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​‘UP को बांटेंगे’ से लेकर पश्चिम में HC बेंच तक… क्या विधानसभा चुनाव में ये बनेगा बड़ा मुद्दा?

‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता इन दिनों उत्तर प्रदेश को बांटने की बात कर रहे हैं. बीजेपी के सहयोगी दल सुभासपा ने अलग पूर्वांचल की बात की तो बीजेपी नेता मुजफ्फरनगर के पूर्व सांसद संजीव बालियान अलग पश्चिम यूपी की मांग कर रहे हैं. इस बीच पश्चिम में हाई कोर्ट बेंच का मुद्दा भी बड़ा होता जा रहा है.

​‘UP को बांटेंगे’ से लेकर पश्चिम में HC बेंच तक… क्या विधानसभा चुनाव में ये बनेगा बड़ा मुद्दा?

पिछले कई दशकों से गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर तक के वकील समयसमय पर प्रदर्शन करते रहे हैं. यूपी चुनाव से पहले यह मुद्दा इसलिए भी बड़ा हो रहा है, क्योंकि वकील जानते हैं कि जिस तरह जेनजी ने अपनी बात मनवा ली, उसी तरह हमारे पास भी मौका है.

23 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्य से विरत रहने का ऐलान किया था. मेरठ में तो पीठ नहीं तो वोट नहीं जैसे नारे भी सामने आए हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की सियासत में विकास और जाति के साथ अब क्षेत्र भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनने जा रहा है?

पूर्वांचल से नई बहस शुरू

ओमप्रकाश राजभर ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की बात करके सियासी बहस को गरमा दिया है. राजभर का कहना है कि उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा राज्य है और प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे अलगअलग राज्यों में बांटा जाना चाहिए. उन्होंने पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग दोहराते हुए यह भी कहा कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो राजभर समाज का व्यक्ति वहां मुख्यमंत्री बन सकता है. हालांकि, सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने राजभर की मांग को अव्यावहारिक और विभाजनकारी बताया है.

राजभर के बयान के बाद बालियान का समर्थन

मंत्री ओम प्रकाश राजभर के बयान के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई. भाजपा के पूर्व सांसद संजीव बालियान ने उत्तर प्रदेश के विभाजन के विचार का समर्थन किया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की जरूरत बताई. बालियान का तर्क है कि अगर उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटा जाता है तो प्रशासन लोगों के ज्यादा करीब पहुंचेगा. उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के सामने मौजूद दूरी और सुविधाओं से जुड़े सवालों का भी जिक्र किया. यानी राजभर ने पूर्वांचल की बात की… तो बालियान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की.

यूपी के चार टुकड़ों की कहानी आज की नहीं

उत्तर प्रदेश को अलगअलग राज्यों में बांटने की मांग कोई नई राजनीतिक मांग नहीं है. संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी किताब थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ में यूपी को चार हिस्सों में बांटने की बात कही थी. इसके बाद पूर्वांचल की पिछड़ेपन की समस्या को लेकर 1962 में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने लोकसभा में मुद्दा उठाया था. तत्कालीन केंद्र सरकार के स्तर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर अध्ययन की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

नेहरू अभिलेखागार में 14 जून 1962 के एक दस्तावेज में गहमरी के गाजीपुर, बलिया और आजमगढ़ की आर्थिक स्थिति से जुड़े लोकसभा भाषण का जिक्र मिलता है. इसके बाद दशकों तक पूर्वांचल के विकास और अलग राज्य की मांग अलगअलग राजनीतिक मंचों पर उठती रही. 1970 और 1980 के दशक में कई पूर्वांचली नेताओं ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया. 2000 के दशक में चौधरी अजित सिंह ने अलग हरित प्रदेश बनाने की मांग की थी, जिसमें पश्चिमी यूपी के कई जिले शामिल थे.

2011 में मायावती ने सामने रखा था चार राज्यों का नक्शा

उत्तर प्रदेश के विभाजन की बहस को सबसे बड़ा राजनीतिक आकार 2011 में मिला. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित कराया. प्रस्ताव में चार राज्य बनाने की बात थी पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, बुंदेलखंड और अवध प्रदेश. विधानसभा से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे केंद्र सरकार को भेजा गया था, लेकिन यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और उत्तर प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ.

क्या सिर्फ विकास के लिए अलग राज्य?

