
किसी दूसरे देश में जाकर वहीं की संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं को अपनाना आसान नहीं होता। लेकिन जर्मनी की फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग ने भारत आकर अपनी जिंदगी की ऐसी राह चुनी, जो आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
महज 20 साल की उम्र में जर्मनी से भारत आईं फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग ने यहां की आध्यात्मिक परंपराओं और योग से प्रभावित होकर अपना जीवन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बाद में वह राधा कुंड से जुड़ीं और उन्हें सुदेवी माता जी के नाम से जाना जाने लगा।
20 साल की उम्र में पहुंचीं भारत
फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग वर्ष 1978 में जर्मनी के बर्लिन से भारत आई थीं। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी। भारत आने के बाद यहां की आध्यात्मिक परंपराओं और योग के प्रति उनकी रुचि लगातार बढ़ती गई।
इसी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने राधा कुंड में दीक्षा ली और धीरे-धीरे भारत को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया।
घायल बछड़े से शुरू हुई गायों की सेवा
बताया जाता है कि गायों की सेवा का सिलसिला एक घायल बछड़े की देखभाल से शुरू हुआ था। उन्होंने उस बछड़े के इलाज और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाई।
इसके बाद बेसहारा, बीमार और घायल गायों की संख्या बढ़ती गई और यह सेवा धीरे-धीरे एक बड़े अभियान में बदल गई।
उन्होंने राधा सुरभी गौशाला की स्थापना की, जहां लावारिस और बीमार गायों की देखभाल की जाती है।
आज 2500 से ज्यादा गायों की देखभाल
रिपोर्टों के अनुसार, राधा सुरभी गौशाला में अब 2500 से अधिक गायों की देखभाल की जा रही है। इनमें कई ऐसी गायें हैं जो बीमार, घायल या बेसहारा हालत में यहां पहुंचती हैं।
सुदेवी माता जी ने अपना जीवन इन गायों की सेवा और उनके उपचार के लिए समर्पित कर दिया है। उनकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा गौशाला में रहने वाली गायों की देखभाल में ही गुजरता है।
भारत सरकार ने पद्म श्री से किया सम्मानित
गायों और समाज के प्रति उनकी सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में सुदेवी माता जी को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया था।
उन्हें यह सम्मान सामाजिक कार्य की श्रेणी में दिया गया। जर्मनी में जन्म लेने के बावजूद भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर सेवा का रास्ता चुनने वाली उनकी कहानी आज भी लोगों का ध्यान खींचती है।
सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग की कहानी सिर्फ एक विदेशी महिला के भारत आने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से अलग करते हुए सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ाया।
20 साल की उम्र में भारत आने वाली यह महिला आज सुदेवी माता जी के नाम से जानी जाती हैं और हजारों बेसहारा गायों की देखभाल से जुड़ी उनकी यात्रा अपने आप में एक अलग मिसाल बन चुकी है।



