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​Orangutans News: ओडिशा में मिले पांच ओरंगुटान ने फिर जिंदा कर दी कानपुर में जन्मे जंगल के मानुष ‘मंगल ‘ की कहानी

​Orangutans News: ओडिशा में मिले पांच ओरंगुटान ने फिर जिंदा कर दी कानपुर में जन्मे जंगल के मानुष ‘मंगल ‘ की कहानी

कानपुर से लौटकर वीरेंद्र पांडेय :

ओडिशा के बालासोर के जंगल में एक साथ मिले पांच नन्हे ओरंगुटान ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। भारत में प्राकृतिक रूप से न पाए जाने वाले इन पांच वनमानुषों को आखिर हजारों किलोमीटर दूर बालासोर के जंगल में कौन लेकर आया, यह अभी जांच का विषय है। लेकिन इन पांच बच्चों की तस्वीरें सामने आते ही देशवासियों खासकर उत्तर प्रदेश के वन्यजीव प्रेमियों को कानपुर प्राणि उद्यान का वह ओरंगुटान याद आ गया, जो जन्म से भारतीय था।  जिसकी कहानी खुद में अनोखी थी। उसका नाम था मंगल। ओरंगुटान मंगल कोई सामान्य चिड़ियाघर में पला वनमानुष नहीं था। उसका जन्म कानपुर चिड़ियाघर में हुआ, मां की मौत के बाद इंसानों ने उसकी परवरिश की और धीरेधीरे वह चिड़ियाघर के कर्मचारियों और दर्शकों के बीच खास पहचान बन गया। ओडिशा में मिले पांच मासूम ओरंगुटान के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो करीब पांच दशक पहले कानपुर में इंसानों की देखभाल में बड़े हुए मंगल की कहानी फिर प्रासंगिक हो गई है। पांच नन्हे ओरंगुटानों के भारत में बने रहने की उम्मीद बढ़ गयी है।

कानपुर प्राणि उद्यान के मुख्य प्रवेश द्वार की फोटो

 

13 नवंबर 1979 को कानपुर जू में हुआ था जन्म

कानपुर चिड़ियाघर के रिकॉर्ड और उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के मुताबिक मंगल का जन्म 13 नवंबर 1979 को कानपुर जू में हुआ था। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से जुड़े रिकॉर्ड में भी उसे कानपुर जू में जन्मा नर ओरंगुटान दर्ज किया गया है। कानपुर चिड़ियाघर के इतिहास से जुड़े उपलब्ध विवरण भी मंगल के जन्म की यही तारीख बताते हैं। मंगल की मां का नाम दयांग था वहीं पिता का नाम अवांग था। बताया जा रहा है कि मंगल के मातापिता को 28 अक्टूबर 1976 को  इंग्लैंड के ब्रिस्टल चिड़ियाघर से कानपुर लाया गया था मंगल की खासियत सिर्फ उसका कानपुर में जन्म लेना नहीं था। उसके जन्म के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उसे इंसानी देखभाल में बड़ा होना पड़ा। विभिन्न रिपोर्ट बताती हैं कि उसकी मां की मौत के बाद चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने उसे संभाला। उसे बोतल से दूध पिलाया गया और इंसानों की देखरेख में उसका जीवन बीता। यही वजह थी कि मंगल का रिश्ता अपने देखभाल करने वालों से सामान्य वन्यजीव और कर्मचारी के रिश्ते से कहीं अलग हो गया था।

कानपुर प्राणि उद्यान के वन्य जीव चिकित्सक डॉ.मो.नासिर

 

बोतल से दूध पिलाने वाले कर्मचारी से लेकर दर्शकों के चहेते तक

मंगल की परवरिश में चिड़ियाघर के कुछ कर्मचारियों की भूमिका बेहद आत्मीय मानी जाती है। कानपुर प्राणि उद्यान के रजिस्टरों के पन्ने पलटने पर जिन वन्य कर्मियों की सेवा का खास उल्लेख मिलता है उनमें नाथू, शिव नरायण और मसीचरण का नाम है। कोई उसे बोतल से दूध पिलाता था तो कोई नाज नखरे उठाता था। तीनों कर्मचारियों की देखभाल ने को मंगल बड़ा किया।  जू के मेडिकल आफिसर डॉ मोहम्मद नासिर ने अमृत विचार से विशेष बातचीत में बताते हैं कि मंगल धीरेधीरे कानपुर जू की पहचान बन गया। उसके बाड़े के सामने दर्शकों की भीड़ लगती थी। उम्र बढ़ने के साथ उसकी सक्रियता कम हुई, लेकिन दर्शकों की उसमें दिलचस्पी कम नहीं हुई। कानपुर चिड़ियाघर में कभी वनमानुष के लिए बना बाड़ा मंगल की मौजूदगी से गुलजार रहता था। आज उसकी कहानी ही उस जगह की सबसे बड़ी यादों में शामिल है।  एक प्रकाशित रिपोर्ट में भी मंगल को उन वन्यजीवों में गिना गया, जो कानपुर जू की पहचान हुआ करते थे और अब वहां नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार मंगल की मौत के समय वह देश का इकलौता नर वनमानुष था।

