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​25 की उम्र, 63 दिन का मौन… जतीन्द्रनाथ दास की भूख हड़ताल ने कैसे हिला दी अंग्रेजी हुकूमत?

13 सितम्बर 1929. दोपहर करीब एक बजे. सिर चढ़े सूरज पर जैसे काले बादलों ने पहरा बिठा दिया. असमय सूरज डूब गया. सांसों की डोर टूट गई. अजेय संकल्पों के धनी जतीन्द्रनाथ ने मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दे दिया. उनकी शहादत जेल की दीवारों के भीतर बंद नहीं रह सकी. वह लाहौर से निकलकर पंजाब, दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद होते हुए कलकत्ता पहुंच गई. रास्ते में हर पड़ाव पर वह अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आजादी के संघर्ष का शंखनाद करती गई.

​25 की उम्र, 63 दिन का मौन… जतीन्द्रनाथ दास की भूख हड़ताल ने कैसे हिला दी अंग्रेजी हुकूमत?

उनकी कुर्बानी ने भगत सिंह को रुला दिया. मौत से न घबराने वाले दूसरे क्रांतिकारी साथियों की आंखों के आंसू भी नहीं थमे. जेल के बाहर खबर पहुंची तो हर कदम जेल की ओर बढ़ने लगा. जतीन्द्र ने शरीर के रक्त की हर बूंद की आजादी की लड़ाई के यज्ञकुंड में आहुति दे दी थी.

17 साल की उम्र में आजादी के संघर्ष से जुड़े

27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में जन्मे जतीन्द्रनाथ सामान्य बंगाली परिवार से थे. पिता थे बंकिम बिहारी दास. जतीन्द्र नौ साल के थे, तभी मां सुहासिनी देवी का साया उठ गया. मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान, महज सत्रह वर्ष की उम्र में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. फिर क्रांतिकारियों के संपर्क में आये. अनुशीलन समिति से जुड़े. बी.ए. की पढ़ाई के दौरान जेल चले गए. बाद में सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के जरिये हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े. अनेक क्रांतिकारी कार्रवाइयों में भागीदारी की. सुभाष चंद्र बोस के भी नजदीक आए और उनके सहयोगी बने. भगत सिंह ने उनसे फिर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय होने का आग्रह किया. वे आगरा पहुंचे. बम बनाने में साथियों की मदद की. 14 जून 1929 को उन्हें लाहौर जेल में डाल दिया गया.

जतीन्द्रनाथकी शहादत जेल की दीवारों के भीतर बंद नहीं रह सकी.

जानवरों से बदतर सलूक के खिलाफ भूख हड़ताल

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेम्बली में बम विस्फोट किया था. मकसद किसी को मारना नहीं था. विस्फोट करने के बाद वे भाग सकते थे. लेकिन उन्होंने गिरफ्तारी दी. फिर जेल में भूख हड़ताल शुरू की. तो क्या वे लड़ाई का रास्ता बदल रहे थे? असलियत में वे हर स्तर पर लड़ने का संदेश दे रहे थे. इस भ्रम को दूर करना चाहते थे कि क्रांतिकारियों का मकसद किसी की जान लेना और दहशत फैलाना भर है.

वे बता रहे थे कि उनके पास विचार हैं और संघर्ष की दिशा को लेकर स्पष्ट सोच और योजनाएं भी हैं. उन्हें अमली जामा पहनाने का साहस और धैर्य भी है. स्थान और परिस्थिति के अनुसार वे संघर्ष का स्वरूप तय कर रहे थे. जेल में थे तो अनशन के जरिए भारतीय और यूरोपीय कैदियों के बीच भेदभाव के विरोध में लड़ रहे थे. जानवरों से बदतर सलूक और राजनीतिक कैदियों को वाजिब सहूलियतें न मिलने के खिलाफ यह भूख हड़ताल थी.

लाहौर षड्यंत्र केस में जतीन थे शामिल

असेम्बली बम कांड में गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह को मियांवाली और बटुकेश्वर दत्त को लाहौर की बोर्स्टल जेल में रखा गया था. भगत सिंह ने 15 जून 1929 से अनशन शुरू कर रखा था. बटुकेश्वर दत्त और दूसरे साथी लाहौर जेल में अनशन पर थे.इसी बीच साण्डर्स हत्या मामले में भगत सिंह लाहौर जेल लाये गए. भगत सिंह के अनशन की खबर के साथ दूसरी जेलों के राजनीतिक कैदी भी भूख हड़ताल पर बैठ गए. अखबारों के जरिए खबरें जनता तक पहुंचीं. स्थानस्थान पर समर्थन में प्रदर्शन, सभाएं और भूख हड़तालों का सिलसिला शुरू हो गया. लाहौर जेल में चल रहे अनशन में जतीन्द्रनाथ दास भी शामिल थे. साण्डर्स हत्या कांड का मुकदमा लाहौर षडयंत्र केस के नाम से जाना गया. इस केस के भगत सिंह सहित 28 अभियुक्तों में जतीन्द्रनाथ भी शामिल थे. असेम्बली में फेंके गए बम तैयार करने में भी उनकी भूमिका थी.