अलग राज्य की मांग करने वालों का सबसे बड़ा तर्क होता है कि छोटा राज्य = बेहतर प्रशासन. समर्थकों का कहना है कि बहुत बड़ा भौगोलिक क्षेत्र होने के कारण लखनऊ से दूर के इलाकों तक प्रशासनिक पहुंच और सरकारी योजनाओं की निगरानी में कठिनाई होती है. पूर्वांचल के समर्थक क्षेत्र के पिछड़ेपन और रोजगार के सवाल उठाते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य की मांग करने वाले क्षेत्र की आर्थिक ताकत, कृषि, उद्योग और राजस्व योगदान का हवाला देते हैं.

हालांकि, विरोध करने वालों का तर्क अलग है. उनका कहना है कि राज्य को बांटने से अपने आप विकास की गारंटी नहीं मिलती. सवाल प्रशासनिक ढांचे, वित्तीय संसाधनों, राजधानी, सीमाओं, परिसंपत्तियों और जल संसाधनों के बंटवारे का भी है, इसलिए उत्तर प्रदेश का विभाजन केवल राजनीतिक नारा नहीं है. यह एक बड़ा प्रशासनिक, आर्थिक और संवैधानिक सवाल है. समाजवादी पार्टी हर बार यूपी के बंटवारे का पुरजोर विरोध करती रही है.

पश्चिमी यूपी में दूसरी लड़ाई हाई कोर्ट की पीठ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायालय की पीठ की मांग 1950 के दशक से चली आ रही है. केंद्रीय संघर्ष समिति का गठन 1981 में हुआ और इसके बाद आंदोलन कई बार तेज हुआ. 1981 में केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जसवंत सिंह की अध्यक्षता में आयोग बनाया था. आयोग ने 1985 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थायी पीठ की स्थापना की सिफारिश की थी, लेकिन दशकों बाद भी मांग पूरी नहीं हुई.

सात दशक पुराना आंदोलन

1951/1955 — पश्चिमी यूपी में पीठ की मांग उठी
1981 — केंद्रीय संघर्ष समिति का गठन
1981 — केंद्र ने जसवंत सिंह आयोग बनाया
1985 — आयोग की रिपोर्ट
1987 — जेल भरो आंदोलन
2001 — लंबे समय तक न्यायिक कार्य से विरत
2009 — आंदोलन फिर तेज
2015 — करीब तीन महीने काम बंद
202526 — आंदोलन फिर व्यापक

इस मांग में पेच कहां है?

यहां एक अहम संवैधानिक और प्रशासनिक पेच है. केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में राज्यसभा में बताया कि उच्च न्यायालय की पीठ की स्थापना के लिए जसवंत सिंह आयोग की सिफारिशों और उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद राज्य सरकार का पूरा प्रस्ताव जरूरी है. इस प्रस्ताव में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति और राज्यपाल की सहमति भी शामिल होती है. केंद्र सरकार के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायालय की पीठ स्थापित करने के लिए कोई पूर्ण प्रस्ताव इस समय केंद्र सरकार के पास लंबित नहीं है.

योगी से मुलाकात के बाद क्यों भड़के वकील?

21 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. वकीलों के मुताबिक, उन्हें पीठ की स्थापना को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला. मुख्यमंत्री की ओर से यह कहा गया कि यह मामला राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं है और इसमें उच्चतम न्यायालय तथा संवैधानिक प्रक्रिया भी जुड़ी है. इसके बाद मेरठ बार एसोसिएशन ने आंदोलन तेज करने का फैसला किया. 23 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में वकीलों ने न्यायिक कार्य से विरत रहने का फैसला किया. मेरठ में भाजपा के सांसदों और विधायकों के प्रवेश पर रोक लगाने तथा उनके मामलों में पैरवी नहीं करने जैसे फैसले भी सामने आए.

जेनजी आंदोलन से वकीलों ने क्या सबक लिया?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकीलों ने जेनजी आंदोलन से बहुत सबक लिया है. अब उन्हें लगता है कि यदि कोई वर्ग लंबे समय तक लगातार अपनी मांग उठाता रहे और दबाव बनाए तो राजनीतिक दलों को उस मांग पर जवाब देना पड़ता है. इसीलिए अब आंदोलन में सिर्फ पीठ चाहिए का सवाल नहीं है. बल्कि यह संदेश भी दिया जा रहा है कि अगर हमारी मांग नहीं सुनी गई तो चुनाव में जवाब दिया जाएगा.

2027 का चुनाव जैसेजैसे करीब आएगा, देखना होगा कि ये मुद्दे सिर्फ नेताओं के बयानों तक सीमित रहते हैं या जमीन पर क्षेत्रीय आंदोलनों और मतदाताओं के सवालों में बदलते हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश की सियासत में अब सिर्फ यह सवाल नहीं है कि कौन सरकार बनाएगा. सवाल यह भी है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति किस दिशा में बंटेगी… जाति के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर या मुद्दों के आधार पर?

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