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​क्या ममता बनर्जी को वापस मिलेगा TMC का नाम और निशान, क्या कहता है नियम?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. असल में भारत निर्वाचन आयोग ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी है. यह रोक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दूसरे गुट, दोनों पर लागू है. इलेक्शन कमीशन ने ममता बनर्जी की पार्टी को ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस दिया नाम और चुनाव चिन्ह फुटबाल प्लेयर. वहीं, ऋतुव्रत बनर्जी गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम मिला और चुनाव चिन्ह लिफाफा दिया गया.

​क्या ममता बनर्जी को वापस मिलेगा TMC का नाम और निशान, क्या कहता है नियम?

इस फैसले के बाद बड़ा सवाल उठ रहा है. क्या ममता बनर्जी की पार्टी का नाम हमेशा के लिए बदल जाएगा? क्या टीएमसी का लोकप्रिय चुनाव चिह्न जोड़ा फूल अब उसके पास नहीं रहेगा? तथ्य यह है कि चुनाव आयोग का ताजा फैसला फिलहाल अंतरिम है. इसका उद्देश्य आगामी विधानसभा उपचुनावों के दौरान दोनों गुटों को एक ही नाम और चिह्न का इस्तेमाल करने से रोकना है. पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला भारत निर्वाचन आयोग बाद में करेगा.आइए, आयोग के ताजे फैसले के बहाने समझते हैं कि क्या ममता बनर्जी की टीएमसी का नाम और निशान बदल जाएगा? इस सिलसिले में क्या कहता है नियम और क्या है असली विवाद?

चुनाव आयोग ने क्या फैसला दिया है?

चुनाव आयोग ने कहा है कि फिलहाल दोनों गुट ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इसी तरह दोनों गुट आरक्षित चुनाव चिह्न का भी इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. आयोग ने दोनों पक्षों से अपने लिए नए नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प देने को कहा है. दोनों गुटों को तीनतीन नाम सुझाने हैं. इसके अलावा उन्हें तीनतीन मुक्त चुनाव चिह्न भी बताने हैं. इन विकल्पों में से आयोग किसी एक नाम और चिह्न को मंजूरी दे सकता है. यह व्यवस्था पश्चिम बंगाल की आगामी विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए लागू होगी.

ममता और ऋतब्रत.

क्या टीएमसी का नाम स्थायी रूप से बदल गया है?

अभी ममता बनर्जी की पार्टी का स्थायी नाम नहीं बदला है. चुनाव आयोग ने केवल चुनावी प्रक्रिया को लेकर अस्थायी व्यवस्था बनाई है. आयोग के सामने यह विवाद है कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन सा गुट है. एक पक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व में है. दूसरा पक्ष अरूप रॉय और ऋतब्रत बनर्जी से जुड़े नेताओं के नेतृत्व में होने का दावा कर रहा है. जब तक आयोग इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं करता, तब तक किसी एक गुट को मूल नाम और चिह्न देने से दूसरा पक्ष असहमत हो सकता है. इसलिए आयोग ने दोनों को फिलहाल अलग नाम और अलग चिह्न के साथ चुनाव लड़ने की व्यवस्था की है. अंतिम सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग यह तय करेगा कि पार्टी का नाम और चिह्न किस गुट को मिलेगा. यह भी संभव है कि आयोग दोनों गुटों के दावों, संगठनात्मक समर्थन और पार्टी के नियमों की अलगअलग जांच करे.

विवाद की शुरुआत क्यों और कैसे हुई?

विवाद की मुख्य वजह पार्टी के संगठन और राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता को लेकर है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो गया था. इस गुट के अनुसार, उसके बाद पुरानी कार्यसमिति को बड़े संगठनात्मक फैसले लेने का अधिकार नहीं था. इस पक्ष ने यह भी दावा किया कि 22 जून 2026 को एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया था. इस अधिवेशन में अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष चुना गया. ममता बनर्जी के गुट ने इन दावों को खारिज किया है. इस गुट का कहना है कि विरोधी पक्ष की बैठक पार्टी के संविधान के अनुसार नहीं हुई. ममता गुट ने ऐसे अधिवेशन और उसमें लिए गए फैसलों को असंवैधानिक बताया है. ममता गुट के अनुसार, पार्टी का संविधान चुनाव आयोग के पास जमा है. उसमें पदाधिकारियों का कार्यकाल पांच वर्ष बताया गया है. इस आधार पर ममता गुट का कहना है कि 2022 में हुए संगठनात्मक चुनाव के बाद कार्यकाल 2027 तक चलना चाहिए.

ममता बनर्जी

चुनाव चिह्न को लेकर क्या नियम है?

राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग चुनाव चिह्न आरक्षण और आवंटन आदेश, 1968 के तहत कार्रवाई करता है. इस आदेश का पैरा 15 उन स्थितियों से जुड़ा है, जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन या संगठनात्मक विवाद हो जाता है. ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग यह तय कर सकता है कि पार्टी का नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न किस गुट को दिया जाए. आयोग आमतौर पर कई बातों पर विचार करता है. इनमें पार्टी की संगठनात्मक इकाइयों का समर्थन, निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन, पार्टी संविधान का पालन और संगठनात्मक चुनावों की वैधता शामिल हो सकती है.

