीव तस्करी नेटवर्क के जरिए इन्हें लाए जाने की आशंका जताई जा रही है, जिसकी जांच जारी है.


