नई दिल्ली। UPI के जरिए ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन पर प्रस्तावित शुल्क को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने फिलहाल नई व्यवस्था पर रोक लगाने से इनकार किया और केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक तथा NPCI से जवाब मांगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने सुनवाई के दौरान शुल्क की कानूनी प्रकृति और उसके आधार पर सवाल उठाए। अदालत ने यह भी पूछा कि शुल्क आखिर किसे प्राप्त होगा और इसे किस आधार पर फीस माना जा सकता है।
₹2,000 से ऊपर के UPI भुगतान पर प्रस्तावित है MDR
केंद्र सरकार की नई व्यवस्था के तहत ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI लेनदेन पर Merchant Discount Rate लागू करने का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली है। वहीं, व्यक्ति से व्यक्ति UPI भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। सरकार के मुताबिक करीब 96 प्रतिशत मर्चेंट UPI लेनदेन भी शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे।
याचिका में शुल्क व्यवस्था को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में केंद्र की ओर से जारी 14 और 15 सितंबर की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि शुल्क का बोझ अंततः कारोबारियों के जरिए ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
सरकार का कहना है कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है, बल्कि भुगतान व्यवस्था से जुड़े प्रतिभागियों के बीच वितरित होने वाला शुल्क है, जिसका उद्देश्य UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना है।
अदालत के सवालों से बढ़ा मामला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शुल्क लगाने के कार्यकारी अधिकार और इसकी कानूनी प्रकृति पर सवाल उठाए। अब केंद्र सरकार, RBI और NPCI के जवाब के बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।