जतींद्रनाथ की कुर्बानी ने भगत सिंह को रुला दिया था.

जतीन का दूसरा अनशन

दिलचस्प यह कि भूख हड़ताल शुरू करने के पहले जतीन्द्रनाथ ने भगत सिंह को भावुक नजरिये से बचने की सलाह दी थी. उन्होंने सचेत किया था कि यह लड़ाई लंबी चलेगी. बीच में ही भूख हड़ताल खत्म करने से बेहतर है कि उसे शुरू ही न किया जाए. जतीन्द्रनाथ भूख हड़ताल के खिलाफ नहीं थे. वे साथियों को उसके हासिल का हिसाब समझाना चाहते थे. लेकिन फिर साथियों की बात मानी. भूख हड़ताल की अगुवाई की और उसे आखिरी सांस तक जारी रखा. वैसे जतीन्द्रनाथ के लिए अनशन कोई नया हथियार नहीं था. 1925 में मैमनसिंह जेल में भी उन्होंने कैदियों के साथ खराब व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की थी. तब 21 दिन बाद जेल प्रशासन को उन्हें रिहा करना पड़ा था. इस बार की लड़ाई और लम्बी, कठिन और आखिरी सांस तक चलनी थी.

सरकार को परवाह नहीं

लाहौर जेल में जतीन्द्रनाथ का अनशन 13 जुलाई 1929 को शुरू हुआ. अनशन लंबा खिंचता गया. प्रशासन कुछ सुनने को तैयार नहीं था. जेल के बाहर सड़कों पर जनता का गुस्सा उबल रहा था. अखबार अनशनकारियों की बिगड़ती हालत की खबरें छाप रहे थे. कांग्रेस के बड़े नेता भी जेल में क्रांतिकारियों की बिगड़ती सेहत को लेकर फिक्रमंद थे.

पंडित मोतीलाल नेहरू ने सरकार की निंदा करते हुए कहा कि कैदियों ने भूख हड़ताल अपने लिए नहीं, एक व्यापक उद्देश्य के लिए की है. जवाहरलाल नेहरू ने जेल में भगत सिंह और साथियों से भेंट की. उन्होंने कहा कि इन नौजवानों ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी है और वे राजनीतिक कैदियों जैसा व्यवहार चाहते हैं. मुहम्मद अली जिन्ना ने भी 12 सितंबर 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में सरकार से तीखा सवाल किया आप इन लोगों पर मुकदमा चलाना चाहते हैं या उन्हें मौत के घाट उतारना चाहते हैं? लेकिन सरकार को परवाह नहीं थी.

सरकार ने भूख हड़ताल तोड़ने के लिए हर हथकंडे आजमाए.

जबरन खिलाने की कोशिश, फेफड़ों को हुआ नुकसान

सरकार ने भूख हड़ताल तोड़ने के लिए हर हथकंडे आजमाए. अनशनकारियों की बैरकों में खानेपीने की अच्छी चीजें रखी गईं. मटकों में पानी की जगह दूध भर दिया गया. फिर भी संकल्प नहीं टूटा तो बेहतर खाना और सहूलियतें देने के आश्वासन दिये गये. कुछ कैदियों ने जेल जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद भूख हड़ताल स्थगित कर दी. लेकिन जतीन्द्रनाथ, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और कई साथी अडिग रहे.

इस बीच जतीन्द्रनाथ की हालत गंभीर होती गई. सरकार ने उन्हें जमानत पर छोड़ने की पेशकश की. किसी ने जमानत भी जमा कर दी. लेकिन जतीन्द्रनाथ ने सशर्त रिहाई ठुकरा दी. उन्हें जबरन कुछ खिलाने की कोशिशें हुईं. नाक में नली डालकर भोजन कराने का प्रयास किया गया. उन्होंने प्रतिरोध किया. इस जबरदस्ती में उनके फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा. हालत और बिगड़ गई.