भारतीय वनमानुष की साथी बनी जर्मनी से लायी गयी ‘दुआ’

कानपुर प्राणि उद्यान के रजिस्टर का वह फोटो जिसमें मादा ओरंगुटान के साथ मंगल घूम रहा है।

 

80 के दशक में भारतीय वनमानुष मंगल  जब वयस्क हुआ तो जू प्रशासन को उसका परिवार बढ़ाने की चिंता हुई। भारत में ओरंगुटान की संख्या बेहद सीमित थी और विदेशी वन्यजीवों के आदानप्रदान से जुड़े नियम भी कड़े थे। इसके कारण उसके लिए मादा साथी लाना आसान नहीं था, फिर भी कानपुर प्राणी उद्यान प्रशासन की कोशिशे रंग लाईं और दुआ को यहा लाया गया। चिड़ियाघर के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार दुआ का जन्म 10 अक्टूबर 1976 को जर्मनी के मशहूर हाइडेलबर्ग चिड़ियाघर में होना दर्ज है। अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव विनिमय कार्यक्रम के तहत दुआ को 2 अक्टूबर 1985 को कानपुर चिड़ियाघर लाया गया। बाद में दुआ और उसके साथी मंगल की जोड़ी ने कानपुर और आसपास के जिलों से आने वाले पर्यटकों के दिलों में अपनी एक खास जगह बनाई । हालांकि दोनों के कोई संतान नहीं हुई। दुआ की कुछ सालों बाद 2005 में मौत हो गई। डॉ. नासिर बताते हैं कि उसके बाद भी चिड़ियाघर प्रशासन ने कोशिश की कोई दूसरा साथी मंगल के लिये लाया जाये पर ऐसा हो नहीं सका। यानी मंगल की कहानी सिर्फ एक ऐसे वनमानुष की कहानी नहीं थी, जो कानपुर में पैदा हुआ था। यह उस दौर की कहानी भी थी जब भारत के चिड़ियाघरों में ओरंगुटान जैसे दुर्लभ वनमानुषों की देखभाल और प्रजनन अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

गर्मी में पानी से करता था अठखेली,तैरने का था शौक

ओरंगुटान मंगल की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा याद करते हुये कानपुर प्राणी उद्यान के वन्यजीव चिकित्सक डॉ. मो.नासिर बताते हैं कि भीषण गर्मी से बचने के लिए मंगल अपने बाड़े के गीले मोट में काफी समय बिताता था। चिड़ियाघर के कर्मचारी सुबह उसे एक घंटे से ज्यादा समय तक नहलाते थे, लेकिन पानी से बाहर आने के बाद वह फिर मोट में चला जाता था। शाम होने के बाद कर्मचारी उसे बाहर निकालने की कोशिश करते थे। डॉ. मो. नासिर बताते हैं कि मंगल को स्वीमिंग का बड़ा शौक था, यही वजह है कि ज्यादातर समय पानी में गुजारता था।

अजनबी लोगों को देखते ही चेहरे पर थूकने की थी आदत

ओरंगुटान मंगल को अजनबी लोग पसंद नहीं थे। और उनसे छुटकारा पाने के लिए उसने थूकने को अपना हथियार बना लिया था। डॉ. मो. नासिर  जब पहली बार उससे मिले तो खुद उनको भगाने के लिए मंगल ने थूक का सहारा लिया।  डॉ नासिर याद करते हुए बताते हैं कि उनकी साल 2014 में बतौर वन्यजीव चिकित्सक कानपुर प्राणी उद्यान में तैनाती हुई थी, उस समय वह मंगल को देखने बाड़े में गये, तभी मंगल उन्हें देखकर मुंह बनाने लगा। मंगल थूकने ही वाला था कि साथ के एक कर्मचारी ने उन्हें वहां से हटा दिया। इसके बाद उस कर्मचारी ने बताया कि जब किसी अजनबी को देखता है जो वह असहज होता है तो गुस्से में वह उस अजनबी के मुंह पर सीधे थूक देता है।

ओरंगुटान में इंसानों जैसी होती है बीमारी

डॉ. मो.नासिर बताते हैं कि जिस तरह इंसानों में हेपेटाइटिस, टीबी, पोलियों या हरपीज वायरस का संक्रमण होता है, ठीक उसी प्रकार ओरंगुटान में भी बीमारियों होती हैं, संक्रमण होता है। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि ज़ूऑनॉटिक बीमारी यानी पशुओं से इंसानों में होने वाली बीमारी के वाहक के तौर पर भी ओरंगुटान की पहचान भी इसलिए ही होती है।

