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​‘आधा गांव’ में राही रजा और जिलियन राइट की कहानी, गंगौली से दुनिया तक पहुंची साझा भारतीयता

​‘आधा गांव’ में राही रजा और जिलियन राइट की कहानी, गंगौली से दुनिया तक पहुंची साझा भारतीयता

राही मासूम रजा का जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है। एक सितंबर से औपचारिक रूप से आरंभ हुई यह शताब्दी केवल एक लेखक की याद मनाने का अवसर नहीं, बल्कि उस साहित्यिक विरासत को फिर से पढ़ने का मौका है, जिसने भारतीय समाज की जटिलताओं को सबसे ईमानदार और जीवंत तरीके से सामने रखा। उनका उपन्यास ‘आधा गांव’ जब पहली बार पाठकों के सामने आया, तो उसने हिंदुस्तानी कथासाहित्य में एक नई जमीन तैयार की। आज भी यह कृति उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने प्रकाशन के समय थी।

‘आधा गांव’ 1966 में प्रकाशित हुआ। राही ने इसे मूल रूप से उर्दू में लिखा था, लेकिन इसका पहला प्रकाशन नागरी लिपि में ही हुआ। उपन्यास का केंद्र गाजीपुर जिले का गंगौली गांव हैवही गांव, जहां राही का अपना बचपन बीता था। यह अर्धआत्मकथात्मक रचना लगभग 1934 से 1950 के दशक के आरंभ तक के कालखंड को समेटती है। गांव दो भागों में बंटा हैउत्तर पट्टी और दक्खिन पट्टी। दोनों ओर शिया सैयद जमींदार परिवार रहते हैं। उनके बीच पुरानी रंजिशें, मुकदमे और प्रतिस्पर्धाएं लगातार चलती रहती हैं। मुहर्रम का आयोजन, ताजिया, मातम और परिवारों के आपसी संबंध उपन्यास की धड़कन हैं।

जिलियन राइट का योगदान इस कृति को दुनियाभर में पहुंचाने में उल्लेखनीय है। ब्रिटेन से जुड़ी राइट पिछले लगभग आधी शताब्दी से दिल्ली में रह रही हैं। उन्होंने राही मासूम रजा के ‘आधा गांव’ और श्रीलाल शुक्ला के ‘राग दरबारी’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि ‘आधा गांव’ के माहौल और भाषा को बेहतर समझने के लिए वे राही साहब के परिवार के सदस्यों से मिलीं, कई इमामबाड़ों में गईं और मर्सिया होते देखा। उनके पसंदीदा उपन्यासों में ‘राग दरबारी’ भी शामिल है। वे लंदन में बीबीसी में भी काम कर चुकी हैं। हिंदी से उनका गहरा लगाव है। उनका मानना है कि ‘आधा गांव’ और ‘राग दरबारी’ का अनुवाद करने वाला उत्तर प्रदेश से दूर कैसे रह सकता है।

जिलियन राइट के अनुसार, उपन्यास में कोई पारंपरिक कथानक नहीं है। यह किसी एक चरित्र का आरंभ से अंत तक पीछा नहीं करता, बल्कि यह समय का बहाव है, जो गंगौली से होकर गुजरता है। राही स्वयं कहते हैं कि यह कहानी समय की है, न धर्म की और न राजनीति की। फिर भी इतिहास यहां व्यक्तियों के जीवन में प्रवेश करता है। पाकिस्तान का विचार गांव वालों के लिए अजनबी और अर्थहीन है। तन्नू जैसे चरित्र स्पष्ट कहते हैं कि वे मुसलमान हैं, लेकिन वे गंगौली हैं। उनके खेत, उनकी जमीन, उनके पुरखों की कब्रें यहीं हैं। वे पूछते हैं कि अगर हिंदू पड़ोसी उनसे पूछें कि तुमने पाकिस्तान के लिए वोट क्यों दिया, तो वे क्या जवाब देंगे। यह प्रश्न उपन्यास की आत्मा है। विभाजन को राही धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने की उस कोशिश के रूप में देखते हैं, जो नफरत और भय पर टिकी है। गांव वाले इस विचार को समझ ही नहीं पाते। उनके लिए पहचान स्थानीय है, धार्मिक नहीं।

साथ ही उपन्यास जमींदारी व्यवस्था की क्रूरताओं, जातिगत उत्पीड़न और स्त्रियों की स्थिति को भी बिना किसी रोमांटिकीकरण के दिखाता है। जमींदार परिवारों में बहुविवाह, रखैलें और ‘कलमी’ संतानें आम हैं। दलित और निम्न जाति के लोगों के साथ व्यवहार में अहंकार और शोषण स्पष्ट है। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी खत्म होने पर पुरानी व्यवस्था ढहती है। सैयद परिवार आर्थिक संकट में फंसते हैं, जबकि पहले दबे हुए वर्ग राजनीतिक चेतना प्राप्त करते हैं। यह परिवर्तन दुखांत भी है और आवश्यक भी। राइट मानती हैं कि राही की भाषा उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है। भोजपुरी, उर्दू और हिंदी का मिश्रण, गालियां, हास्य, व्यंग्य और मार्मिकता सब एक साथ हैं। वे न तो ग्रामीण जीवन का आदर्शीकरण करते हैं और न उसे समाजशास्त्रीय उदाहरण बनाते हैं। राइट का अंग्रेजी अनुवाद इस कृति को अंतर्राष्ट्रीय पाठकों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना। 

1994 में यह ‘द फ्यूडिंग फैमिलीज ऑफ विलेज गंगौली’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ और 2003 में पेंगुइन से ‘ए विलेज डिवाइडेड’ के रूप में फिर आया। राइट ने सावधानीपूर्वक शोध किया। उन्होंने मूल के व्यंग्य, स्थानीय मुहावरों और सांस्कृतिक बारीकियों को बचाने का प्रयास किया। कुछ स्थानों पर मूल की लय और भोजपुरी की कोमलता पूरी तरह नहीं उतर पाई, जो किसी भी अनुवाद की सीमा है। फिर भी यह अनुवाद सराहनीय है। उसने उपन्यास को अंग्रेजी भाषी दुनिया में स्थापित किया और कई आलोचनात्मक अध्ययनों का आधार बना। जब आप जिलियन राइट के साथ बात करते तो वहां मार्क टुली भी आ जाते थे। वे भी बातचीत का हिस्सा बन जाते। वे राइट के पार्टनर थे।

आज, जब राही मासूम रजा का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है, ‘आधा गांव’ और उसका अनुवाद प्रमाण है कि साहित्य कितना शक्तिशाली हो सकता है। इसका संदेश है कि राष्ट्र और धर्म की बड़ी कथाओं के नीचे स्थानीय पहचान, स्मृति और मानवीय संबंध कैसे जीवित रहते हैं। गंगौली का ‘आधा गांव’ आज भी पूरे हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व करता है, जहां विभाजन के बावजूद लोग एकदूसरे से जुड़े हुए हैं, जहां जाति और वर्ग की दीवारें अभी भी खड़ी हैं और जहां समय लगातार बदल रहा है।

विवेक शक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

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