दुनियाभर में ड्रोन के हमले के खतरे बढ़ रहे हैं. इस बीच भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने ऐसा हथियार विकसित किया है जो गोली या मिसाइल नहीं, बल्कि लेजर की ताकत से दुश्मन के ड्रोन को गिराएगा. डीआरडीओ का 30 किलोवाट क्षमता वाला डायरेक्टेडएनर्जी वेपन बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है.

अगले 6 महीने के अंदर DRDO इसका प्रोडक्शन शुरू करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर चुन लेगा. इसकी प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी.अब सवाल है कि क्या होता है डायरेक्टेडएनर्जी वेपन, यह कैसे काम करता है, इसके सामने कितनी चुनौतियां होंगी और क्यों खास है यह तकनीक?
क्या है डायरेक्टेडएनर्जी वेपन?
आसान भाषा में समझें तो डायरेक्टेडएनर्जी वेपन एक तरह का लेजर हथियार है. ये ऐसा हथियार है जो लेजर या माइक्रोवेव जैसी एनर्जी से अपने टार्गेट को निष्क्रिय कर देता है. इनमें दूसरे हथियारों की तरह बारूद या मिसाइल नहीं लगती. एनर्जी की किरण लक्ष्य पर तब तक टिकाई जाती है जब तक वह गर्म होकर तबाह न हो जाए. इसीलिए हर वार की लागत बेहद कम मानी जाती है और गोलाबारूद खत्म होने की चिंता भी नहीं रहती.
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन.
30 kW सिस्टम कितना ताकतवर?
मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस खास तरह के सिस्टम को ड्रोन झुंड, फिक्स्डविंग यानी हवाई जहाज जैसे दिखने वाले ड्रोन और निगरानी सेंसरों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है. यह करीब 5 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य पर वार कर सकती है. यह ढांचों को नुकसान पहुंचाने के साथसाथ इलेक्ट्रॉनिक सेंसरों को भी निष्क्रिय कर सकती है, जो आधुनिक युद्ध में दुश्मन की आंख का काम करते हैं. इसे थोड़ा ऊंचाई पर लगाया जाता है यानी जरूरत पड़ने पर इसे अलगअलग जगहों पर तैनात किया जा सकता है.
कुरनूल में हुआ प्रदर्शन
रिपोर्ट के मुताबिक MkII लेजर DEW सिस्टम का प्रदर्शन 13 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित नेशनल ओपन एयर रेंज में किया गया था. टेस्टिंग में इसने लंबी दूरी से फिक्स्डविंग ड्रोन को निशाना बनाया. एक साथ कई ड्रोनों के हमले को नाकाम किया और निगरानी सेंसर व एंटीना को नष्ट किया. इस 30 kW प्रणाली के अंतिम ट्रायल अगस्त 2025 में पूरे हो गए.
ऐसे करता है काम
DRDO is set to begin selecting an industry partner within the next 06 months for its 30kWclass Directed Energy Weapon, moving the indigenous laser weapon closer to its FOPM.
pic.twitter.com/IRTYgBdHZ3
— Defence Core September 21, 2026
उद्योग को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर
अब इसके उत्पादन की तैयारी है. 30 kW वेरिएंट की तकनीक को भारतीय उद्योग साझेदारों को हस्तांतरित करने की मंजूरी मिल चुकी है, ताकि इसका देश में ही उत्पादन और तैनाती हो सके. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि DRDO सितंबर 2026 से छह महीने के अंदर प्रोडक्शन के लिए उद्योग साझेदार चुनने की प्रक्रिया शुरू करने वाला है. यह कदम भारत सरकार के उस आत्मनिर्भर अभियान से जुड़ा है जिसमें डिफेंस इक्विपमेंट का डिजाइन, विकास और निर्माण देश के भीतर करने पर जोर है.
ड्रोन खतरे के बीच क्यों अहम है यह तकनीक
पिछले कुछ सालों में दुनियाभर सस्ते ड्रोन बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं. कम कीमत के ड्रोन को गिराने के लिए महंगी मिसाइल दागना तंगी के हालात पैदा करता है. ऐसे में लेजर हथियार को एक किफायती और तेज जवाब माना जाता है, क्योंकि वह रोशनी की स्पीड से टार्गेट तक पहुंचता है और बारबार इस्तेमाल किया जा सकता है.
चुनौतियां भी कम नहीं
लेजर हथियार भले ही पावरफुल होते हैं, लेकिन इनको लेकर कुछ चुनौतियां भी होती हैं. जैसे धूल, बारिश, धुंध और बादल लेजर किरण की ताकत घटा सकते हैं. इनके संचालन के लिए भरोसेमंद बिजली आपूर्ति और इन्हें ठंडा करने वाला सिस्टम चाहिए. किसी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किरण को कुछ समय तक उसी जगह टिकाए रखना भी पड़ता है. सेना में शामिल होने के बाद इन पहलुओं पर असली कसौटी होगी.