आयोग यह भी देख सकता है कि कौन सा पक्ष पार्टी की मूल संरचना और नियमों का पालन कर रहा है. अगर विवाद का फैसला तुरंत करना संभव न हो और चुनाव नजदीक हों, तो आयोग अंतरिम व्यवस्था बना सकता है. इस व्यवस्था में मूल नाम और चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज किया जा सकता है. दोनों पक्षों को अलग नाम और मुक्त चुनाव चिह्न दिए जा सकते हैं.

फ्रीज होने का मतलब क्या है?

फ्रीज होने का अर्थ यह नहीं है कि पार्टी का नाम और चिह्न हमेशा के लिए खत्म हो गया है. इसका मतलब है कि विवाद के अंतिम निपटारे तक दोनों गुट उस नाम और चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. चुनाव आयोग ने इस कदम से दोनों पक्षों को बराबर स्थिति में रखने की कोशिश की है. यदि किसी एक गुट को तुरंत मूल नाम और चिह्न दे दिया जाता, तो दूसरा गुट इसे पक्षपात मान सकता था. साथ ही मतदाताओं के बीच भ्रम भी पैदा हो सकता था. अंतरिम रोक का उद्देश्य यह साफ करना है कि उपचुनाव में किस गुट के उम्मीदवार किस नाम और चिह्न पर चुनाव लड़ रहे हैं.

ममता गुट ने जताई है आपत्ति

ममता बनर्जी के गुट ने आयोग के फैसले पर आपत्ति जताई है. इस गुट का कहना है कि ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और प्रमुख नेता हैं. पार्टी की स्थापना और विस्तार में उनकी केंद्रीय भूमिका रही है. ममता गुट का तर्क है कि कोई नया गुट अचानक पार्टी के संगठन और चुनाव चिह्न पर दावा नहीं कर सकता. उसके अनुसार, पार्टी का संविधान और संगठनात्मक प्रक्रिया बूथ स्तर से शुरू होती है. ममता गुट ने विरोधी पक्ष के दस्तावेजों और बैठक की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं. उसका कहना है कि आयोग को किसी अंतरिम रोक के बजाय पूरे मामले पर विस्तृत जांच के बाद फैसला करना चाहिए.

दूसरे गुट का के तर्क क्या हैं?

दूसरा गुट खुद को असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधि बता रहा है. उसका दावा है कि पार्टी के संगठन में बदलाव नियमों के अनुसार हुआ है. इस गुट ने आयोग के सामने अपने दस्तावेज पेश किए हैं. उसका कहना है कि पार्टी की कार्यसमिति का कार्यकाल खत्म हो चुका था. इसलिए नई कार्यसमिति और नए पदाधिकारियों का चयन जरूरी था. यह गुट आयोग की प्रक्रिया में भरोसा जताने की बात कह रहा है. उसका कहना है कि अंतिम निर्णय चुनाव आयोग के नियमों और दस्तावेजों के आधार पर होना चाहिए.

चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

आगामी उपचुनावों में मतदाताओं को दोनों गुट अलग नाम और अलग चुनाव चिह्न के साथ दिखाई देंगे. इससे चुनाव प्रचार में बड़ा बदलाव आएगा. जोड़ा फूल चिह्न टीएमसी की पहचान रहा है. लंबे समय से मतदाता इस चिह्न को ममता बनर्जी की राजनीति से जोड़ते रहे हैं. ऐसे में नए चिह्न के साथ चुनाव लड़ना किसी भी गुट के लिए आसान नहीं होगा. उम्मीदवारों को मतदाताओं तक यह जानकारी पहुंचानी होगी कि उनका नया नाम और चिह्न क्या है. प्रचार सामग्री, पोस्टर, बैनर और सोशल मीडिया संदेशों में भी बदलाव करना पड़ेगा. मतदाताओं के बीच भ्रम रोकने के लिए चुनाव अधिकारियों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी. उन्हें मतदान केंद्रों पर नाम और चिह्न से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध करानी होगी.

आगे क्या संभावनाएं हैं?

अब दोनों गुट चुनाव आयोग को अपने नाम और चिह्न के विकल्प देंगे. आयोग उपलब्ध विकल्पों की जांच करेगा. इसके बाद उपचुनाव के लिए दोनों पक्षों को अलग पहचान दी जाएगी. इसके साथ ही मूल विवाद पर सुनवाई जारी रह सकती है. आयोग पार्टी के संविधान, संगठनात्मक चुनाव, राष्ट्रीय कार्यसमिति और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन से जुड़े दस्तावेजों की जांच करेगा. अंतिम फैसले में आयोग किसी एक गुट को मूल नाम और चिह्न दे सकता है. आयोग दोनों गुटों के दावों को खारिज कर कोई अलग व्यवस्था भी कर सकता है. इस बारे में अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है.

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