ओडिशा में पांच छोटे ओरंगुटान ने खड़ा किया बड़ा सवाल

अब करीब पांच दशक बाद ओरंगुटान फिर भारतीय खबरों के केंद्र में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कहानी कानपुर की नहीं, ओडिशा के बालासोर की है। आठ सितंबर को बालासोर के भोगराई क्षेत्र में ग्रामीणों ने जंगल में पांच छोटे ओरंगुटान देखे। उन्हें सुरक्षित निकालकर नंदनकानन प्राणी उद्यान लाया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इनमें तीन नर और दो मादा हैं और सभी की उम्र एक वर्ष से कम बताई गई है। इनमें से एक को बुखार भी था, हालांकि उसकी हालत स्थिर बताई गई। फिलहाल पांचों को क्वारंटीन में रखकर चिकित्सकीय निगरानी की जा रही है। नंदनकानन में इनकी विशेष देखभाल की जा रही है। तापमान नियंत्रित क्वारंटीन व्यवस्था, लगातार निगरानी, फल और दूसरे आहार के साथ इनके लिए खिलौने और झूले तक उपलब्ध कराए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इन्हें करीब हर दो घंटे पर केले और सेब दिए जा रहे हैं।

जंगल में पहुंचे कैसे, यही सबसे बड़ा रहस्य

ओडिशा में मिले पांचों ओरंगुटान का मामला इसलिए असाधारण है क्योंकि यह प्रजाति भारत की मूल वन्यजीव प्रजाति नहीं है। ओरंगुटान का प्राकृतिक आवास मुख्य रूप से इण्डोनेशिया और सुमात्रा के वर्षावन हैं। बालासोर में इनका मिलना इसलिए सवाल खड़ा करता है कि ये वहां तक पहुंचे कैसे। वन अधिकारियों ने भी कहा है कि बालासोर के जंगल तक इनके प्राकृतिक रूप से पहुंचने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि इस क्षेत्र का उनके प्राकृतिक आवास से कोई प्राकृतिक कॉरिडोर नहीं जुड़ता। इसी वजह से मानव हस्तक्षेप की आशंका की जांच की जा रही है। पांचों के भारत पहुंचने की सही कहानी अभी सामने नहीं आई है। संभावित वन्यजीव तस्करी भी जांच के कोणों में शामिल है, लेकिन अभी इसे साबित तथ्य के रूप में कहना जल्दबाजी होगी। एसटीएफ और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो समेत संबंधित एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं।

इसलिए महत्वपूर्ण है जंगल के मानुष मंगल की कहानी

बालासोर में मिले पांचों छोटे ओरंगुटान के सामने आज वही मूल सवाल है जो किसी भी अनाथ या मां से अलग हुए वन्यजीव के सामने होता है, उनकी देखभाल कैसे होगी और उनका भविष्य क्या होगा? मंगल की कहानी इसका एक भारतीय उदाहरण देती है। करीब 47 साल पहले कानपुर में जन्मे इस वनमानुष की मां के बाद इंसानों ने उसकी देखभाल की और वह उसी वातावरण में बड़ा हुआ। वह वर्षों तक कानपुर जू के दर्शकों का आकर्षण बना रहा। लेकिन मंगल और ओडिशा के पांचों बच्चों के बीच एक बड़ा फर्क भी है। मंगल का जन्म कानपुर जू में हुआ था, जबकि बालासोर के पांचों ओरंगुटान वहां कैसे पहुंचे, यह अभी रहस्य है। यही रहस्य इस पूरी कहानी को सिर्फ वन्यजीव खबर नहीं रहने देता। कानपुर का मंगल बताता है कि इंसानी देखभाल में एक ओरंगुटान की पूरी जिंदगी बदल सकती है।  मंगल अब कानपुर प्राणी उद्यान में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी आज भी वहां के उस खाली पड़े बाड़े और पुराने कर्मचारियों की यादों में मौजूद है। साथ ही बालासोर में मिले पांच मासूम ओरंगुटान को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब भी है कि उनकी आगे की जिंदगी कैसी होगी।

ओरंगुटान इसलिए करते हैं इंसानों की तरह व्यवहार

डॉ. मो.नासिर के मुताबिक ओरंगुटान की क्रोनियल क्षमता लगभग मनुष्यों के बराबर होती है। जिसकी वजह से सोंचने समझने की शक्ति बराबर होती है। क्रोनियल कैपिसिन के बारे में उन्होंने बताया कि खोपड़ी का वह अंदरूनी हिस्सा होता है, जिसमे दिमाग सुरक्षित रहता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि सल्काई और गाइरी की बनावट कुछकुछ इंसानों जैसी ही होती है।

मंगल के बाड़े का द्श्य दिखाते वन्य जीव चिकित्सक डॉ.मो. नासिर

मंगल के बाड़े का दृश्य दिखाते वन्य जीव चिकित्सक डॉ.मो. नासिर

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