उत्तर प्रदेश की सरकार का चुनावी सिंबल बन चुका बुलडोजर… अब मेरठ में मुसीबत बन गया है. दरअसल, मेरठ के सेंट्रल मार्केट का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के 21 सितंबर के आदेश के बाद मेरठ के जोनए में चिन्हित 16 हजार 726 अनधिकृत संपत्तियों पर कार्रवाई का दायरा खुल गया है. इन भवनों को मानचित्र के विपरीत निर्मित बताए जाने के बाद शासन ने मेडा सचिव अर्पित गुप्ता को पद से हटा दिया है.

दरअसल, मेरठ का सेंट्रल मार्केट… एक ऐसा बाजार, जिसका विवाद करीब तीन दशक से ज्यादा पुराना है. शुरुआत एक आवासीय भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण से हुई. मामला हाईकोर्ट पहुंचा… फिर सुप्रीम कोर्ट तक गया और अब यह विवाद सिर्फ एक बाजार या कुछ दुकानों तक सीमित नहीं है. 2027 का विधानसभा चुनाव करीब है और जिनकी दुकान को बुलडोजर से जमींदोज किया जा रहा है, उसमें से अधिकतर बीजेपी के वोटर माने जाते हैं. ये मेरठ की दक्षिण विधानसभा लगती है. जहां से मंत्री सोमेंद्र तोमर विधायक हैं. अब चुनाव से पहले भाजपा को अपनी सीटों के नुकसान का डर सता रहा है, जिसमें दक्षिण और कैंट विधानसभा शामिल है.
सेंट्रल मार्केट विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट विवाद की सबसे अहम कड़ी भूखंड संख्या 661/6 है. न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक यह भूखंड 1986 में आवंटित हुआ था और इसके उपयोग की शर्त आवासीय थी. बाद में इस भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण शुरू हुआ. 19 सितंबर 1990 को आवास विकास परिषद की तरफ से निर्माण को लेकर नोटिस जारी किया गया. यहीं से वह कानूनी विवाद शुरू हुआ. 2011 में संबंधित प्राधिकरण ने अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश दिया. इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा.
2014 में हाईकोर्ट ने 661/6 पर बने अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश दिया, लेकिन व्यापारी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और वहां से उन्हें अंतरिम राहत मिल गई. इसके बाद 17 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने 661/6 पर हुए अनधिकृत व्यावसायिक निर्माण को लेकर हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि अनधिकृत निर्माणों के साथ समान तरीके से कार्रवाई की जानी चाहिए.
इसके साथ ही अदालत के सामने मेरठ में इसी तरह के दूसरे निर्माणों का मुद्दा भी आया. यानी मामला एक भूखंड से निकलकर पूरे इलाके में आवासीय भूखंडों के व्यावसायिक इस्तेमाल तक पहुंचने लगा. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 661/6 परिसर में बनी तीन मंजिला व्यावसायिक इमारत पर 25 और 26 अक्टूबर 2025 को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. फिर आवास विकास परिषद के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई.
44 संपत्तियों से हजारों संपत्तियों तक पहुंचा मामला
अक्टूबर 2025 में 45 अधिकारियों और कई व्यापारियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए. इन मामलों में अधिकारियों पर अपने कार्यकाल के दौरान अनधिकृत निर्माण से जुड़े नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए गए. 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर और सख्ती दिखाई. अप्रैल में शास्त्रीनगर योजना7 की 44 संपत्तियों को सील करने का आदेश दिया गया. इनमें सिर्फ दुकानें ही नहीं थीं. रिपोर्टों के मुताबिक छह स्कूल, छह अस्पताल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी कार्रवाई की जद में थे. सितंबर में इन संपत्तियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई.
16 सितंबर को प्रशासन और आवास विकास परिषद की टीम ने कार्रवाई शुरू की और छह भवनों के अवैध हिस्सों पर बुलडोजर चलाया गया, लेकिन 21 सितंबर को मामला और बड़ा हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण की तरफ से चिन्हित 16,726 अनधिकृत संपत्तियों को तत्काल सील करने का निर्देश दिया. साथ ही दूसरे क्षेत्रों में भी आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियों और अनधिकृत निर्माण की पहचान कर रिपोर्ट देने को कहा गया.