वो काली दोपहर

भगत सिंह उनकी हालत को लेकर बेहद चिंतित थे. उनके कहने पर जतीन्द्रनाथ एनीमा के लिए राजी हुए. जेलर से उनका जवाब था भगत सिंह की बात कौन काट सकता है? लेकिन अनशन के सवाल पर वे अटल रहे. 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ के अनशन का 63वां दिन था. दोपहर के करीब एक बजे. लेकिन उस दोपहर के सिर चढ़े सूरज पर जैसे काले बादलों ने पहरा बिठा दिया. असमय सूरज डूब गया. जतीन्द्रनाथ की सांसों की डोर टूट गई. अजेय संकल्पों के धनी जतीन्द्रनाथ ने मातृभूमि के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया. जतीन्द्रनाथ की कुर्बानी ने भगत सिंह को रुला दिया. मौत से न घबराने वाले दूसरे क्रांतिकारी साथी भी रो पड़े . जेल के बाहर खबर लगते ही हर कदम जेल की ओर था. लगभग 25 वर्ष की छोटीसी जिंदगी में जतीन्द्र ने शरीर के रक्त की हर बूंद की आजादी की लड़ाई के यज्ञकुंड में आहुति दे दी थी.

सुभाष ने जतीन को बताया दधीचि

जतीन्द्रनाथ के बलिदान की खबर ने देश में गुस्से की ज्वाला भड़का दी. लाड़ले सपूत को गंवाने का लोगों को गम था. लेकिन उनकी शहादत पर गर्व भी था. अपनी छोटी मगर सदियों तक याद की जाने वाली जिंदगी के लिए जतीन्द्रनाथ ने कांटों भरी राह चुनी थी. देश को आजाद कराने के लिए. गुलामी की जिल्लत से छुट्टी दिलाने के लिए. देशवासियों की जिंदगी आसान और खुशगवार बनाने के लिए ही तो उन्होंने मौत को गले लगाया था. उन्हें गुलाब के फूलों से बहुत लगाव था. उनके आखिरी सफर में उन्हीं गुलाबों की बरसती पंखुड़ियों ने उन्हें और रास्ते को ढंक लिया था.

लाहौर जेल से शुरू हुई जतीन्द्रनाथ की अंतिम यात्रा में भीड़ बढ़ती ही गई. अनारकली से रेलवे स्टेशन तक सड़कों के दोनों किनारे और मकानों के छज्जों पर मौजूद लोग अमर शहीद की आखिरी झलक पाने को उमड़ पड़े. खुले वाहन में चल रही यात्रा पर फूल बरसते रहे. रास्ते में लोग श्रद्धा से सिक्के भी चढ़ाते रहे. जिसे ताबीज बना लोगों ने बच्चों की बाहों में बांधा.

हावड़ा के रास्ते तक ट्रेन जहांजहां रुकी, भीड़ उमड़ती गई. दिल्ली में भारी जनसमूह था. कानपुर में पंडित जवाहरलाल नेहरू और गणेश शंकर विद्यार्थी मौजूद थे. इलाहाबाद में कमला नेहरू थीं. हावड़ा स्टेशन पर सुभाष चंद्र बोस और देशबंधु चित्तरंजन दास की पत्नी बासंती देवी सहित अनेक नेता मौजूद थे.सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें अपने समय का दधीचि कहा. बटुकेश्वर दत्त की बहन प्रमिला देवी की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे.

जतीन के लिए उमड़ा जनसैलाब

कलकत्ता पहुंचतेपहुंचते यह अंतिम यात्रा जनसैलाब बन चुकी थी. कितने लोग थे? लाखों थे. सच्चाई यह थी कि शहर जैसे ठहर गया था. हर कदम उस यात्रा के साथ था. हर नजर उस पार्थिव शरीर पर. हर हाथ श्रद्धा में जुड़ा था या फूल बरसा रहा था. वायसराय ने लंदन के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को तार भेजकर कलकत्ता के जुलूस को अभूतपूर्व बताया था. सरकार को इस भीड़ में सिर्फ शोक नहीं, अपने खिलाफ उमड़ती राजनीतिक चेतना का संदेश सुनाई पड़ रहा था. इसने अंग्रेजी हुकूमत को भीतर तक हिला दिया.

जतीन्द्रनाथ की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार किसी संकीर्ण जातीय पहचान के बीच न हो. वे स्वयं को सिर्फ हिंदुस्तानी मानते थे. उनकी इस भावना का सम्मान हुआ. पूरा हिंदुस्तान उनके लिए रोया. घरों के चूल्हे नहीं जले. दुकानें और बाजार बंद रहे. सभाओं और प्रदर्शनों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुस्सा फूटा. गोपी चंद्र नारंग और मोहम्मद आलम ने पंजाब लेजिस्लेटिव काउंसिल की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. लेजिस्लेटिव असेम्बली में मोतीलाल नेहरू ने स्थगन प्रस्ताव रखा. सरकार पर अमानवीयता का आरोप लगा. निंदा प्रस्ताव के जरिए भी सरकार को राजनीतिक चुनौती मिली. जतीन्द्रनाथ दास की शहादत उस उफनते दौर की ऐसी मार्मिक घटना थी,जिसने देश को झकझोर दिया था. उनका 63 दिन का मौन अनशन ऐसा शोर छोड़ गया, जिसे अंग्रेजी हुकूमत चाहकर भी दबा नहीं सकी थी.

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