अगली सुनवाई 9 दिसंबर 2026 को होनी है. सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है कि लंबे समय से किसी निर्माण के बने रहने या वहां कारोबार चलते रहने मात्र से उसका अनधिकृत होना खत्म नहीं हो जाता, लेकिन दूसरी तरफ उन लोगों की समस्या भी बड़ी है, जिन्होंने वर्षों पहले संपत्तियां खरीदीं, कारोबार शुरू किया और अब उनके सामने दुकान, रोजगार और निवेश बचाने का सवाल खड़ा है. इससे लाखों लोग प्रभावित होंगे और इसका असर स्थानीय राजनीति पर पड़ेगा.
कार्रवाई के बाद प्रभावित व्यापारियों के बीच नाराजगी की चर्चा तेज हुई. व्यापारियों की ओर से लंबे समय से यह उम्मीद जताई जाती रही कि सरकार या स्थानीय जनप्रतिनिधि कोई वैकल्पिक रास्ता निकालेंग, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई आगे बढ़ गई. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले भाजपा के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रभावित व्यापारियों के पुनर्वास की योजना सामने रखी है.
23 सितंबर को मेरठ में भाजपा के स्थानीय नेताओं ने प्रेस वार्ता की. इसमें सांसद अरुण गोविल, राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर, महानगर अध्यक्ष विवेक रस्तोगी, महापौर हरिकांत अहलूवालिया और विधायक अमित अग्रवाल समेत अन्य नेता मौजूद रहे. भाजपा नेताओं ने कहा कि प्रभावित व्यापारियों के लिए वैकल्पिक स्थान तलाशे जा रहे हैं. सरकारी जमीन पर दुकानें या व्यावसायिक परिसर उपलब्ध कराने और प्रभावित व्यापारियों को कम किराए पर पट्टे पर दुकानें देने की योजना पर काम करने की बात कही गई.
रिपोर्टों के मुताबिक करीब 650 प्रभावित व्यापारियों के पुनर्वास की बात सामने आई है. राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर की तरफ से कहा गया है कि पुनर्वास की प्रक्रिया में लगभग छह महीने लग सकते हैं. यानी सितंबर 2026 से गणना करें तो समयसीमा लगभग मार्च 2027 के आसपास जाती है, लेकिन यहीं सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है… क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां उसी दौरान निर्णायक दौर में पहुंच जाएंगी. फिलहाल मेरठ शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की विधान परिषद चुनाव प्रक्रिया में आचार संहिता लागू होने के कारण पुनर्वास योजना पर बड़ा ऐलान न हुआ.
भाजपा के सामने असली चुनौती क्या है?
कार्यवाही का दायरा जैसेजैसे बढ़ता जा रहा है, वैसेवैसे बीजेपी की मुसीबत भी बढ़ती जा रही है. अब 16,726 संपत्तियों की सीलिंग का आदेश सामने आने के बाद मामला केवल बाजार के व्यापारियों तक सीमित नहीं है. अगर दूसरे इलाकों में भी आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर कार्रवाई बढ़ती है, तो प्रभावित लोगों का दायरा और बड़ा हो सकता है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है.
सरकार के लिए दोहरी चुनौती
सरकार के सामने दो बड़ी चुनौती है. पहली सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह पालन करना और दूसरी प्रभावित लोगों के लिए ऐसा पुनर्वास मॉडल तैयार करना, जो कानूनी आदेश से टकराए बिना उनके कारोबार और आजीविका के लिए वैकल्पिक व्यवस्था दे सके. भाजपा के स्थानीय नेताओं ने फिलहाल इसी रास्ते का भरोसा दिया है, लेकिन व्यापारी और प्रभावित लोग अब घोषणा से आगे की कार्रवाई देखना चाहेंगे. कहां जमीन मिलेगी? कितनी दुकानें बनेंगी? किसे दुकान मिलेगी? किराया कितना होगा? पट्टा कितने साल का होगा? आवंटन की प्रक्रिया क्या होगी? और सबसे अहम क्या छह महीने की समयसीमा में यह पूरा हो पाएगा?



